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[वीडियो] स्काईवॉक से स्कूल : 22-साल की महिला ने मुंबई में सड़कों के बच्चों को शिक्षा का महत्व समझाया

तर्कसंगत

March 12, 2019

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भारत में गरीबी एक वास्तविकता है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है और सड़कों के बच्चे इसके सबसे बुरे शिकार हैं. जबकि राष्ट्र अपने बच्चों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत शिक्षित करने के लिए जबरदस्त प्रयास कर रहा है, सड़क पर रहने वाले बच्चों को अक्सर अनदेखा किया जाता है और कभी-कभी उन्हें भुला दिया जाता है. भारत के इन बच्चों के लिए खोए हुए बचपन से लेकर मादक द्रव्यों के सेवन और गरीबी को दूर करना, वास्तविकता से बहुत दूर है.



हैमंती सेन ने स्काईवॉक को एक कक्षा में बदल दिया

जबकि हम में से कई लोग इन स्ट्रीट किड्स के भविष्य के बारे में केवल सोचते ही हैं, मुंबई की एक 22 वर्षीय महिला ने उनके भाग्य को बदलने में मदद करने के लिए खुद का योगदान करने का फैसला किया. कई अन्य लोगों की तरह हैमंती ने सोचा कि क्या स्टेशनों के पास रहने वाले बच्चे कभी स्कूल जाते है. पूछताछ करने पर उन्होने महसूस किया कि कुछ बच्चे कुछ समय के लिए स्कूल जाते हैं, जबकि कई अन्य को यह भी पता नहीं था कि एक स्कूल क्या है. एक बदलाव करने के लिए सेन संकल्पित थी. उन्होनें बच्चों को शिक्षित करने और उन्हें स्कूल में दाखिला लेने में मदद करने की जिम्मेदारी खुद पर ली.

Posted by Junoon on Sunday, 30 December 2018


तर्कसंगत से बात करते हुए, सेन ने कहा, “जब मैंने मई 2018 में अपनी पहल शुरू की, तो बच्चे शुरू में बहुत अनिच्छुक थे, लेकिन मैं समझ गई कि वे अंग्रेजी भाषा से रोमांचित थे और सीखने के लिए उत्सुक थे.”  उसके बाद हर दूसरे दिन लगभग 3 बजे स्काईवॉक पर जाना शुरू कर दिया, जहां उन्होंने वर्णमाला, बुनियादी अंकगणित और उन्हें संज्ञानात्मक कौशल सिखाया.

आज, हैमंती सेन कांदिवली स्टेशन स्काईवॉक पर एक अनोखा स्कूल चलाती है जहाँ वह 15 बच्चों को पढ़ाती है. इतना ही नहीं बल्कि इन उपेक्षित बच्चों के लिए एक समग्र सीखने का अनुभव प्रदान करने के लिए, सेन ने हाल ही में एक गैर सरकारी संगठन, जूनून की स्थापना की, जो ऐसे बच्चों को एक ऐसा वातावरण प्रदान करने का प्रयास करता है, जहाँ वे अपनी पूरी तरह से अपनी क्षमता को प्राप्त कर सके.

इस प्रक्रिया के दौरान, उन्हे पता चला कि अधिकांश बच्चे, भले ही सरकारी स्कूलों में दाखिला लेते हों, कुछ महीनों या वर्षों के बाद स्कूल छोड़ देते हैं. पर्यावरण की स्थिति, गरीबी और सामाजिक सेटिंग से अभिभूत, बच्चे एक सामान्य ‘बचपन’ को नहीं जीते हैं. इन बच्चों को स्कूल में लंबे समय तक गैरहाजिर होने के कारण स्कूल में रखना मुश्किल हो जाता है. इस तरह की चुनौती के बावजूद वह बच्चों को सब सिखाती रही. उनकी दैनिक प्रगति ने उन्हें और भी अधिक प्रेरित किया, इतना कि नवंबर में, उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ कर सामाजिक विकास की दुनिया में काम करने का फैसला कर लिया.



संगठन का विकास

मई में एक व्यक्तिगत पहल के रूप में शुरू हुई अब गैर-सरकारी संगठन जूनून के साथ आठ सदस्यीय मजबूत टीम बन गई है. नवंबर के बाद से, सेन या तो स्वयंसेवकों या बोर्ड के सदस्यों में से एक के साथ, हर दिन स्काईवॉक पर जाने लगी, जहां उन्होंने बच्चों को एक-डेढ़ घंटे तक पढ़ाया. पाठ्यक्रम, जो अभी भी अपने शुरूआती चरण में है, हिंदी, गणित, आदि विषय सिखाता है.

उन्होंने कहा, “हम उन्हें बुनियादी शिष्टाचार सिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे ‘यस मैम’ कहना, रोल कॉल्स का जवाब देना, दूसरों के बीच कक्षा में कैसे व्यवहार करना.” सेन की कक्षा के बच्चे 5 से 12 साल की उम्र के बीच के हैं.

हालांकि अभी तक किसी भी बच्चे का स्कूल में दाखिल नहीं हुआ है, लेकिन सेन को भरोसा है कि उनमें से कुछ बिल्कुल तैयार हैं और उम्मीद करते हैं कि यही वह साल है जब वे सफल होंगे. हालाँकि, उन्हें स्कूल में दाखिला दिलवाना यह उनका अंतिम लक्ष्य नहीं है, सेन ने कहा कि अपने एनजीओ के साथ, वह एक अनुकूल और टिकाऊ संरचना विकसित करना चाहती है जहाँ आने वाले वर्षों के लिए वह इन बच्चों की मदद कर सके.

गंभीर शिक्षा से विराम लेते हुए, सेन के पाठ्यक्रम में पारंपरिक स्कूल की तरह ही सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के लिए स्थान है. उन्होने कहा, “हम कला, संगीत, नृत्य, खेल के माध्यम से बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास करते हैं.” इन मजेदार और त्वरित अभ्यासों के साथ, इन बच्चों को अनुभव होता है कि उनका क्या अधिकार है – भले ही यह हफ्ते के कुछ घंटों के लिए हो मगर वो एक सामान्य बचपन जीते हैं, एनजीओ हर सत्र के बाद बच्चों को खाना बाँटता है. बच्चों की चेहरे की ख़ुशी, सेन को काम जारी रखने की प्रेरणा देते है. सेन की पहल पूरी तरह से खुद से फंडेड है, उन्होंने कहा, संगठन दान स्वीकार करने के लिए तैयार है.

 

It's not only about teaching kids dance but also the art of expression, confidence and unity. When they come together they are bunch of enthusiasts who motivate us to do better and make them self-sufficient. #humhaijunoonIf you want to be a part of their journey and support them follow this link: http://www.junoon.org.in/

Posted by Junoon on Sunday, 3 March 2019


उन्होने कहा कि ज्यादातर बच्चे पारधी समुदाय से हैं, जो गरीबी से त्रस्त है. घर में अस्थिर परिस्थिति, अनिश्चित भविष्य और भोजन, कपड़े और आश्रय जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण, परिवार भारत के सबसे महंगे शहरों में से एक के फुटपाथों पर रहने के लिए मजबूर हैं. वयस्क, जो ज्यादातर मामलों में बेरोजगार हैं, अपने बच्चों को भीख मांगने के काम में धकेल देते हैं. उन्होने आगे कहा कि बच्चों के लिए अपराध और गलत काम एक आम बात है और वह इस चीज़ को बदलना चाहती है.

हैमंती सेन ने एक समस्या के बारे में कुछ करने का फैसला किया, जो हम आये दिन देखते हैं. उन्होने एक बदलाव लाने की हिम्मत की, उन्होनें सपने देखने की हिम्मत की – मुंबई के सड़कों के बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का सपना देखा. जिन बच्चों को नजरअंदाज किया जाता है, उनकी उपेक्षा की जाती है और उन्हें भुला दिया जाता है, अगर हैमंती नहीं होती तो वे स्कूल जाने का सपना नहीं देखते. तर्कसंगत उनके योगदान के लिए सेन की सराहना करता है.

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