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कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवान की बेटी कहती हैं, कि युद्ध समाधान नहीं है

तर्कसंगत

Image Credits: Diksha Dwivedi/Facebook

March 13, 2019

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पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की जान चली गई और उसके बाद हम लोगों ने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के खिलाफ जंग छेड़ दी. चाहे फेक न्यूज़ के माध्यम से या अपने घर के सोफे पर बैठे स्थूल शरीर के अंदर के देशभक्ति के ज़ज़्बे को सोशल मीडिया पर डाल कर. बदले और प्रतिशोध की बात करना उनके लिए आसान है, जिनके कानों के पास से गोली नहीं गुज़री, मौत की सरसराहट भरी आवाज़ को नहीं जानते. इन लोगों का मानना है कि जंग ही समाधान है.

लेकिन जो लोग युद्ध के असर से गुज़रे हैं उन्हें मालूल है कि युद्ध की कीमत क्या होती है. एकमात्र अंतर यह है कि युद्ध, निर्दोष लोगों की मौत, विनाश, आँसू, निराशा और दुःख देने में सक्षम है. परिवार नष्ट हो जाते हैं, और युद्ध की मांग करने वाले अपने एक कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर देश को युद्ध में शामिल होने के लिए कहते हैं.

 

तर्कसंगत ने दीक्षा द्विवेदी से बात की, जिन्होंने युद्ध को करीब से देखा था, जब वह केवल आठ साल की थी. 1999 के कारगिल युद्ध में उनके पिता मेजर सीबी द्विवेदी शहीद हो गये. दीक्षा, अपनी बहन और अपनी माँ के साथ छुट्टी बिताने के लिए अपने पिता के पास श्रीनगर गयी थी, तब मेजर द्विवेदी को कारगिल जाने का आदेश मिला. वह आखिरी बार था जब उन्होंने अपने पिता को देखा था.

 

दीक्षा, अब अपनी किताब लेटर्स फ्रॉम कारगिलकी वजह से जानी जाती है, तर्कसंगत के साथ बातचीत में कहा. “मेरे पिता बहुत ही मिलनसार व्यक्ति थे, लेकिन उनसे दोस्ती करने के लिए मैं बहुत छोटी थी. मेरी बड़ी बहन पिता की सबसे अच्छी दोस्त बन गयी थी. वास्तव में, मैं उनके साथ लड़ती थी क्योंकि वह अपनी पढ़ाई के कारण मेरी बहन पर अधिक ध्यान देते थे. मैं उन्हें अपने जीवन में सबसे मजेदार और सबसे ज्यादा देखभाल करने वाले व्यक्ति के रूप में याद करती हूं. वो इस बात पता चलता है, कि अपनी छुट्टी के दौरान जब वह घर वापस आते थे, तो वह हमारे लिए अलग अलग तरह की सब्जी बनाते थे और हमारे खेलने के बाद शाम को कभी-कभी वह हमारे साथ बर्फ के गोले भी बनाया करते थे. मैं निश्चित रूप से जानती हूं कि यदि वह आज हमारे साथ होते, तो वीकेंड्स पर ड्रिंक शेयर करते हुए, हममृ ज़िन्दगी और हमारी महत्वाकांक्षाओं के बारे में बात करते होते क्योंकि मुझे लगता है कि मुझे यह सबकुछ उनसे ही मिला है”.

 

युद्ध पर दीक्षा का रुख

कारगिल युद्ध में जो हुआ, उसके बाद दीक्षा और अधिक उदार और दयालु हो गई. इस तरह की त्रासदी का सामना करते हुए, दीक्षा के मन में भी बदले की भाव थी लेकिन उन्होंने युद्ध का रास्ता नहीं चुना. ऐसे समय में जब आम आदमी सोचता है कि युद्ध समस्या को हल कर सकता है, वह एक शहीद की बेटी होने के नाते, ऐसा नहीं सोचती है.

 

उन्होंने कहा, “मैं हमेशा कहती हूं कि दो गलतियाँ कभी किसी एक फैसले को सही नहीं बना सकती हैं. 1999 में कारगिल युद्ध से पहले दूसरे पक्ष ने जो कुछ किया, उसके बावजूद हमारी सेना ने अभी भी यह सुनिश्चित किया है कि वह अपने नियमों और नैतिकता का पालन करें, जबकि वह एक ऐसे देश के साथ युद्ध में थे जिसने हमें पूरी तरह से धोखा दिया था. लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है – कि इसी वजह से हम जीत गए. क्योंकि हमने एक एक्शन लिया और बताया कि हम क्या हैं, हम कौन हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कितना धोखा झेला. इसलिए, एक युद्ध का जवाब दूसरा युद्ध नहीं हो सकता है”.

 

युद्ध और शांति हमेशा से बहस का विषय रहे हैं. देश, विशेष रूप से इस समय, दो हिस्सों में बंटा है, एक जो सोशल मीडिया पर लोगों को #SayNoToWar से प्रेरित कर रहा है और दूसरा, जो युद्ध के लिए बेताब हैं. इसी तरह, दीक्षा के जीवन में, ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिनकी राय उससे अलग है. जब उनसे पूछा गया कि वह इन लोगों के साथ कसिए डील करती हैं, तो उन्होंने कहा, “मैं यह समझने की कोशिश करती हूं कि वह ऐसा क्यों महसूस करते हैं और मैं हमेशा उनसे यह सवाल करती हूं, – क्या आप हथियार उठाकर तुरंत युद्ध के मैदान में जाएंगे? उनमे से ज्यादातर यह कहते हुए उत्तर देते हैं कि लेकिन तब हमें क्या करना चाहिए. चुप चाप बैठ कर देखते रहे”.

 

नहीं, देखो मत. बल्कि बेहतर समाधान खोजो जहां किसी और की जान जोखिम में न हो क्योंकि आप सिर्फ यही सोचते हैं कि यह सबसे अच्छा समाधान है, क्योंकि यह जीने का सबसे आसान और सुविधाजनक तरीका है. महसूस करने की कोशिश कीजिये, अपने आप को एक सैनिक के जूते में रखें और सोचें. यदि आप एक सैनिक होते तो क्या आप उसी तरह महसूस करेंगे? यदि आपका उत्तर हांहै, और आप ईमानदार हो रहे हैं, तो अपने जीवन को व्यर्थ न जाने दें और एक ऐसे पेशे में शामिल हों जिसके माध्यम से आप देश में वास्तविक अंतर ला सकें और इस समस्या के लिए एक कम विनाशकारी समाधान खोजने की कोशिश करें.

 

“एक अच्छे नागरिक बनें “

पिछले कुछ दिनों से, इंटरनेट पर केवल एक ही नाम – विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान चल रहा है. अभिनंदन ने हमारे देश को गौरवान्वित किया है और हमें यह विश्वास दिलाया है कि हर सैनिक को उनके नक़्शेकदम पर चलना चाहिए. मुसीबत के समय सूझ-बूझ से काम लेने की वजह से, सैनिकों और आम लोगों के लिए उन्हें एक हीरो का दर्जा दिया गया है.

 

विंग कमांडर अभिनंदन पूरे भारतीय सशस्त्र बलों का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व करते हैं. बस उसे देखकर मुझे घर पर होने का एहसास हुआ क्योंकि मुझे पता है कि मेरे पिता ने भी ऐसा ही किया होगा. इसी के लिये हमारे सैनिकों प्रशिक्षित है. उनके पास इसका कोई अन्य तरीका नहीं होता. मुझे उम्मीद है कि इस देश में हर बच्चा अपनी वीरता की कहानी सुनकर बड़ा होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सशस्त्र सेनाओं पर गर्व महसूस करेगा. उन्हें धन्यवाद देने का इससे बेहतर और कोई जरिया नहीं कि हम उनकी कहानियों को हमारे दिलों में जिंदा रखें. दीक्षा ने कहा, उनकी वीरता को सलाम करती हूँ, मुझे उन पर बहुत गर्व है. मुझे अगर मौका मिला, तो मैं उनसे और उनके परिवार के साथ व्यक्तिगत रूप से मिलने के लिए जाउंगी.

 

दीक्षा केवल इस विश्वास को मजबूत करती है कि एक तर्कसंगत दृष्टिकोण ही है जो इस दुनिया में शांति और न्याय लाएगा. सिर्फ इसलिए कि भारत में, एक माँ ने अपने बेटे, एक पत्नी, अपने पति और एक बेटी ने अपने पिता को खो दिया है, इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे देश में लोगों को उसी तरह से पीड़ित बनाने से समस्या का समाधान होगा.

 

दीक्षा को सभी भारतीय नागरिकों से कहना पड़ा, “एक जिम्मेदार नागरिक होना सरल है लेकिन हम इसे इतना कठिन बनाते हैं. हमारे सशस्त्र बल आतंकवाद से निपट रहे हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि एक आम आदमी को आतंकवाद से व्यक्तिगत रूप से निपटने की जरूरत है, लेकिन मेरे सभी नागरिकों से मैं यह कहना चाहती हूं कि अच्छे नागरिक बनें. एक सिपाही आपको जाने बिना आपके लिए एक गोली खाने के लिए तैयार है, और कम से कम आप यह तो कर सकते हैं कि आप अपने देश को साफ, हरा, अपराध-मुक्त रखने के लिए, कुछ प्रयास करे, क्यूकी जब वह घर वापस आता है, तो वह अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित होता है जो सुंदर लोगों से भरा हुआ है, जिन्हें एक लम्बी ज़िन्दगी जीने की जरूरत है”.

 

दीक्षा हमें विश्वास दिलाती है कि हमारे सैनिकों के जूते में कदम रखने और उनके काम को महत्व देने के लिए, तर्कसंगत होना, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युद्ध का जवाब देने का सही तरीका है. तर्कसंगत दीक्षा द्विवेदी की ताकत और मूल्यों के लिए सराहना करता है.

 

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