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अष्विता शेट्टी: बीड़ी रोलर की बेटी से टेड स्पीकर तक की यात्रा

तर्कसंगत

March 15, 2019

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“ग्रामीण भारत में, लड़कियों को आम तौर पर बेकार माना जाता है. वे एक दायित्व या बोझ हैं.” यह बात अष्विता शेट्टी ने अपने चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ टेडवुमन 2018 में कही. हालांकि, कैलिफोर्निया में टेड टॉक दर्शक इस बात को समझ नहीं पा रहे थे, लेकिन एक हजार मील दूर, भारत में, अपने टीवी पर शो देख रही लड़किया उनके कहने का मतलब समझ रही थी. अष्विता, जिन्होंने अपनी कहानी को तमिलनाडु के एक छोटे से शहर मुकुदलल से कैलिफोर्निया तक पहुंचाया, लोगों को यह बताने के लिए कि ग्रामीण भारत में एक लड़की किस चीजों का सामना करती है.

तर्कसंगत से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे परिवार में एक दायित्व के रूप में माना जाता था. अपने स्वयं का मंतव्य को जानने के लिए और इस दुनिया में कुछ योगदान देने के लिए मैंने समझा कि शिक्षा महत्वपूर्ण है. ”पहली बार तब अष्विता ने महसूस किया कि शिक्षा महत्वपूर्ण है जब उन्होने अपनी माँ की मजदूरी के वेतन की बुक देखी. एक दिन, उनकी माँ जो बीड़ी बनाने वाली है, ने उन्हे दिन भर में जो कुछ कमाया था, उसकी गणना करने को कहा. जब अष्विता ने बुक देखी तो उसने हस्ताक्षर के बजाय अपनी मां के अंगूठे के निशान के हर पन्ने के अंत में देखा. यह बात ने उन्हें आशर्यचकित कर दिया. उन्हे एहसास हुआ कि अगर वह अपनी माँ को पढ़ा सकती है, जो कभी पढ़ने के लिए स्कूल नहीं गई है, तो इससे उनकी ज़िंदगी बदल सकती है. उन्होने अपनी मां  को उनका नाम लिखना सिखाया. कई प्रयासों के बाद जब वह अंत में अपना नाम लिखने में सफल हुई, तो अष्विता ने देखा कि उनकी माँ का चेहरा गर्व के साथ चमक रहा था. इसने उन्हे समझा दिया कि वे इस दुनिया के लिए कुछ काम आ सकती है. “जैसा कि मैंने अपने जीवन में पहली बार उन्हे ऐसा करते हुए देखा, मुझे एक अनमोल एहसास हुआ कि मैं इस दुनिया के लिए कुछ काम की हो सकती हूं.” यह एहसास उनके लिए बेहद खास था. “हम सब एक वास्तविकता में पैदा हुए हैं जिसे हम आँख बंद करके स्वीकार करते हैं – जब तक कि कोई दूसरी चीज़ हमें जगाती है और हम एक नई दुनिया मैं कदम रखने को तैयार होते है” शेट्टी ने कहा.



पुरुषप्रधान समाज के साथ भारत प्रगति कर रहा है  

उन्होने याद करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण और उपयोगी महसूस करना कुछ ऐसी चीजें हैं जो ग्रामीण भारत में लड़कियों को प्राप्त नहीं हैं. भारत निश्चित रूप से अपने उभरते आईटी और इंफ्रास्ट्रक्टर के साथ एक विशाल दर पर विकास कर रहा है. जबकि प्रमुख शहरों ने महिलाओं की क्षमताओं और कौशल को स्वीकार किया है, ग्रामीण भारत के कुछ हिस्सों में अभी भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है. अष्विता ने समाज के पितृसत्तात्मक मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहा कि दुख की बात यह है कि लड़कियों को केवल खाना पकाने या साफ-सफाई करने के लिए ही अच्छा समझा जाता है.



गाँव की एक गरीब लड़की

अष्विता खुद को “एक गरीब गांव की लड़की” के रूप में वर्णित करती है. छोटी उम्र से, परिस्थितियों ने उन्हे विश्वास दिलाया कि वह अपने जीवन से कुछ उम्मीद नहीं कर सकती है और उसकी आवाज किसी कोई नहीं सुनेगा. अपने परिवार की दूसरी बेटी होने के नाते उन्होने हमेशा ऐसे बयान सुनाए कि वह अवांछित है. बचपन में, जब वह अपनी माँ के साथ बीड़ी रोल करती थी, तो वह सोचती थी कि उसका भविष्य कैसा होगा. वह अक्सर अपनी मां से यही सवाल पूछती थी, लेकिन उनकी मां जवाब में हमेशा हल्का सा मुस्कुरा देती थी. अष्विता समझ गई कि उनकी माँ उनके सपनों को हतोत्साहित नहीं करना चाहती थी, लेकिन उन्होने महसूस किया कि उनके सपने एक गरीब ग्रामीण लड़की के लिए बहुत बड़े थे.

 



हेलेन केलर उनकी प्रेरणा बनी

अष्विता  हमेशा पढ़ाई में व्यस्त रहती थी. जब वह तेरह वर्ष की थी, तब उन्होने ऐसे लोगों की आत्मकथाएँ पढ़ना शुरू कर दिया, जिन्हें अपने जीवन में कठिनाई का सामना करना पड़ा, लेकिन उसके बावजूद भी वे उठे और आगे बढ़े .  “मैं अपने गाँव के पुस्तकालय में जाती थी और जितना हो सकता था खत्म करने की कोशिश करती थी. उनके संघर्ष ने मुझे एहसास दिलाया कि मैं भी किसी दिन इस समाज से बाहर निकल सकती हूं. एक व्यक्ति जिसने उसे सबसे अधिक प्रेरित किया वह थी हेलन केलर. उन्होने उनकी अदम्य भावना की प्रशंसा की. यह तब था जब वह अपनी तरह एक कॉलेज की डिग्री चाहती थी. “मुझे अपने पिता और अपने रिश्तेदारों के साथ मुझे कॉलेज भेजने के लिए लड़ना पड़ा.” उन्हे कुछ समय लगा, लेकिन उन्होने आखिरकार अपने परिवार को मना लिया. उन्होने नल्लूर के एक कॉलेज से बीबीए किया. एक बस में उन्हे 1.5 घंटे से अधिक की यात्रा करनी थी क्योंकि कॉलेज एक अलग गाँव में था.



पढ़ाई के लिए गाँव के बाहर कदम रखना एक गेम चेंजर था

“कम उम्र में शादी एक ऐसी चीज है जिससे हम सभी लड़कियां डरती हैं. बचपन में मैंने जो सपना देखा था, उसे आगे बढ़ाने में नाकाम रहने के डर ने मुझे वास्तव में डरा दिया था. वह समझ गई कि उन्हे इस जगह से बाहर निकलना है वरना उनके भाग्य का फैसला उनके माता-पिता द्वारा किया जाएगा. इससे दूर होने के लिए उन्होने दिल्ली में फेलोशिप प्रोग्राम के लिए आवेदन किया. वह फॉर्म भरने के लिए एक जूनियर का फोन लेती था क्योंकि उसके पास कंप्यूटर नहीं था. एक वर्ष के कार्यक्रम के लिए उन्हे पूरी छात्रवृत्ति मिली. उसके संदेहपूर्ण माता-पिता ने अंततः कार्यक्रम के महत्व को समझा और उसे आगे बढ़ने दिया। यह पहली बार था कि उन्होने पढ़ाई करने के अपने राज्य से बाहर कदम रखा.



अंत में जो चाहा वो मिला 

हालांकि, भेदभाव ने उन्हे कभी नहीं छोड़ा. वह सिर्फ एक ही थी जो गाँव से थी. जब उनका कोर्स पूरा हो गया, तो उन्हे लगा कि अब वह किसी के लिए दायित्व या बोझ नहीं है. आखिरकार उन्हे दुनिया की एक झलक मिल गई जिसकी उसे लालसा थी. कार्यक्रम के बाद, उन्होंने एक प्राथमिक स्वास्थ्य संगठन में काम किया. एक साल वहाँ काम करने के बाद, वह अपने गाँव लौट आई और बोधि ट्री फाउंडेशन नामक एक गैर-लाभकारी संगठन की स्थापना की. वह समझती हैं कि ग्रामीण पक्ष के युवाओं को अपने सपनों को हासिल करने में मदद करने के लिए एक पुल की आवश्यकता होती है. एनजीओ ने यह पुल प्रदान किया. अब तक, NGO तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिलों में अपने कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 2,400 ग्रामीण स्नातकों तक पहुँचता है.

 


यह सच है कि अष्विता ने जो सपना देखा था उसे हासिल किया. “संकुचित समाज” से बाहर निकलने की उनकी लालसा हुई, और अब वह एक स्वतंत्र मेहनती महिला हैं, जिन्होंने अपना जीवन समाज कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है. जब हमने अपने पाठकों से कोई संदेश पूछा, तो उन्होने कहा, “मुझे विश्वास है कि महात्मा गांधी ने जो कहा था – अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप दूसरों की सेवा में खुद को खो दें.”

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