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पंजाब: क़र्ज़माफी जैसे उपाय किसानों की समस्या का समाधान नहीं करेंगे

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Image Credits: Jagran

March 13, 2019

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पंजाब  भारत का एक उत्तरी राज्य है जो पांच नदियों से घिरा हुआ है. यहाँ के कई क्षेत्र महान सिंधु घाटी सभ्यता का एक हिस्सा थे जिस कारण यहाँ उपजाऊ मिट्टी होती है. जिससे यह राज्य कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है. प्रदेश में चावल, गन्ना और कपास की पैदावार की जाती है और गेहूं यहाँ की सबसे बड़ी फसल है. राज्य में फल और सब्जियां भी व्यापक रूप से उगाई जाती हैं. पंजाब को “गेहूं का कटोरा” माना जाता है क्योंकि यह 164.720 लाख शुद्ध गेहूं का उत्पादन करता है.

हालाँकि हाल के दिनों में बढ़ते किसान कर्ज जैसी घटनाओं ने ज़मीन के मालिकों पर बहुत दबाव डाला है और कर्जमाफी इस समस्या का समाधान नहीं है. इस सप्ताह के शुरू में हजारों किसानों ने अमृतसर के पास जंडियाला में रेलवे पटरियों पर एक विरोध प्रदर्शन किया.

 

सहायता के लिए पुकार

1960 के दशक में हरित क्रांति का मार्ग प्रशस्त करने वाले इस प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई है जिसमें किसान कर्ज में डूब चुके हैं. उत्पादन रुकने की कीमत के साथ श्रम, ईंधन और उर्वरकों की लागत में वर्षों से वृद्धि हुई है. उपजाऊ मिट्टी में रसायनों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के कारण पानी रोकने की क्षमता भी कम हो गई है. किसानों की बर्बादी का कारण बारिश का कम होना रहा है. भूजल का उपयोग प्रदेश की  73% भूमि को सिंचित करने के लिए किया जा रहा है जिसके कारण भूजल स्तर में तीव्र गिरावट आई है. इसके अलावा यहाँ ट्यूबवेलों की खुदाई पर भी कोई नियम नहीं हैं.

गेहूं और धान एक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के साथ फसलों की श्रेणी में आते हैं. हालाँकि धान उगाने में पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है और इस कारण पानी धीरे धीरे खत्म हो रहा है जो ज्यादा समय के लिये मिट्टी की उर्वरता को कम करता है. अन्य फसल की कीमतें भी असमान और अनियमित हैं. जब किसान अन्य फसलों को उगाने की कोशिश करते हैं तो बाजार और उससे होने वाली कमाई मुश्किल हो जाती है. खेती लगातार बढ़ती जा रही है. छोटे किसान नुकसान से बचने के लिए खेती के बजाय अपनी जमीन को पट्टे पर दे देते हैं. इन सभी कारणों की वजह से किसान वित्तीय संस्थानों या निजी साहूकारों से पैसे उधर ले लेते हैं. कर्ज में डूबे ये किसान जब कर्ज चुकाने में असमर्थ होते हैं तो दबाव में आकर आत्महत्या कर लेते हैं.

किसान और सरकार

पंजाब भर में लगभग 10.93 लाख किसान हैं जिनमें से 2.04 लाख (18.7%) सीमांत किसान हैं (जिनके पास 2.5 एकड़ से कम जमीन है), 1.83 लाख (16.7%) छोटे किसान (2.5 एकड़ या 5 एकड़ तक) और 7.06 लाख (64.6%) किसानों के पास दो हेक्टेयर से अधिक है.

2017 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के उम्मीदवार कैप्टन अमरिंदर सिंह ने वादा किया था कि उनकी सरकार पूरी कर्जमाफी योजना के साथ किसान आत्महत्या के मामलों को खत्म कर देगी लेकिन यह योजना सत्ता में आने के साथ ही कमजोर पड़ गई. ऋण माफी योजना में केवल उन्हीं ऋणों को शामिल किया गया है जो बैंकों और सहकारी समितियों से लिये गये थे जिसने सीमांत और छोटे किसानों को ऋण देने वाली संस्थाओं से 2 लाख रुपये तक के ऋण के लिए राहत प्रदान की.

 

कर्ज में डूबे किसान अपनी जान खुद ले लेते हैं

 

 

पिछले दो वर्षों में 900 से अधिक किसानों और मजदूरों ने आत्महत्या की है. भारतीय किसान यूनियन ब्लॉक के प्रेस सचिव सुखपाल माणक आंकड़ों के अनुसार जब कांग्रेस सरकार ने 2017 में पदभार संभाला था, तब से पांच पंजाबी अखबारों में किसान आत्महत्या से जुड़ी कई खबरें छपीं हैं. सूची में बताया गया है कि वास्तविक संख्या अधिक हो सकती है क्योंकि उन्होंने स्थानीय और समाचार चैनलों, हिंदी और अंग्रेजी अखबारों और वेब पोर्टलों में दर्ज आत्महत्याओं को शामिल नहीं किया है.

दो साल के समय में कई किसानों की आत्महत्या करने की रिपोर्टें सरकार की विफलता के कारण उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान करने में असफल रही है. जिन किसानों ने अपने जीवन के चरम कदमों का सहारा लिया वे या तो योजना के दायरे में नहीं आये या निजी साहूकारों से कर्ज लिया है जिसे वे चुका नहीं पाये. द ट्रिब्यून ने बताया कि एक 40 वर्षीय कर्ज में डूबे किसान गुरमेल सिंह ने तब आत्महत्या कर ली जब वह खेत का कर्ज नहीं चुका पा रहा था. अपने सुसाइड नोट में पीड़ित ने बढ़ते कर्ज को कारण बताया और कहा कि राज्य सरकार ने कोई राहत नहीं दी है.

 

राज्य सरकार की प्रतिक्रिया

24 जनवरी को आनंदपुर साहिब में अपनी सरकार की कर्ज माफी योजना के तीसरे चरण के शुभारंभ के दौरान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा “अकेले राज्य सब कुछ नहीं कर सकते हैं और उन्हें केंद्र से भी सहायता की आवश्यकता है”

उनकी मौजूदा योजना के विस्तार में अब लगभग 2.85 लाख किसानों को राहत प्रदान करने वाली प्राथमिक सहकारी कृषि सेवा समितियों के खेत मजदूर और भूमिहीन किसान सदस्य शामिल हैं.

 

विशेषज्ञों के अनुसार समाधान

वरिष्ठ कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर जियान सिंह का कहना है कि कर्ज माफी किसानों के दुख का समाधान नहीं है. एक स्थायी समाधान तब होगा जब किसानों को पहली जगह पर ऋण लेने की आवश्यकता ना हो या यदि वे ऐसा करते हैं तो वे इसे आसानी से चुकाने में सक्षम हों.

इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने बताया  ” ऋण माफी झूठ है इसलिये जरूरत कृषि नीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है. सवाल यह है कि किसानों की आय को दोगुना कैसे किया जाये जिसने सभी सरकारों ने संबोधित करना शुरू कर दिया है. जरूरत ऐसी नीतियों को शामिल करने की है जो किसान की आय को बढ़ा सके या उसे दोगुना कर सके ताकि खेती लाभदायक या जीवनदायी बन सके.”

उन्होंने सुझाव दिया “किसानों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिये तकनीकी भी का सहारा लिया जाना चाहिए जिससे किसान निजी साहूकारों से पैसा उधार लेने के लिए मजबूर न हों और ना ही उसे फिर से कर्ज लेना पड़े. अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो किसान खुद को कभी भी कर्ज से मुक्त नहीं कर पाएंगे. सरकारें आयेंगी और कर्ज माफ कर देंगी, लेकिन किसान तब तक कर्ज के दलदल में फंसे रहेंगे जब तक उनकी आय दोगुनी नहीं होगी.”

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