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शहीद रतन ठाकुर के पिता: “उसने कहा था कि वह अपनी गर्भवती पत्नी को देखने के लिये होली पर आयेगा वो आया मगर तिरंगे में लिपटे हुए”

तर्कसंगत

March 2, 2019

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जम्मू-कश्मीर के अवंतीपोरा में 14 फरवरी को पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद द्वारा किये गए अमानवीय पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 44 जवानों को शहीद हुये एक सप्ताह गुजर चुका है लेकिन उस दिन की यादें आज भी हर भारतीय के दिल में बसी हुई हैं. तर्कसंगत ने बिहार के भागलपुर जिले के पास कहलगाँव के ‘एकचारी-गाँव’ में 45 बटालियन में तैनात सीआरपीएफ जवान ‘रतन ठाकुर’ के पैतृक घर का दौरा किया. सैनिक के पिता राम निरंजन ठाकुर, जिन्होंने 2013 में अपनी पत्नी को खो दिया था, ने इस संकट के समय में परिवार को बहुत बहादुरी से एक साथ रखा है. वह छोटी और पतली गलियों से होते हुये हमें अपने घर ले गये. घर में मातम का माहौल था ऐसा लगा जैसे वहां सब उजड़ चुका है. यही वो जगह है जहाँ शहीद रतन ठाकुर ने अपना बचपन बिताया है.

 

 

शहीद रतन ठाकुर के पिता के साथ बातचीत

शहीद के पिता ने हमें बताया “मैंने अपने दोनों बेटों को एक छोटे पौधों की तरह पाला है लेकिन अब बस एक ही बचा है. आज मेरा पूरा परिवार मेरे गांव ‘कहलगांव’ में अपने छोटे से घर में एक साथ है. मेरे चारों बच्चे फूल की तरह हैं. मैंने अपने जीवन को उनके लिये संभाल रखा है. मैंने हमेशा से अपने सभी बच्चों के साथ एक सुखी और संतुष्ट जीवन जीने की इच्छा की है” विपत्ति की इस घड़ी में निरंजन ठाकुर ने अद्भुत हिम्मत दिखाई है. वह शहीद रतन ठाकुर के बेटे और अपने पोते ‘कृष्णा’ की ओर इशारा करते हुये बताते हैं ” यह कहना बहुत मुश्किल है, दिल से बात नहीं निकलती है, मेरा पोता साढ़े तीन साल का है और दूसरा अभी भी माँ के गर्भ में पल रहा है.”

“रतन ने कहा था कि वह होली पर वापस आयेगा. वह अपनी छोटी बहन की शादी एक अच्छे इंसान से करना चाहता था. उसका सपना अधूरा रह गया ” निरंजन ठाकुर को इस हिंसक घटना ने बुरी तरह तोड़ दिया है लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी हैं. उन्होंने अपने पोते को युद्ध सिखाने की कसम खाई है. वे बताते हैं “जब मेरे छोटे पोते का जन्म होगा, मैं उसका नाम रामातार रखूंगा और अपने बच्चों को तीर चलाना सिखाऊंगा.”

वास्तव में अपने ही बेटे की शहादत को स्वीकारना एक असहनीय सच है. निरंजन ठाकुर अपने पोते की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित है. उन्होंने कहा ” मैं संकल्प लेता हूँ कि जब तक ज़िंदा हूँ अपने बच्चों को कुछ नहीं होने दूंगा.” उनका साढ़े तीन साल का पोता, कृष्णा अपने पिता की तरह ही फौजी बनकर देश की सेवा करना चाहता है. ठाकुर साहब ने बताया कि कृष्णा को किसी ने कुछ नहीं सिखाया लेकिन यह उसकी खुद की एक प्रतिज्ञा है.”

शहीद रतन ठाकुर की पत्नी

हम शहीद रतन ठाकुर की शोकाकुल पत्नी से मिलने के लिये उनके ससुर निरंजन ठाकुर के साथ गये. राज नंदिनी छह माह से गर्ववती हैं और अपने सुनहरे भविष्य की खुशी, आशाओं और सपनों के साथ मुस्कराकर जी रही थीं लेकिन आज एक बंद कमरे में उदास रहती हैं. उन्होंने पुलवामा हमले से पहले अपने पति से आखिरी बार बात की थी. रतन ने उनसे कहा कि वह श्रीनगर पहुंचकर फिर से बात करेगा पर जिंदगी के ऐसे अजीब और असुरक्षित खेल के बाद उसका पूरा जीवन अचानक रुक सा गया है. बिस्तर के पास ही उसके पीने के लिये दूध का एक लंबा गिलास रखा था जिसे उन्होंने छुआ तक नहीं है. उनकी जिंदगी में ऐसी बर्बादी करने वाली खबर के बाद उन्होंने दो दिन खाना तक नहीं खाया था पर वह अब मुश्किल से थोड़ा बहुत खा लेती हैं. उनकी निराशा ने उन्हें शब्दरहित कर दिया है. वह कुछ बोल नहीं पाती हैं पर उनकी चुप्पी जैसे बहरा कर देने वाली है.

 

शिक्षा, सबसे अच्छी शर्त

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपने बच्चों के पढ़ाने के लिये निरंजन ठाकुर ने कभी फल बेचे तो कभी रस बेचने का काम किया. उन्होंने अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए अपना गाँव छोड़ दिया और भागलपुर में एक किराये के घर में रहना शुरू कर दिया. वे बताते हैं “मेरा एक छोटा बेटा मिलन कुमार और दो बेटियाँ हैं. मेरी बड़ी बेटी 2018 में बिहार पुलिस में भर्ती हो गई. मैंने अपने बच्चों को इस देश का बेहतर नागरिक बनने के लिये पढ़ाया है. मेरी बड़ी बेटी और छोटे बेटे ने अर्थशास्त्र (ऑनर्स) की पढ़ाई की है और मेरी छोटी बेटी मनोविज्ञान (ऑनर्स) के दूसरी साल में है. सिर्फ बेटियाँ ही नहीं बल्कि मेरी बहू ने भी मनोविज्ञान (ऑनर्स) के दूसरे साल की परीक्षा दी है. रतन खुद पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) से पढ़े थे.” निरंजन ठाकुर एक बेख़ौफ़ और बहादुर चहरे के साथ कहते हैं “कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं अभी भी संघर्ष जारी रखूँगा और अपने पोते को पढ़ा-लिखा कर एक बड़ा पुलिस अधिकारी बनाऊंगा. जैसे आप अखबार में रतन के बारे में पढ़ते हैं, वैसे ही एक दिन आप कृष्ण के बारे में भी पढ़ेंगे. वह भी देश की सेवा करेगा.”

 

भागलपुर के लोगों ने बहुत सहायता की और सहयोग दिया

दुःख की इस घड़ी में पूरा शहर शहीद के परिवार के साथ खड़ा है. कई संगठन भावनात्मक और आर्थिक रूप से परिवार की मदद करने के लिए आगे आये हैं. भागलपुर की सहकारी डेयरी समिति की सुधा विमुल डेयरी ने परिवार की 12,000 रुपये से मदद की है. Mount Assisi School, भागलपुर ने कृष्णा की 12 वीं तक की पढ़ाई का जिम्मा उठाया है. इसके अलावा शहर के कई व्यक्तियों ने एक साथ पहल की है और सर्वोत्तम तरीके से योगदान दिया है.

 

तर्कसंगत  के विचार

तर्कसंगत रतन ठाकुर और अन्य सभी सैनिकों और उनके परिवार के प्रति अपनी पूरी एकजुटता और संवेदना व्यक्त करता है जिन्होंने हमारे देश के नाम पर अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया हैं. यह राष्ट्र उनके सभी वैचारिक मतभेदों के बावजूद भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना चाहिये. रतन ठाकुर की भावना असाधारण हैं. उनके लिए शिक्षा का महत्व उन्हें उन लोगों से अलग बनता है जिन्होंने निर्दोष कश्मीरियों पर अत्याचार करके राष्ट्रवाद की भावना को शर्मसार किया है. हम अपने बहादुर जवानों के दिलों को सलाम करते हैं.

 

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