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अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट ने 3 सदस्यीय पैनल के साथ मध्यस्थता का आदेश दिया

तर्कसंगत

Image Credits: india.com/ndtv

March 11, 2019

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बिजनेस टुडे के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च को दशकों पुरानी राजनीतिक और धार्मिक रूप से अयोध्या के राम जन्मभूमि से जुड़े विवाद पर सुनवाई की. बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले ने अदालत की निगरानी में मध्यस्थता का आदेश दिया है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट में, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 के तहत मध्यस्थता के लिए कहा जा रहा है.

 

मध्यस्थता क्या है?

मध्यस्थता कानून के अनुसार ये किसी विवादित मुद्दे को सुलझाने का एक रास्ता है, जिसमें मुकदमा करने वाले इस समस्या का समाधान करने के लिए तटस्थ पार्टी के साथ बैठते हैं, उस तटस्थ पार्टी को मध्यस्थ कहा जाता है.

पांच जजों वाली संविधान पीठ ने टाइटल सूट में तीन मध्यस्थों का एक पैनल नियुक्त किया है, इस पैनल की अध्यक्षता रिटायर्ड जस्टिस एफएम कलीफुल्ला करेंगे. शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त दो अन्य सदस्य आध्यात्मिक नेता श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू हैं. अदालत ने पैनल को एक सप्ताह के भीतर मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करने के लिए आठ सप्ताह की समय सीमा यानी 15 मार्च से 15 मई तक पूरी गोपनीयता के साथ शुरू करने को कहा है. मध्यस्थ कमिटी चार सप्ताह के भीतर कार्यवाही की प्रोगरी रिपोर्ट दाखिल करेंगे. सभी कार्यवाही उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में होगी.

 

पैनल के सदस्यों कौन कौन हैं?

पैनल के तीनों सदस्य तमिलनाडु से हैं. न्यायमूर्ति कलीफुल्ला ने चेन्नई में कानून का अभ्यास किया और बाद में वर्ष 2000 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुए. वह 2011 में जम्मू और कश्मीर के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने. 2012 में, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया. उन्होंने कई ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं, जिनमें से एक वैदिक ज्योतिष को वैज्ञानिक अध्ययन पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया जा रहा है.

 

 

मध्यस्थता प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, वे “इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे.”

आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री श्री रविशंकर अक्सर विवादित भूमि मामले पर अपने विचारों को लेकर काफी मुखर रहे हैं. एक लेख के अनुसार, आध्यात्मिक गुरु ने मुसलमानों को विवादित भूमि पर अपना दावा छोड़ने की सलाह दी क्योंकि अगर अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा हल नहीं हुआ, तो “भारत सीरिया में बदल जाएगा.” श्री श्री रविशंकर को शामिल करने पर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी नाराजगी व्यक्त की है.

 

 

ट्विटर पर उन्होंने ट्वीट किया, “सभी का सम्मान करते हुए, सपनों को वास्तविकता में बदलते हुए, लंबे समय से संघर्षों को खुशी से समाप्त करना और समाज में सामंजस्य बनाए रखना – हम सभी को इन लक्ष्यों की ओर बढ़ना चाहिए.”

श्रीराम पांचू 1990 के दशक से एक वरिष्ठ वकील और विशेषज्ञ मध्यस्थकर्ता रहे हैं. वह वर्ष 2005 में देश के पहले केंद्र द मेडिएशन चैम्बर्स के संस्थापक थे, और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संस्थान (IMI) के बोर्ड में निदेशक हैं.

पंचू को मध्यस्थता को भारतीय कानूनी प्रणाली का हिस्सा बनाने के लिए जाना जाता है. शीर्ष अदालत ने उन्हें असम और नागालैंड राज्यों के बीच 500 वर्ग किलोमीटर भूमि विवाद का मध्यस्थता करने के लिए नियुक्त किया है. इसके अलावा उन्होंने मुंबई में पारसी समुदाय से जुड़े एक सार्वजनिक विवाद को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

अयोध्या भूमि विवाद के लिए मध्यस्थता सदस्य नियुक्त किए जाने के बाद, पंचू ने कहा, “यह माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुझे दी गई एक बहुत ही गंभीर जिम्मेदारी है, मैं अपना सर्वश्रेष्ठ करूंगा.”

 

मध्यस्थता पैनल

पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नजेर की मध्यस्थता के लिए मामले को भेजते हुए कहा कि इस मामले के संभव निपटान के लिए मध्यस्थता के लिए भेजने में कोई कानूनी बाधा नहीं है.

“इसलिए, हम तदनुसार आदेश देते हैं, और पार्टियों द्वारा सुझाए गए नामों पर ध्यान दिया जाता है,हमारा विचार है कि मध्यस्थता पैनल को इस विवादित मामले के निपटारे के लिए नियुक्त किया जाता है साथ ही उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी जाती है कि अगर ज़रूरत पड़े तो पैनल में दूसरे माद्यत लोगों को भी जोड़ सकरते हैं.”

पीठ ने कहा कि यह केवल जमीन के एक टुकड़े पर मुकदमा नहीं है, बल्कि दिल, दिमाग और एक बड़ी आबादी के विश्वास से संबंधित है. यह भी बताते हुए कि यह “सार्वजनिक भावना” और “देश की निकाय राजनीति” पर इस मुद्दे का गंभीर प्रभाव पद सकता है. अदालत की निगरानी की कार्यवाही “अत्यंत गोपनीय” और कैमरे में क़ैद की जाएगी. मध्यस्थता प्रक्रिया की सफलता सुनिश्चित करने के लिए, किसी भी मीडिया को कार्यवाही के विवरण को प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

 

प्रतिक्रियाएं और सिफारिशें

निर्मोही अखाड़े को छोड़कर अधिकांश हिंदू धार्मिक निकायों ने मध्यस्थता के सुझाव का विरोध किया है. मुस्लिम धार्मिक निकायों ने इस विचार का समर्थन किया है.

मध्यस्थता के माध्यम से विवाद को हल करने के पहले के चार प्रयास विफ़ल रहे हैं.

इसके साथ ही, शीर्ष अदालत भूमि शीर्षक विवाद से संबंधित इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ एक चुनौती भी सुन रही है. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चौदह अपीलें दायर की गई हैं.

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