पर्यावरण

तमिल डेयरी किसान का अनोखा प्रयास – दूध की लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए किया शराब की भट्टी के बचे हुये माल का उपयोग

तर्कसंगत

February 27, 2019

SHARES

मवेशियों के लिए चारे की कमी का सामना कर रहे तमिलनाडु के कई जिलों के किसानों ने एक समाधान निकला जिससे ना केवल चारे की लागत में कमी आई बल्कि दूध की पैदावार भी बढ़ी है.

तमिल में एक प्रसिद्ध कहावत है ‘घर का खजाना गाय है और बगीचे का खजाना मोरिंगा’. भारत के बाकी हिस्सों की तरह ही गायों को तमिलनाडु के गांवों में सम्मानित किया जाता है. यहां तक ​​कि ‘माटू पोंगल’ नामक एक त्योहार भी है जो कृषि और मानव जाति के लिए उनके योगदान का जश्न मनाता है.

तमिलनाडु में 99.95 लाख से अधिक मवेशी हैं जिनके लिए चारे की व्यवस्था करना चुनौती बन गई है. वर्तमान में भारत में केवल 4% चारे की खेती होती है. अध्ययन से पता चलता है कि देश में 2025 तक हरे चारे के लिए 65% और सूखे चारे के लिए 25% की कमी देखी जायेगी.

चारे की कमी और बढ़ती लागत के कारण भारत में मवेशियों की बड़े पैमाने पर बिक्री हुई है जबकि तमिलनाडु के कुछ किसान अपने मवेशियों के खाने का तरीका बदल रहे हैं.

 

शराब की भट्टी का बचा हुआ माल

मवेशियों को ज्यादातर हरा या सूखा चारा खिलाया जाता है. घर के बने या व्यावसायिक केंद्रित से आये अनाज में खनिज और विटामिन का मिश्रण होता है. पांडिचेरी के तिरुक्कन्नूर गाँव के एक डेयरी किसान, कैलायरासन एस (37), ने पास की एक शराब की भट्टी के बचे हुये माल को खरीदकर चारा बनाया है जिसकी लागत भी कम है.

कैलायरासन ने बताया “व्यावसायिक चारे की कीमत Rs. 20/ kg होती है जबकि शराब की भट्टी के बचे हुये माल को 6 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीद सकते हैं. जब मैंने शराब बनाने वाले के माल से बने चारे को 30% मवेशियों को खिलाया तो मुझे लगभग 20% ज्यादा दूध मिला.” कैलायरासन लगभग 50 गायों को पालते हैं उन्होंने बताया कि साग, चोकर और बाजार के अनाज को प्रोटीन युक्त शराब बनाने वाले को माल मिलाकर गायों को खिलाने से दूध की उत्पादकता बढ़ी है.

वेटरनरी कॉलेज और रिसर्च इंस्टीट्यूट के सहायक प्रोफेसर सेंथिलकुमार एस ने बताया “शराब की भठ्ठी का माल 7 से 10 दिनों का सुरक्षित रहता है अगर इसके बाद इसे इस्तेमाल करते हैं तो यह ख़राब हो सकता है और मवेशी दूध में mycotoxins दे सकते हैं जोकि हानिकारक है. शराब की भट्टी के बचे हुये माल का उपयोग तभी समझ आ सकता है जब भठ्ठी आपके आस पास हो.”

 

मेसकाइट की फली

मीनाक्षीपुरम, कोयम्बटूर  के गणसेकरन (26) अपनी गायों के लिए अच्छे और स्वस्थ चारे की तलाश में थे और जब उन्होंने सुना कि मेसकाइट फली को पौष्टिक आहार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है तो उन्होंने इसे आजमाने का फैसला किया.

 

 

ज्ञानसेकरन ने बताया “मुझे थूथुकुडी के कृषि विज्ञान केंद्र से फली के नमूने मिले और मैंने पाया कि मेरी गाय उस चारे को खाने के बाद बहुत स्वस्थ हैं. यह चारा सस्ता है और दूध का उत्पादन भी एक लीटर प्रति गाय बढ़ा है”

थुथुकुडी जिले में किसान ज्यादातर मेसकाइट फली से सावधान रहते हैं क्योंकि इसे खेतों के लिए हानिकारक माना जाता है और ये पानी को भी शोख लेते हैं. थूथुकुडी कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक श्रीनिवासन वी. ने बताया कि कैसे उन्होंने डेयरी किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए इन फलियों का लाभ उठाया.

श्रीनिवासन ने बताया “आम तौर पर किसान इन पेड़ों को काटते हैं लेकिन उनकी फली को जानवरों के चारे के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर मवेशी उन्हें सीधे खाते हैं तो मेसकाइट के पेड़ों का अधिक प्रसार हो सकता है इसलिए हमने 2014 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के माध्यम से एक परीक्षण किया.”

वैज्ञानिकों ने खेती करने वाले किसानो को फली सुखाने और पीसने के लिए कहा. उनके पास लगभग 30 टन मेसकाइट फली थी जिसे वो किसानो को दे सकते थे. श्रीनिवासन ने बताया “चूंकि ये पेड़ संख्या में बहुत अधिक हैं इसलिए मवेशियों के चारे की कीमत कम होती है. दूध की उत्पादकता में भी 10% की बढ़ोत्तरी हुई है.” किसानों को फली इकठ्ठा करने पर 150 रुपये का मिलते थे जबकि पशुओं के मालिक चारे पर Rs. 5/kg तक बचते थे.

 

जलीय फर्न एजोला

तमिलनाडु में एजोला, डेयरी किसानों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प है. सलेम के करुप्पुर गांव के जगनाथन (68) ने बताया “छह महीने पहले डॉ. जयंती ने नेशनल बैंक फ़ॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (NABARD) की स्कीम के तहत एजोला के बारे में बताया था.”

वेटरनरी यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग एंड रिसर्च सेंटर की प्रोफेसर और जगन्नाथन की शिक्षक जयंती ने बताया “1 फुट की गहराई के साथ 6 x 3 फीट की शीट में आप कुछ ही दिनों में एजोला को उगा सकते हैं जिसकी लागत लगभग 600 रुपये होगी. एजोला गर्मी में कम उगती है इसीलिए इसे छाया में उगाया जाता है.”

“एजोला मेरे जैसे डेयरी किसानों के लिए एक वरदान की तरह है जिनके पास कोई चारे की कोई जमीन नहीं है. ना केवल मेरी छह गाय अभी स्वस्थ हैं बल्कि एजोला ने मेरी लागत को भी 30% कम कर दिया है.” जगनाथन ने VillageSquare.in को बताया.

तमिलनाडु राज्य सरकार भी एजोला को बढ़ावा दे रही है. पशुपालन नीति 2018-19 के अनुसार, तमिलनाडु में कुल 30,958 एजोला इकाईयाँ स्थापित की गई हैं जो बिलकुल निशुल्क हैं.

भारत में एजोला को हाल ही में प्रसिद्धि मिली है लेकिन चीन ने इसका उपयोग सदियों से हरी खाद के रूप में किया है. इसे नाइट्रोजन-फिक्सिंग के गुणों के लिए जाना जाता है. कोयम्बटूर के पेरुम्पथी गाँव के किसान, थिरुवंकटम, ने नारियल और एजोला को मिलाकर अपने खेत में इसका उपयोग किया. उन्होंने हमें बताया “यह मेरे पेड़ों को पोषक देता है और मेरे मवेशियों के लिए चारा भी उत्पादित करता है.”

 

हरा चारा

2008 में, थिरुवंकटम गाँव के 25 किसानों ने मुनाफे को बढ़ाने और लागत को कम करने के लिए एक संगठन का गठन किया. वे राज्य सरकार द्वारा दी गई हरे चारे की किस्मों जैसे CO-4 और CO-5 को बढ़ावा देते हैं. अब 1000 से अधिक किसानों के साथ काम कर रहे थिरुवंकटम ने बताया कि उन्होंने दूध का उत्पादन 150 लीटर से 1500 लीटर तक बढ़ा दिया है.

कांचीपुरम के मधुरंतकम में अन्नम फार्म के सेतु आर (38) अच्छी गुणवत्ता वाले दूध के लिए अच्छी खेती को स्थायी तरीका मानते हैं. वे मनाते हैं कि “CO4, CO-5 ने चारे की फसलों को दोगुना किया है. डेयरी और खेती एक दूसरे के पूरक हैं जब मेरी गायें चरती हैं तो वे मेरी जमीन में खाद का काम करती हैं. मवेशियों को तिल के तेल भी खिलाया जाता है जिससे कृषि में भी बढ़ोत्तरी हुई है.”

 

हाइड्रोपोनिक चारे की खेती

चारे की कमी को पूरा करने के लिए एक और तरीका है हाइड्रोपोनिक चारे की खेती. कृषि नीति के अनुसार राज्य में कुल 1100 ऐसी ईकाइयां हैं  जिनमें 75% छूट दी जाती है।

सिलिरामथुपट्टी, थेनी के एक डेयरी किसान जयकुमार (47) ने सूखे के मौसम में हाइड्रोपोनिक खेती की कसम खाई थी वह करीब सात साल से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं जिसकी कुल लागत लगभग 36,000 रुपये आई है.

जयकुमार ने VillageSquare.in को बताया “बहुत कम पानी और जमीन के साथ हाइड्रोपोनिक पौष्टिक और अच्छा चारा पैदा कर सकता है. चारे की कीमत Rs.2 /kg से कम है जिसमें प्रोटीन बहुत अधिक है.” हालांकि यह हरे चारे की जगह नहीं ले सकता लेकिन ख़राब मौसम में इसे इस्तेमाल कर सकते हैं.

तमिलनाडु डेयरी के किसान अपनी गायों की भलाई के लिए और अपने उपभोक्ताओं को अच्छी सुविधा देने के लिए सरकार और स्थानीय संसाधनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...