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61 साल के बुजुर्ग ने भारत, श्रीलंका और अफ्रीका में 12,626 किमी चलकर विश्व शांति का सन्देश दिया

तर्कसंगत

March 8, 2019

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विश्व शांति के लिए एक अकेला इंसान क्या कर सकता है? ज्यादा से ज्यादा प्रार्थना, उपदेश देना? लेकिन अब एक इंसान की कल्पना कीजिये जिसने एकता के संदेश का प्रचार करने के लिए 419 दिनों में पूरी दुनिया में 12,626 किमी की पैदल यात्रा की हो. ये सबके प्यारे अभिनायक ‘फॉरेस्ट गम्प’ के बारे में नहीं है. ये हैं मुंबई के 61 वर्षीय योगेश मथुरिया जिन्हें लोग प्यार से ‘विश्वमित्र’ बुलाते हैं. कॉर्पोरेट में नौकरी करने वाले जिन्होंने 50 साल की उम्र में अपने सब छोड़ दिया और 2013 से लगातार अलग अलग देशों में बिना किसी पैसे के घूम रहे हैं.

 

योगेश मथुरिया: पैदल चलकर शांति बनाने वाले इंसान

“1966 में जब मैं नौ साल का था दो व्यक्ति सतीश कुमार और ई पी मेनन अपनी पुस्तक – ‘बिना पैसे दुनिया की पैदल सफर’ को बढ़ावा देने के लिए हमारे घर आये थे. एक बच्चे के रूप में मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि दो साल के अंदर, दो दोस्त बिना पैसों के नई दिल्ली में राज घाट से वाशिंगटन डी.सी. के ‘जे एफ केनेडी’ की कब्र तक गये.” मथुरिया ने तर्कसंगत से बातचीत में बताया.

 

 

अपनी जिंदगी के 47 साल के बाद मथुरिया, जो IT में नौकरी करते थे, की मुलाकात एक इंसान से हुई जो दुनिया में शांति का संदेश फैलाने के अपने सपने को साकार करने में लगे थे. तत्कालीन विश्व यात्रियों ने उन्हें पैदल यात्रा करने की सलाह दी, जैसा लोग पुराने दिनों में किया करते थे.

50 साल की उम्र में, मथुरिया ने महसूस किया कि इस संसार की जीवन शैली पर विराम लगाकर समाज के लिए कुछ करने का समय आ गया है और उन्होंने नौकरी छोड़ दी. उनकी पत्नी की आकस्मिक मृत्यु ने प्रेम फैलाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई. वे अपने वातानुकूलित ऑफिस से धूल भरी सड़कों पर बाहर निकल आये.

 

सिद्धिविनायक मंदिर से श्रीलंका तक

“मैं अपने घर से ऑफिस तक पैदल जाता था जो लगभग 16 किमी दूर था. मैंने इसे सिद्धिविनायक मंदिर तक बढ़ाने का फैसला किया जो 32 किमी दूर था.“ मथुरिया ने तर्कसंगत के साथ साझा करते हुए बताया. वे खुद को चुनौती देते रहे और हर इम्तिहान में सफल होते गए. जेब में एक पैसा लिए बिना वह बॉम्बे से पुणे गये. गांधीजी के कदमों पर चलते हुये मथुरिया अपनी आत्मिक शांति के लिये मुंबई से अहमदाबाद चले गये.

आज वे भारत के 18 राज्यों से होकर श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका तक 12,626 किलोमीटर की यात्रा कर चुके है. खाना, रहना, कपड़े और अन्य खर्चों के लिये अन्जान लोगों ने हमेशा उनकी मदद की है जिनके प्यार और सद्भावना ने उनका दिल भर गया है.

“जब जब मैंने अपनी यात्रा पूरी की मुझे लगा कि ब्रह्मांड ने मुझे जवाब दिया है. मुझसे अपनी आध्यात्मिक शक्ति पर भरोसा होने लगा. मुझे मानवतावाद में और भी विश्वास होने लगा.”

 

एक भारतीय ने एक बार फिर अफ्रीकी दिल जीत लिया

योगेश मथुरिया ने अब तक की सबसे लंबी Single Walk, 2016-17 में 180 दिनों में पूरी की थी जिसमें पुणे से श्रीलंका तक जाना और आना शामिल था. वर्ष 2017 ने थोड़ी देर के लिए इस तरह की यात्रा को रोक दिया था लेकिन मई और नवंबर 2017 में लगातार दो दिल के दौरे के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. “मैं घर पर नहीं बैठना चाहता था. मैंने सोचा एक दिन सबको जाना है और फिर मैंने अफ्रीका की ओर बढ़ना शुरू किया“वह बताते हैं.

 

 

21 सितंबर 2018 को विश्व शांति दिवस पर योगेश मथुरिया अफ्रीका के लिये निकले थे. उनके साथ पांच उत्साही लोगो की एक टीम थी. 68 दिनों में टीम ने पूरे देश में 1555 किलोमीटर की पैदल यात्रा की. “हमारी अफ्रीका की सैर गांधीजी की 150 वीं जयंती के साथ-साथ नेल्सन मंडेला की 100 वीं वर्षगांठ मनाने के लिये थी. हमने जोहान्सबर्ग में Constitution Hill से शुरुआत करी, जहाँ की जेल में दोनों नेताओं ने अलग-अलग समय पर सजा काटी है. हमने मंडेला की जन्मस्थली मावेज़ो में अपनी यात्रा रोकी जहाँ उनके जीवित वंशजों ने खुले दिल से हमारा स्वागत किया.“वह भावुक होकर बताते हैं.

 

टैटू जो उनके दिल की बात कहता है

योगेश मथुरिया ने तर्कसंगत को  बताया “एक यात्रा के दौरान मैं रोजाना आठ से नौ घंटे चलता था सोने के लिए आठ घंटे के आलावा मैं बाकी समय लोगों के साथ बिताता था. उनके हाथ पर दो टैटू उनके आदर्शों (गांधी और नेल्सन मंडेला) के सार को दर्शाते हैं. उनके एक हाथ पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और दूसरे हाथ पर ‘धार्मिक प्रतीकों’ की एक श्रृंखला है. मेरा मानना ​​है कि मानवता सभी धर्मों का संगम है. मेरे हाथ में हिंदू, ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म के प्रतीक हैं. मैं लोगों को बताता हूं कि क्षेत्र और धर्म के अनुसार मानवता एक है लेकिन समय के साथ वह बँट चुकी है” वे दो अलग-अलग धर्मों का पालन करने वाले परिवार के लोगों से मिलते है जो एक साथ सद्भाव में रहते हैं.

 

पूरा ब्रह्मांड हमेशा उनके साथ है

मथुरिया ने बताया “श्रीलंका की यात्रा ने मानवता में उनके विश्वास को बढ़ाया है जबकि अफ्रीका दौरे ने उनकी आंतरिक आध्यात्मिकता को मजबूत किया है. कई बार हम अफ्रीका में सड़क पर बिना किसी व्यक्ति के 30-35 दिन चले हैं. हमने बिना किसी पैसे के पुलिस थानों, अस्पतालों, फायर ब्रिगेड, फाइव-स्टार होटल या सात-सितारा लक्जरी रिसॉर्ट में रातें बिताई हैं. हर जगह हमने लोगों से दिल खुश करने वाला सत्कार प्राप्त किया है. मुझे एहसास हुआ कि भगवान, अल्लाह आप जो भी नाम आप से प्रार्थना करते हैं, ब्रह्माण्ड की महाशक्ति हमेशा आपका मार्गदर्शन करती है.”

 

 

बंजर भूमि की कल्पना को तोड़ते हुये

यह मानना गलत होगा कि यात्रा चुनौतियों से घिरी हुई नहीं थी लेकिन हर बार हमने अपना धैर्य बनाये रखा. जब हम जोहान्सबर्ग पहुंचे तो लोगों ने हमारे बारे में सुनकर हमें ‘पागल’ करार कर दिया. एक ऐसे देश में जहां प्रति दिन औसतन 57 हत्याएं और 1,200 डकैतियां होती हैं, मथुरिया को एहसास हुआ कि शांति शब्द की कितनी जरूरत है. उनकी टीम ने सभी जोखिमों को झेलते हुये बिना किसी नुकसान के अपने लक्ष्य को पूरा किया.

 

6 वर्षों में 51,000 किमी

क्या आधुनिक ‘विश्वमित्र’ रुकने के लिए तैयार है? नहीं कभी नहीँ, बल्कि वह सेवानिवृत्त होने से बहुत दूर है. उन्होंने 12 जनवरी, 2019, स्वामी विवेकानंद की जयंती पर बांग्लादेश के लिए 4 महीने में 3,200 किलोमीटर की यात्रा शुरू की है जिसे मई 2019 में बांग्लादेश के नोआखली में गांधी आश्रम पर समाप्त करना चाहते हैं.

 

 

इसके बाद वह जापान, टोक्यो और वहां से हिरोशिमा-नागासाकी तक की सड़कों को पार करेंगे. “मैं बमबारी के दिनों की वर्षगाँठ पर दिवंगत आत्माओं के लिए प्रार्थना करना चाहता हूँ. कुल मिलाकर मैंने अगले 7 महीनों में 5,000 किलोमीटर की दूरी तय करने की योजना बनाई है.”

आप फिर से गलत हैं यदि आपको लगता है कि वह अभी तक उस तारीख से आगे की योजना नहीं बना पाए हैं. वह 2023 से शुरू होने वाले 2293 दिनों में दुनिया भर में 51,000 किलोमीटर की दूरी तय करके इतिहास रचने को तैयार हो रहे हैं. “मैं भाईचारे और शांति को बढ़ावा देने के लिए अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान का दौरा करना चाहता था पर दुर्भाग्य से दस्तावेजों के कारण मुझे मंजूरी नहीं मिली, “उन्हें बताया.

 

अकेले यात्री

उनकी कुछ यात्राओं के लिए हवाई टिकट कॉर्पोरेट कंपनियों देती हैं लेकिन आम लोगों का दिया हुआ प्यार ही उनके दिल को सबसे ज्यादा खुश करता है.

योगेश मथुरिया ने एक अकेले व्यक्ति के रूप में शुरुआत की लेकिन अब उन्हें अपने महान मिशन में कुछ साथी मिल गये हैं. “मेरा मानना ​​है कि समाज में बदलाव ऊपर से नीचे नहीं हो सकता है. इसे नीचे के स्तर से शुरू करना होगा. यही कारण है कि मैंने एक व्यक्ति के रूप में शुरुआत की है.”

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