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सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को सुधारकर दिल्ली सरकार, सुशासन का एक उदाहरण स्थापित कर रही है

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Image Credits: India Today

March 7, 2019

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संयुक्त राष्ट्र का आर्थिक और सामाजिक आयोग ने, एशिया और पैसीफिक के लिए गुड गवर्नेंस की आठ प्रमुख विशेषताओं के लिये पैमाने तैयार किये हैं जो कुछ इस तरह है सहभागिता, सर्वसम्मति, जवाबदेह, पारदर्शी, उत्तरदायी, प्रभावी और कुशल, समान और समावेशी और कानून का पालन. गुड गवर्नेंस एक एजेंडा है और हाल ही में सरकार के प्रचार का एक मुद्दा बन गया है. यह लेख दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा गुड गवर्नेंस के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए किए गए ठोस और विश्वसनीय प्रयासों पर ध्यान देगा.

 

नौकरशाही और आधिकारिक तौर पर प्रशासनिक संकट और परिचालन की कमी की स्थायी स्थिति के बावजूद, नीति के परिणाम काफी साफ़ दिखाई दे रहे हैं और वह दूर-दूर से काफी सराहना भी प्राप्त कर रहे हैं. भारत की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में प्रशासनिक और इन्फ्रास्ट्रक्चरल सुधार का मुद्दा शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 और हाल ही के TSR सुब्रमण्यम समिति सहित कई आयोगों द्वारा उठाया गया है, जिन पर नई शैक्षिक नीति की घोषणा की जानी है. हालांकि, इन मामलों की स्थिति में स्पष्ट गिरावट ने किसी भी संकेतक के आधार कुछ भी मुद्दा उठाया है, पर इन नीतियो के प्रस्तावों की प्रभावशीलता में कुछ विशेष फर्क नहीं आया.

 

शिक्षा में उपस्थित कमियों को दूर करने का प्रयास

दिल्ली सरकार परिवर्तनकारी सुधार के लिए अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति की वजह से जमीनी स्तर पर नीतिगत दस्तावेजों के अंतर को दूर कर इस मोर्चे पर खड़ी हुई है. उदाहरण के लिए, जब अन्य सरकार शिक्षा के क्षेत्र में सोये हुए थे, तब एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) की सर्वेक्षणों में सरकारी स्कूल के बच्चे के सीखने के नतीजे अच्छे नहीं थे,  दूसरी तरफ दिल्ली सरकार ने “मिशन बुनियाद” की शरुआत करी जिससे छात्रों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का प्रयास किया गया, साथ ही साथ जहा स्कूल में अध्ययन सामग्री और पढ़ने के लिए साथ ही कुछ विशेष ब्रिज कोर्स पर ध्यान दिया.

 

सुधार की मूल भावना उन प्रोत्साहन संरचनाओं को बदलने में है जो नीतिगत ढांचे में विभिन्न अभिनेताओं को चलाते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संसाधनों को अनुकूलित किया जाए और भ्रष्टाचार को कम से कम किया जाए. उन प्रभाव के लिए, राज्य सरकार ने, जो विरोधी संघीय वाली राजनीतिक कार्यकारी द्वारा बनाई गई, कई कानूनी-नौकरशाही बाधाओं के बावजूद, यह सुनिश्चित किया कि यह स्कूल के शिक्षकों और प्रिंसिपलों को सशक्त बनाए. वही एक तरफ, स्कूल के शिक्षक जिन्हें पहले चुनाव प्रबंधन के लिए और वोलन्ट्री सेवा वाले सरकारी कार्यक्रमों के लिए मुफ्त का मजदूर माना जाता था, उन्हें इस तरह के कार्य से मुक्त कर दिया गया था. दूसरी ओर बेहतर प्रदर्शन करने वाले और जोश से भरे लोगों का चयन, कैंब्रिज, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर, IIT- अहमदाबाद आदि जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में सरकार द्वारा प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए किया गया.

 

सरकार ने कर्तव्य के बोझ से दबे स्कूल प्रधानाचार्यों के सामने आने वाली चुनौतियों को समझा जिससे वो शैक्षिक मानकों पर ध्यान देने में असफल रहते थे. इसलिए, सरकार ने इ-स्टेट मैनेजरों को नियुक्त किया जिन्होंने सरकारी स्कूलों में एक अनुकूल बुनियादी ढाँचा और उल्लेखनीय स्वच्छता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया. जहां एक ओर कक्षा बारहवीं और दसवीं के बोर्ड के नतीजों में एकेडमिक उपलब्धियो में सुधार दिखा, वहीं स्कूली सुधार में जबरदस्त ढांचागत का विकास विश्वसनीय रहा है.

 

स्कूल प्रशासन और अभिभावकों के बीच की दूरियों को दूर करने के लिए, सरकार ने राइट टू एजुकेशन (RTE) अधिनियम, 2009 के तहत स्कूल प्रबंधन समितियों के प्रावधान को लागू करने का बीड़ा उठाया. यह सब कुछ यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि माता-पिता द्वारा चुने गया प्रतिनिधि उनके हित की रक्षा करेगा, वह सहभागी निर्णय लेने और व्यावहारिक प्रबंधन को अधिक सुचारू रूप से कार्य करने में मदद करेगा. यह वास्तव में उपलब्धि का एक भारतीय मानक है कि वैधानिक दायित्व की पूर्ति, इतनी असाधारण है कि यह प्रशंसा के योग्य है. हालांकि, इस पूर्ण कार्यान्वयन ने सुशासन के एक और तत्व को शामिल किया: अल्पसंख्यकों के विचारों को ध्यान में रखा गया और निर्णय लेने में समाज में सबसे कमजोर लोगों की आवाज़ सुनी गई.

 

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के इस अध्ययन से पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र के निजीकरण की तीव्र गति के कारण सामाजिक असमानता और आर्थिक स्तरीकरण की प्रणाली ने आकांक्षात्मक समाज में बड़े-निजी स्कूल को प्राथमिकता दी है. इससे अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने को मजबूरी का विषय मानते हैं न कि पसंद का. जबकि बुनियादी ढांचे और शिक्षक प्रशिक्षण पर सरकार द्वारा दिए गए प्रोत्साहन ने इस हीन भावना का मुकाबला किया, लेकिन स्कूल प्रशासन और अभिभावकों के बीच बने वर्ग का अंतर वैसे ही बना रहा. बड़े पैमाने पर अशिक्षित और गरीब माता-पिता ने महसूस किया, कि मध्यम वर्ग के शिक्षकों और प्राचार्यों द्वारा नियंत्रित शिक्षण संस्थानों से अलग कर दिया गया है. इसके कारण उनकी आवाज बेहिसाब हो गई और उनके हितों का भी खुलासा नहीं हुआ. हालाँकि, बड़ी वर्ग की चुनौतियों और अवरोधों का मुकाबला करने के लिए, सरकार ने मेगा पैरेंट टीचर मीटिंग्स का आयोजन और प्रचार किया, जिसमें गरीब माता-पिता को उनके वार्ड की मजबूती और कमजोरियों के बारे में जागरूक किया गया और उन्हें शिक्षा में समान हितधारक बनाने की मांग की गई.

 

सरकार और छात्रों के बीच संबंध

सामाजिक सशक्तीकरण का एक अन्य तत्व सरकार और छात्रों के बीच संबंध में स्पष्ट है. जबकि छात्र स्कूल के माहौल में परिवर्तन के बारे में हम गर्व महसूस करते हैं और इनकी पहल का भी हम समर्थन करते हैं, सरकार नियमित रूप से आउटरीच और भागीदारी को सुनिश्चित करती है. शिक्षा मंत्री और उनकी टीम की भूमिका यहाँ के लिए प्रासंगिक हो जाती है क्योंकि वह सुनिश्चित करते हैं कि उनके कार्यक्रमों में आवश्यक सार्वजनिक समर्थन और सामाजिक निवेश बना रहे. सरकारी स्कूल में पढने वाली कक्षा सातवीं की लड़कियों के दौरान खड़े होना और राज्य के शिक्षा मंत्री द्वारा विदेशी स्कूलों के साथ अपने स्कूल के छात्र एक्सचेंज कार्यक्रम की व्यवस्था करने की मांग करना आश्चर्यजनक है.

 

अंत में, सबसे हाल ही की पहल जो अच्छी तरह से दिल्ली के सभी 1000 सरकारी स्कूलों में नर्सरी से कक्षा 8 वीं तक के छात्रों के लिए हैप्पीनेस कोर्स को प्राप्त कराने में सफल हुई है. यह सुशासन के अंतिम मानदंडों को पूरा करता है: यह समाज की भविष्य की जरूरतों के लिए उत्तरदायी है. एक वैश्विक संदर्भ में जब छात्रों के जीवन कौशल के संबंध में शिक्षा प्रणालियों के संकट का अनुभव किया जा रहा है, सरकार ने शिक्षा नीति के बड़े नागरिक सशक्तिकरण लक्ष्य में माइंडफुलनेस अभ्यास और जीवन कौशल शिक्षा को शामिल करने के लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया है.

 

निष्कर्ष

दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षा में किए जा रहे सुधारों में नवीन विचारों के सामान्य एकेडमिक कारणों के लिए नहीं बल्कि सामाजिक नीति-निर्माण के एक नए क्षितिज का प्रतिनिधित्व है, लेकिन व्यावहारिक नीति डिजाइन के कारण जो शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों को यथोचित रूप से पूरा करता है. शिक्षकों, कर्मचारियों, प्रशासन, माता-पिता और सबसे महत्वपूर्ण छात्रों जैसे महत्वपूर्ण हितधारकों का जोर सरकार की उपलब्धियों के लिए जिम्मेदार है. एक अन्य महत्वपूर्ण कारक राजनीतिक निवेश और सामाजिक जुड़ाव की प्रकृति है जो काफी हद तक नीतिगत माहौल में नीतिगत पहल की प्रेरक शक्ति बन गई है. हितधारकों के सशक्तीकरण और व्यावहारिक कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस सुई जेनिस के कारण, मंत्री के शिक्षा कार्यबल को मूर्त सुशासन देने का श्रेय दिया जा सकता है.

 

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