मेरी कहानी

मेरी कहानी: कैंसर, डिप्रेशन सब से जूझ कर आज में दूसरे कैंसर मरीज़ों की काउंसलिंग करती हूँ

तर्कसंगत

March 8, 2019

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मैं सीमा हूँ और अभी केवल 51 साल की हुई हूँ, जी हाँ उम्र एक नंबर से ज़्यादा और कुछ भी नहीं, क्यूंकि मैं आज भी फिट, एनर्जेटिक, जोश से भरी हुई हूँ, मेरी ज़िन्दगी में नेगेटिव सोच जगह नहीं है मैं सकारात्मक सोच के दम पर हर वक़्त खुश रहती हूँ. असल में मुझे ये सारे तारीफें मिलती हैं.

मगर मैं शुरू से ऐसी नहीं थी. देहरादून में पली बढ़ी पढ़ाई खेल कूद सब में अव्वल, दो भाइयों छोटी बहन, ज़िन्दगी  से बचपन काफी जल्दी चला गया, 19 साल में शादी हो गयी. कुछ करने की चाहत, सपने सब पर अंकुश लग गया. शादी के 17 साल तक घर, बच्चे, पति  में ही बीत गए, तभी ज़िन्दगी में ऐसा मौका भी आया जब मुझे अपनी प्रतिभा के बदौलत एक प्रतिष्ठित स्कूल में आर्ट टीचर की नौकरी मिली. वहां मेरी मेहनत  ने रंग दिखाया और मैं हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट बन गयी, 6 साल नौकरी की एक अच्छा अनुभव रहा तभी नौकरी कर भी पायी मगर फिर कुछ कारण से नौकरी छोड़नी पड़ी.

वापस से घर में आ गयी, धीरे धीरे डिप्रेशन में जाने लगी, अकेले में  खूब रोने का मन करता कभी गुस्सा आता, खुद से जैसे नफरत सी हो गयी थी. अपने पर ध्यान ही देना छोड़ दिया. इसी समय आया व्हाट्स ऍप का दौर नए दोस्त बने, पुराने दोस्त मिले, यादें जीने लगीं नयी यादें बनाने लगी. इन सब के बीच भी मेरी निजी ज़िन्दगी ने मुझे अच्छे बुरे हर वक़्त से रूबरू कराया, मगर उन सबों को पॉजिटिव सोच के साथ अपनाने लगी, मैं प्रैक्टिकल होने लगी, लोग मुझे सुझाव लेने लगे और उन पर मेरी बातों का असर भी होने लगा. कुछ लोगों ने मेरी बातों को जिंदगी जीने का मंत्रा मान लिया मुझमें एक बार फिर से आत्मविश्वास आने लगा, लगा कि मुझमें अभी भी कुछ मेरे लिए बाकि है, मैं लोगों के लिए भी कुछ कर सकती हूँ, वो लोग जो मेरी तरह डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं.

मैंने खुद को रिलेशनशिप कंसल्टैंट के रूप में इंट्रोड्यूस करना शुरू कर दिया, लोगों से हर सेशन के पैसे लेने लगी. मैं बिना किसी के दवा या थेरेपी के लोगों की परेशानियां सुलझाने लगी थी पर तभी मेरी ज़िन्दगी में एक और मुश्किल ने कदम रखा. मुझे कुछ दिन से Uterus Pain हो रहा था डॉक्टर से मिली टेस्ट कराया तो रिपोर्ट आया ‘ओवेरियन सिस्ट’ और उस समय हालत काफी नाज़ुक थी, गायनेकोलॉजिस्ट से कंसल्ट किया तो सर्जरी ही एक मात्र रास्ता था और वो भी उन्होनें कहा जल्द से जल्द.

मैं अंदर से डर गयी थी, बेटी का चेहरा आँखों के सामने आ जाता अंदर से कांप गयी थी. मैं मरना नहीं चाहती थी हार नहीं मानना चाहती थी, सोच लिया कि सर्जरी नहीं कराऊँगी और मरूँगी भी नहीं.

सबसे पहले खुद को विश्वास दिलाया कि मुझे ठीक होना है फिर नेचुरल और होमियोपैथी ट्रीटमेंट शुरू किया खुद पर विश्वास के साथ बहुत मेहनत की और रिजल्ट ठीक होते चली गयी 4 महीने बाद मैंने दुबारा टेस्ट कराया उसके रिपोर्ट में 90%  ठीक हो चुकी थी.

मगर उन 4 महीनों में ज़िन्दगी भर के सीख  मिली, सोचा कि जब मेरी ये हालत थी तो जो कैंसर मरीज़ हैं उनपर और उनके परिवार पर क्या बीतती होगी, फिर क्या फैसला कर लिया कैंसर के मरीज़ और उनके परिवार के लोगों की काउंसलिंग करुँगी. क्यूंकि मैं वो दर्द, डर, आँखों में जीने की इच्छा काफी अच्छे से महसूस कर सकती थी.

ईश्वर ने मुझे यह मौका दिया जुलाई 2018 से मैं कैंसर के मरीज़ के साथ हूँ …. और आप विश्वास नहीं करेंगे कि जो सुकून मुझे उनके साथ बात करके उनको हिम्मत देकर उनके चेहरे पर मुस्कान देख कर मिलती है वो दुनिया मैं किसी को भी कीमत अदा करके भी नसीब नहीं होती.

एक बार मेरे एक मरीज़ मेरे सामने बहुत रोये और फिर मुझसे बात करने के बाद जाते हुए बोले “मैडम आज से मेरी हर नमाज़ में आपके लिए दुआ होगी” मेरी आँखें भर आयी मैं यही सोचती रह गयी कि ये इंसान मुझे ऐसी चीज़ दे गया जिसकी कोई कीमत लगा ही नहीं सकता, यह तो सिर्फ एक वाक्या था.

अब तो हर रोज़ मरीज़ और उनके परिवार वाले मेरा इंतज़ार करते हैं तकलीफ होते हुए भी मुस्कुराते हैं बस यहीं मेरा ‘मिशन स्माइल’ सफल होता है. ईश्वर से केवल यही मांगती हूँ कि मुझे उनकी तकलीफ कम करने की हिम्मत देता रहे.

 

कहानी: सीमा जैन

 

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