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जेनेवा कन्वेंशन: युद्ध के कैदियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए; मानसिक या शारीरिक यातना नहीं दिया जा सकता

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Image Credits: India Today

March 6, 2019

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युद्ध के कैदियों को सबसे ज्यादा डर किस बात का है ये कोई नहीं बता सकता. अपने घरों में चैन की नींद सो कर, युद्ध के कैदी के दिमाग में जो गुजरता है उसके बारे में सोचना शायद अकल्पनीय है. खतरे के सामने अभिनंदन का मनोबल सराहना के योग्य रहा है.

जिनेवा सम्मेलनों के अनुसार, पाकिस्तान द्वारा पकड़े गए IAF पायलट को युद्ध बंदी (POW) माना जाएगा. एक बार दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त हो जाने पर, POW को छोड़ दिया जाना चाहिए. 

मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा जिनेवा सम्मेलनों द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन किया जाना चाहिए. इसे 1929 में तय किया गया था, और फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 1949 में, इसमे परिवर्तन किया गया था. चार जिनेवा सम्मेलनों में, तीसरे सम्मलेन में ये बताया गया है कि किसको युद्ध कैदी के रूप में रखा जा सकता है और उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए.

केवल अंतर्राष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष के मामले में युद्ध केदी की स्थिति लागू हो सकती है. आमतौर पर, युद्ध केदी सशस्त्र बलों के सदस्य होते हैं या जो किसी न किसी तरह उनसे जुड़े होते हैं, जो युद्ध के दौरान पकड़े जाते है.



जिनेवा कन्वेंशन क्या कहता है?

तीसरे जिनेवा कन्वेंशन के अनुच्छेद 13 के अनुसार, हर समय एक युद्ध क़ैदी के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए. वह देश, जिसके पास युद्ध क़ैदी है,  किसी भी तरह से कैदी के स्वास्थ्य को खतरे में डालता है, तो इसे कन्वेंशन का बहुत गंभीर उल्लंघन माना जाएगा.

कन्वेंशन का कहना है कि देश यदि युद्ध क़ैदी का शारीरिक शोषण या किसी भी प्रकार के चिकित्सा या वैज्ञानिक प्रयोग के अधीन नहीं कर सकता है, जब तक कि चिकित्सा, दंत चिकित्सा या अस्पताल द्वारा उचित नहीं हो, जिसके तहत उसका इलाज किया जा रहा है. इसके अलावा, कोई भी उसे धमका या अपमान नहीं कर सकता है, या उससे जुडी जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकता है.

अभिनंदन के पकड़े जाने के बाद, भारत सरकार ने पाकिस्तान में घायल भारतीय वायु सेना के जवान के वीडियो में दिखाए जाने के तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई, जो कि अशिष्ट था और जिसने अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी कानून और जिनेवा कन्वेंशन के सभी मानदंडों का उल्लंघन किया, जिसे न्यूज़ मिनट ने रिपोर्ट किया.

भारत सरकार ने अपने बयान में कहा  “यह स्पष्ट किया गया था कि पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी जाएगी कि उसकी हिरासत में भारतीय रक्षा कर्मियों को कोई नुकसान न पहुंचे. भारत को उनकी तत्काल और सुरक्षित वापसी की उम्मीद है “

संघर्ष में प्रत्यक्ष भाग लेने के लिए यूद्ध केदी पर मुकद्दमा चलाना भी निषेध है. उनके कब्जे को एक दंड नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन केवल यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए है कि वह संघर्ष में आगे भाग न लें. शत्रुता समाप्त होने के बाद, उसे रिहा किया जाना चाहिए और सुरक्षित रूप से और बिना देरी के वापिस भेज देना चाहिए. उन पर संभावित युद्ध अपराधों के लिए मुकदमा चला सकती है, लेकिन हिंसा के कृत्यों के लिए नहीं, जो अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत वैध हैं” यह कहा गया है .

उससे किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिए एक युद्ध क़ैदी को मानसिक या शारीरिक रूप से पीड़ित नहीं किया जा सकता है. यदि वह किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से इनकार करता है, तो उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर अपमानित नहीं किया जा सकता है, धमकी नहीं दी जा सकती है या उसे डराया नहीं जा सकता है. उसे केवल अपना नाम, जन्म तिथि, रैंक और सेवा संख्या प्रदान करने की आवश्यकता हो सकती है.

यदि कोई युद्ध क़ैदी बिगड़ती मानसिक या शारीरिक स्थितियों के कारण अपनी पहचान बताने में असमर्थ है, तो उसे चिकित्सा के लिए सौंप दिया जाना चाहिए. सैन्य उपकरणों और सैन्य दस्तावेजों के अलावा, अन्य सभी व्यक्तिगत सामान युद्ध क़ैदी के साथ रहना चाहिए. उसे अपने आइडेंटिटी डाक्यूमेंट्स रखने की अनुमति होनी चाहिए.



पिछले पकड़े गए सैनिकों के साथ पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड

जिनेवा सम्मेलनों के बावजूद, पाकिस्तान ने पहले भी अपने दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने में संकोच नहीं किया है. विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के मामले में, पड़ोसी देश ने कम से कम स्वीकार किया है कि वह उनकी हिरासत में है, क्योंकि इससे पहले भारत के सैन्य कर्मियों को पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा क्रूरतापूर्वक अत्याचार देकर मार दिया गया है.

1999 के कारगिल युद्ध में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा और कैप्टन सौरभ कालिया को पाकिस्तानी आर्मी ने बंदी बना लिया था. अहुजा जब मिग -21 उड़ा रहे थे तब सरफेस टू एयर मिसाइल ने उनके फाइटर को टक्कर मार दी, जिसके बाद उन्हे खुद भी विमान से निकलना पड़ा. वह एक खोए हुए मिग -27 का पता लगाने का प्रयास कर रहे थे जिसे फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता ने उड़ाया था. बाद में आहूजा का शरीर पाकिस्तान द्वारा वापस लौटा दिया गया था, और उस पर पॉइंट- ब्लैंक बुलेट के निशान थे. उन्हे जिंदा पकड़ लिया गया था और गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

26 वर्षीय नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया, सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान टीवी पर परेड कराया और  निजी तौर पर उन पर क्रूरतापूर्वक अत्याचार किया. बाद में उन्होंने उन्हे रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति को सौंप दिया.

मई 1999 में, 22 वर्षीय कैप्टन सौरभ कालिया कारगिल के काकसर क्षेत्र में पांच अन्य सैनिकों के साथ पेट्रोलिंग पर निकले थे. पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों ने उन्हें एलओसी के भारतीय पक्ष में से पकड़ लिया. बाद में जून में, पाकिस्तान सेना ने उनके शव सौंपे, जो बुरी तरह से कटे हुए थे और उससे पता चला कि वे किस क्रूर यातना से गुजरे होंगे.

अतीत में जो हुआ था, उसके बावजूद यह महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान युद्ध कैदियों के साथ सम्मान से पेश आए. जिनेवा सम्मेलनों के अनुसार उन्हें शारीरिक या मानसिक रूप से युद्ध क़ैदी को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है. 

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