सप्रेक

डॉ. सीमा राव भारत की पहली महिला कॉम्बैट ट्रेनर जिन्होनें 20000 सैनिकों को ट्रेनिंग दी है

तर्कसंगत

Image Credits: Wikipedia
12/17/18, 10:40 AM

March 15, 2019

SHARES

भारत की पहली महिला कमांडो ट्रेनर, डॉ. सीमा राव ने भारत के सबसे बेहतरीन सशस्त्र बलों (जिसमें पुलिस कर्मी, सैनिक, अर्धसैनिक बल और कमांडो शामिल हैं) के 20,000 से अधिक सैनिकों को अपने जीवन के दो दशकों से अधिक समय तक बिना किसी मुआवजे के क्लोज क्वार्टर बैटल (CQB) सिखाया है. सैन्य मार्शल आर्ट में एक 7-डिग्री ब्लैक बेल्ट धारक, एक कॉम्बैट शूटिंग ट्रेनर, एक फायर फाइटर, एक स्कूबा डाइवर, रॉक क्लाइम्बिंग में एक एचएमआई पदक विजेता और वंडर वुमन के नाम से ‘फोर्ब्स इंडिया 2019 डब्ल्यू-पावर ट्रेलब्लेज़र‘ में चित्रित किया गया है.



कौन हैं डॉ. सीमा राव?

द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए वो कहती हैं “मैं सिर्फ एक नागरिक हूँ जो राष्ट्र के लिए अपना काम कर रही है” 49 वर्षीय राव ने कहा. उन्हें असाधारण सेवा के लिए तीन सेना प्रमुख नागरिक, अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वयंसेवी सेवा पुरस्कार और एक विश्व शांति राजनयिक पुरस्कार मिला है. उन्हें प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार 2019 से सम्मानित किया गया, जो भारत में अनुकरणीय महिलाओं के लिए सर्वोच्च नागरिक सम्मान है.

डॉ. सीमा राव ब्रूस ली द्वारा बनाई गई एक विशेष मार्शल आर्ट प्रशिक्षण, जीन कून डो को सिखाने वाली दुनिया भर में केवल 10 महिला प्रशिक्षकों में से एक हैं. उन्होंने भारतीय वायु सेना के पाठ्यक्रम में स्काइडाइविंग करके अपने पैरा विंग्स भी अर्जित किए हैं. दिमाग के साथ सुंदरता का एक जीता-जागता उदाहरण सीमा को प्रतिष्ठित मिसेज इंडिया वर्ल्ड ब्यूटी पेजेंट में फाइनलिस्टों में से एक रही है और उन्होंने युद्ध तकनीकों और विस्फोटक उपकरणों पर कई किताबें लिखी हैं, जो भारतीय सशस्त्र बलों और यूएस के एफबीआई के पुस्तकालयों में पाई जा सकती हैं.

उन्होंने भारत की पहली मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स फिल्म- हाथापाई भी बनाई है, जिसे उन्होंने अभिनय, और गायन के अलावा निर्देशित भी किया है.

पारंपरिक चिकित्सा में प्रमाणित चिकित्सक होने और क्राइसिस मैनेजमेंट में एमबीए होने के बावजूद, उन्होंने देश की सेवा करने के लिए सुरक्षित और आरामदायक जीवन त्यागने का फैसला किया.



बचपन: प्रेरणा के दिन

अपनी TEDx वार्ता के दौरान दुनिया भर के लोगों से बात करते हुए सीमा ने एक स्वतंत्रता सेनानी के यहाँ अपने जन्म लेने के बारे में बात की और किस तरह से उनकी परवरिश ने उनके जीवन को आकार दिया ये भी बताया. स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दिनों की उनके पिता की कहानियों ने उन्हें देश की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया.

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, “स्कूल में एक बच्चे के रूप में मैं कमजोर थी और डरी रहती थी, मैं चारों ओर घिरी रहती थी और घबरा जाती थी, और मैं उसे बदलना चाहती थी.”



वयस्कता

जब वह चिकित्सा में अपनी पढ़ाई कर रही थी, तो वह बहुत कम उम्र में एक ऐसे व्यक्ति से मिली और शादी की, जिसने उसकी यात्रा में महत्वपूर्ण और अपरिहार्य भूमिका निभाई है. डॉ. दीपक राव, जो 12 साल की उम्र से मार्शल आर्ट का अभ्यास कर रहे थे, उन्होनें ही उन्हें इस सशक्त क्षेत्र से परिचित कराया, बाद में उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा मेजर की रैंक प्राप्त हुई.

सीमा ने अपने पति के तहत प्रशिक्षण लिया, क्योंकि वह चाहती थी कि “बचपन का धमकाने और डरने वाला समीकरण बदल जाए” और वह एक एक वाक्ये को आज भी याद करती है जिसने सब कुछ बदल दिया.

1990 के दशक की शुरुआत में, शादी के बाद, दंपति दक्षिण मुंबई के गिरगाम चौपाटी में कूड़ा उठाने वाले लोगों के साथ भिड़ गए, जहां वे हर सुबह ट्रेनिंग लेते थे. “यह तुम्हारी लड़ाई है, इससे खुद निपटो. आप तैयार हैं, ”उनके पति ने उन्हें ऐसा कह कर अकेले लड़ने दिया. “मैं अभी भी सिहर जाती हूँ. लेकिन उसके बाद, मुझे लगा कि मेरे अंदर एक अलग व्यक्ति का जन्म हुआ है”. फोर्ब्स इंडिया से अपनी एक इंटरव्यू में उन्होनें कहा ” मुझे पता था कि मैं आखिरकार कमजोरी से ताकत की ओर बढ़ गयी थी जहाँ दूसरे नहीं मैं दूसरों को नियंत्रित कर सकती थी.

 

यात्रा

तब से दंपति ने देश की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने के तरीकों पर सोचना शुरू कर दिया. उन्होंने सेना में सेवारत सैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए चुना क्योंकि वे भारत की रक्षा करने वाले कर्मियों की सेवा करना चाहते थे और उनकी सहज और युद्ध कलाओं में शामिल रहने की आवश्यकता थी.

सीमा ने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में बताया “मेरे पति के साथ एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मेरी निहत्थे युद्ध शक्ति से काफी प्रभावित थे, और यह सब अचानक हुआ था. उसके बाद से मैं सेना को इसकी ट्रेनिंग देने लगी. 

जल्द ही उन्हें विभिन्न प्रशिक्षण कार्यशालाओं के लिए बुलाया गया और उन्होनें राज्य पुलिस बलों, सीमा सुरक्षा बलों, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्डों को सशस्त्र और निहत्थे लड़ने की ट्रेनिंग दी, क्लोज क्वार्टर कॉम्बैट तकनीक और रिफ्लेक्स शूटिंग तकनीक में भी बिना किसी तरह का पैसा लिए हुए ट्रेनिंग दी.


एक महिला कमांडो ट्रेनर की चुनौतियां

यह ठीक ही कहा गया है कि सार्थक कुछ भी कभी आसान नहीं होता है और ऐसा सीमा के साथ भी हुआ है, इतनी योग्यता के बाद भी, उन्हें कठिन दिनों का सामना करना पड़ा. एक सिविलियन को आर्म्ड फोर्सेज को त्रीन्ग देना आसान नहीं है खासकर के जब वो एक महिला हो.


“न केवल मुझे उन्हें अनुशासित करना था, बल्कि मुझे अपने सिखाने की क्षमता में उनका विश्वास हासिल करना था. आखिरकार, मैं उन कमांडो के सम्मान को हासिल करने में कामयाब रही जिन्हें मैंने सिखाया है.

अपने ट्रेनिंग देने के तरीके के बारे में बात करते हुए वो बताती हैं, “शूटिंग के पारंपरिक तरीके आम तौर पर सटीक निशाना लगाने और फिर शूटिंग करने के लिए कई सेकंड का उपयोग करते हैं. यह लंबी दूरी की लड़ाई में फायदेमंद है जब दुश्मन को 300 गज दूर से मारना है, जो एक चट्टान के पीछे छिपा हो. लेकिन जब दुश्मन सिर्फ 20 गज की दूरी पर और आपके सामने होता है, तो सटीक लक्ष्य के लिए बहुत अधिक समय का उपयोग किए बिना अचूक निशाना शूटिंग की आवश्यकता होती है. आधुनिक युद्ध में इस जरूरत को पूरा करने के लिए, हमने ‘राव सिस्टम ऑफ़ रिफ्लेक्स फायर’  को तैयार किया है. भारतीय बलों ने इसे बहुत फायदेमंद पाया है.”



व्यक्तिगत चुनौतियाँ

चूंकि दंपति ने अपनी सेवा के लिए कोई भी पोऐसा न लेने का मन बना लिया था, तो इसके साथ जुडी कुछ दिक्कतें भी थी. उन्हें अपनी संपत्तियों को बेचने और यहां तक ​​कि एक चॉल में रहने के साथ वित्तीय जटिलताओं को दूर करना था, लेकिन कुछ भी उन्हें अपने लक्ष्यों का पीछा करने से हतोत्साहित नहीं कर पाया.

शारीरिक रूप से, सीमा को दो बड़ी चोटें लगीं – एक रीढ़ की हड्डी का फ्रैक्चर और दूसरा सिर में चोट लगने की वजह से भूलने की बीमारी (जहां वह अपने पति को छोड़कर किसी को याद नहीं रख सकती थी) – यह सब  प्रशिक्षण देने के दौरान ही हुआ. द इंडियन एक्सप्रेस ने कहा कि सीमा को अपने पर संदेह हुआ लेकिन  फिर उन्होनें सोचा कि ” हारना बुज़दिलों का रास्ता है.”

चूंकि प्रशिक्षण एक निरंतर और कठिन कार्य है, और इसमें प्रशिक्षक को हमेशा अपने स्वास्थ्य के चरम पर रहने की आवश्यकता होती है और फिटनेस के लिए इस प्रतिबद्धता के कारण उन्होनें बच्चा जन्म न देने का फैसला किया. हालांकि, बाद में उन्होनें एक लड़की को गोद लिया और उसे अपनी बेटी की तरह पाला.

जब वह ट्रेनिंग नहीं दे रही होती तो सीमा अंधेरी में अपने अकादमी ऑफ़ कॉम्बैट फिटनेस में पुरुषों के साथ मुक्केबाज़ी में अपना समय बिताना पसंद करती हैं. “मैं मुक्केबाजी में मेरी उम्र के आधे और मेरे आकार से दोगुने मर्दों से लड़ती हूँ और उन्हें हराती हूँ.”

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...