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Sacred Games की यह सितारा शौचालय का निर्माण करती है और मराठवाड़ा गाँव के ग्रामीणों को सशक्त बना रही हैं

तर्कसंगत

March 20, 2019

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राजश्री देशपांडे या Sacred Games में लोकप्रिय सुभद्रा गायतोंडे के किरदार से पहचान बनाने वाली, ये कोई आम अभिनेत्री नहीं हैं. जब वह अपने एक्टिंग से दर्शकों को लुभा नहीं रही होती हैं, तब आप उन्हें मराठवाड़ा के गांवों में पाएंगे, वह वहां शायद दो ग्रामीणों के बीच के झगड़े को सुलझाती दिख जाएँगी या ग्रामीण बच्चों के बीच बैठकर उनकी कविताओं को सुनती रहती है. एनजीओ नभंगन फाउंडेशन की संस्थापक, राजश्री की विनम्रता आपको चकित कर देगी. तर्कसंगत के साथ बातचीत में, उन्होंने अपने बचपन से लेकर भारत की रीढ़ की हड्डी ग्रामीण क्षेत्रो में स्थायी बदलाव लाने के अपने संकल्प तक का सपना सब कुछ शेयर किया.

 

आपके एनजीओ, नभंगन फाउंडेशन हाल ही में शुरू किया गया था. इसके पीछे की कहानी क्या है?

मैं पिछले 5-6 सालों से सामाजिक क्षेत्र में काम कर रही हूं. फिर मैंने अभिनय को आगे बढ़ाने के लिए अपनी विज्ञापन की नौकरी छोड़ दी. इसलिए जब मैं पहली बार पुणे से मुंबई गयी, तो मेरे पास अचानक बहुत समय रहने लग गया, जिसे मैंने सिनेमाघरों में, पढ़ने, लिखने और घूमने में बिताया. फिर मैंने नेपाल में भूकंप राहत कार्यों के लिए स्वेच्छा से सेवा दी और धीरे-धीरे  मैं बहुत सारे सामाजिक कारणों में सक्रिय रूप से शामिल हो गयी.

जैसा कि आप जानते हैं, महाराष्ट्र में सूखा पड़ना हमेशा से ही एक बड़ी समस्या रही है. कहीं और काम करते हुए, यह मुझ पर हावी हो गया कि यह मेरा क्षेत्र है, जिन गांवों में मैं पली-बड़ी हुई थी. मेरे रिश्तेदार अभी भी वहां रह रहे थे. मैंने स्थिति को अधिक बारीकी से जांचने का फैसला किया. आप ऐसे देखो, कि मैंने बचपन से ही लोगों को पानी के लिए कतारों में खड़े हुए देखा है. सूखे ने मेरे पिता को खेती छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.

 

 

मैं हमेशा अपनी मां से प्रेरित रही हूं जिन्होंने हर संभव तरीके से लोगों की मदद की. उनकी सीमाएँ थीं – आर्थिक परेशानियाँ या पारिवारिक जिम्मेदारी, वह फिर भी मदद करने में कभी नहीं हिचकिचाती थी. मेरी बड़ी बहन जो कि एक डॉक्टर हैं, उसने एक गाँव में एक क्लिनिक की शुरुआत की है, जहाँ पर पिछड़े/ग़रीब ग्रामीणों का मुफ्त में इलाज करती है. मुझे एहसास हुआ कि कैसे मेरा परिवार हमेशा जरूरतमंदों के साथ खड़ा था, और अब मेरी बारी थी. तब तक, मैं केवल पैसे के लिए भाग रही थी क्योंकि मैंने इसे अपने जीवन में कभी नहीं देखा ही नहीं था और अब मुझे बदलने की जरूरत थी.

सब कुछ पक्का करने के लिये, मैंने मराठवाड़ा की यात्रा की और देखा कि लोग किस तरह पीड़ित हैं. मैंने एक छोटे से गाँव, पंधरी को चुना. मेरे पास एक बड़ा रातोंरात बदलाव लाने के लिए लोग या पैसा तो नहीं था, लेकिन कम से कम मैं उनकी फिर भी किसी न किसी तरह से तो मदद कर ही सकती थी, और इस तरह से एक अस्थायी परियोजना के साथ मेरे कार्य की एक गांव में शुरूआत हो गयी. मैं निरंतरता बनाए रखने के लिए काम को जारी रख रही हूं. ज्यादातर समय, जैसे ही एक प्रोजेक्ट पूरा होता है उसके बाद विकास का काम रुक जाता है; और मैं ऐसा नहीं चाहती. मुझे हर कदम पर इस बात का ध्यान रखना है. मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूं, और मैं असफल भी हो सकती हूँ, लेकिन मैं एक हमेशा रहने वाले स्थायी परिवर्तन लाने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रही हूं.

आर्थिक रूप से काम का समर्थन करना अकेले एक व्यक्ति के लिए संभव नहीं था. यही कारण है कि जब मैंने अपना एनजीओ पंजीकृत किया तो मैंने सोचा ना कि सिर्फ़ एक व्यक्ति के लिये बल्कि तमाम लोगों को दान करने के लिए एक तो मंच होगा.

 

पंधरी को किन प्रमुख मुद्दों का सामना करना पड़ा?

पंधरी, महाराष्ट्र के औरंगाबाद के करीब एक छोटा सा गाँव है. जल संकट यहाँ एक मुख्य मुद्दा था. गाँव में शौचालय का भी अभाव था. लोगों का मानना था कि शौचालय में अतिरिक्त पानी खर्च होता है. वे अपने घर के भीतर शौचालय बनाने के लिए तैयार नहीं थे. “हम जहां खाना बनाते हैं, वहां शौचालय कैसे हो सकता हैयह एक गंभीर मानसिकता थी. पानी के बिना खेती भी बेकार थी.

 

आपने ग्रामीणों का विश्वास कैसे जीता?

किसी का विश्वास हासिल करने के लिए, आपको उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनना होगा, उनकी कहानियों को सुनना होगा, सुख और दुख में उनके साथ रहना होगा, उनके संघर्षों को हल करना होगा – जो कि मैंने करने की कोशिश की, छह महीनों के लंबे समय तक. अब, गाँव का हर घर अच्छी तरह से जानता है कि यह ताई (दीदी) आती है, और हमारी समस्याओं को हल करने की कोशिश करती है.

 

 

पंधरी में आपने क्या कुछ परियोजनाएँ शुरू कीं?

वर्षा जल संचयन पहली परियोजना थी. मैं पर्यावरणविद् डॉ. गोखले के संपर्क में आयी, जिन्होंने ग्रामीणों के लिए एक जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया. मैंने उसे गाँव की नदी (बेमबला) दिखाई, जो सूख चुकी थी. और उनके मार्गदर्शन से, हमने नदी को खोदा और हर दूसरे कार्य को वैज्ञानिक तरीके से किया.

पैसा हमेशा से ही एक मुद्दा था, इसलिए मैंने फेसबुक पर इसके बारे में पोस्ट किया और योगदान के लिए अपील की. वरुण ग्रोवर और नीरज घायवान दोनों ने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार की राशि का दान करके मेरे साथ मदद करने आ गये.

मेरे पास लोगों की भी कमी थी. मैंने खुद से काम करने के लिए ग्रामीणों को बहुत प्रेरित करने की कोशिश की, बार-बार की बैठकों के बाद, वालंटियर्स की संख्या 5 से बढ़कर 50 हो गई. मैंने मकरंद अनसपुरे से मदद का अनुरोध किया और उन्होंने मुझे एक खुदाई मशीन मुफ्त में प्रदान की. 1.5 लाख रुपये, 50 लोग और एक खुदाई मशीन के साथ, हमारे पास काम पूरा करने के लिए 15 दिन (2015 में आधिकारिक मानसून की तारीख से पहले) थे.

45 डिग्री सेल्सियस पर भी दिन और रात काम करना, मेरे किसानों ने समय पर परियोजना को पूरा किया. और फिर बारिश हुई. जब ग्रामीणों ने नदी को पानी के साथ बहते हुए देखा, तो वह सभी खिलखिला गये, कि हां हम सभी ने ऐसा किया है.

 

वहां से चीजें आगे कैसे बढ़ीं?

आगे, हमने स्वच्छता की दिशा में काम करना शुरू किया. मैंने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि शौचालय अब जरूरी है क्योंकि आपके अब पास पानी का संकट नहीं है. मानसिकता को बदलना एक और चुनौती थी, मुझे स्वच्छता की आवश्यकता के बारे में समझाने के लिए मुझे बहुत समय और धैर्य से काम लेना पड़ा.

 

 

एक शौचालय बनाने के लिए सरकार लगभग 12 हजार रुपये का भुगतान करती है. मैंने पैसे के लिए सरकारी लोगों से मिलना भी शुरू किया. वह नहीं जानते थे कि मैं कौन हूँ, और मुझे “कल आओ”, “परसो आओ”, “शाम को आओ”, “अगले हफ्ते कॉल करनाका बहुत सामना करना पड़ा. बार-बार जाने और इंतजार के दिनों के बाद आखिरकार, ग्रामीणों को उनका पैसा मिल गया.

मुझे पता है कि मैं आसानी से दान मांग सकती थी और उनके लिए शौचालय बनवा सकती थी, लेकिन मैं गाँव वालों में प्रेरणा पैदा करना चाहती थी. सभी ने पहले कुछ लोगों के उदाहरण का पालन किया जिन्होंने अपने स्वयं के शौचालय, जल निकासी व्यवस्था का निर्माण किया, ईंटें बिछाईं और दीवारों को रंग दिया. मुझे उन पर बहुत गर्व महसूस हुआ और जबसे उन्होंने इसे अपने हाथों से बनाया, मुझे पता था कि वह इसे ठीक से बनाए रखेंगे.

मराठवाड़ा में हर साल हजारों और करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन हमें कोई स्थायी जमीनी हकीकत नहीं दिखती है. आखिर क्यों, क्योंकि मुझे लगता है प्रेरणा की कमी है. मैं सोशल मीडिया पर सांख्यिकीय अपडेट नहीं देखना चाहती, जैसे कि “पूरा महाराष्ट्र खुले में शौच के खतरे से मुक्त है,” जब मेरे अपने गांव में अभी भी हर घर में शौचालय नहीं है.

मैं ग्रामीणों में इस विचार को भरने की कोशिश कर रही हूं कि आपको किसी पर निर्भर रहने की जरुरत नहीं है. आप अपने आप को फिर से सुधारने की कोशिश करो, अपनी खुद की समस्याओं का हल ढूंढकर. तुम खुद अपनी जिंदगी संभालो(आप अपने जीवन को सही करो). मुझे पता है कि मैं हजारों गांवों को नहीं बदल सकती, लेकिन मैं लोगो की मानसिकता में बदलाव लाने की कोशिश कर रही हूँ, इसलिए आने वाली पीढ़ियों का समग्र विकास से पूर्ण होगा. इसमें समय लगेगा, लेकिन मैं कोशिश करना नहीं छोड़ूंगी.

 

महिलाओं और बच्चों के साथ अपने काम के बारे में बताइये 

मैंने महिलाओं के साथ बैग बनाने का काम शुरू किया है, जिसमें एक मित्र द्वारा अतिरिक्त कपड़े दान किए गए हैं. मैं उन्हें सीखने के लिए जोर देती हूं – चाहे वह स्कूली शिक्षा हो या कौशल प्रशिक्षण. अपने एकमात्र लक्ष्य शादी के लिए सिर्फ़ मत आगे बढ़ो. मैं उनके लिए एक सामुदायिक केंद्र के बारे में भी सोच रही हूं.

 

 

आज, रिपोर्ट से पता चलता है कि सभी क्षेत्रीय भाषा के स्कूल नज़रंदाज़ किये जा रहे और बहुत जर्जर हालत में हैं. शहरों में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में महंगी फ़ीस और बेहतर बुनियादी सुविधाये हैं.  यदि आप गाँवों में जाते हैं और वहाँ के स्कूलों को देखते हैं, तो वह अंतर आपके दिल को दहला देने वाला होता है.

लोग मुझपर हँसते हैं और मुझे कमज़ोर करते हैं, जब मैं उन्हें एक मराठी माध्यम स्कूल शुरू करने की बात करती हूँ. पैसे अभी अनुमति नहीं दे रहे है, फिर भी, मैं गाँव वालो से कहती हूं कि वह एक मिनट के लिए अपने प्रयासों को न रोकें. मैं अपने दोस्तों को विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों से आमंत्रित करती हूं और गांवों के छोटे बच्चों को आशा की सिर्फ़ एक झलक देने का प्रयास करती हूं. उनके पास शौचालय नहीं थे, लेकिन उनके पास स्मार्टफोन थे. मैंने उनसे फ़ोटो लेने और उनकी कहानियों को लिखने का आग्रह किया; कल्पना करना सीखें, उनके सपने देखें और सपनों को पूरा करें. वह एक अच्छा इंसान बने यह सिखाने की मैं पूरी कोशिश कर रही हूं.

 

नभंगन फाउंडेशन की वर्तमान और भविष्य की क्या परियोजनाएँ हैं?

मैं दो गाँवों – पंधरी और मठ जलगाँव के साथ काम कर रही हूँ. अभी मैं शिक्षा, बेहतर खेती, स्वास्थ्य और अधिक जागरूकता पैदा करने पर ध्यान केंद्रित कर रही हूं. मैं गांवों में नवीन खेती के तरीकों को आजमाने के लिए कृषि विशेषज्ञों को लाने की कोशिश कर रही हूं.

गांव खाली हो रहे हैं, क्योंकि उच्च शिक्षा के बाद, युवा नौकरियों के लिए शहर चले जाते हैं. कोई भी गांव में रह कर वैज्ञानिक खेती करना नहीं चाहता है. खेती को पिछड़ा क्यों माना जाता है? आइए खेती को एक “आनंदमयी” चीज़ के रूप में अच्छी तरह से बनाएं.

स्कूलों में खेती एक विषय के रूप में क्यों नहीं है.  क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों को बढ़ावा क्यों नहीं.

आइए हमारे गांवों पर हम सब नजर डालें.

 

गाँवों में अपने काम के अलावा, आप कई अन्य सामाजिक कारणों से भी सक्रिय रही हैं.

मैंने ट्रांसजेंडर समुदाय और ह्यूमन ट्रैफिकिंग होने वाली महिलाओं के लिए काम किया है. मैं निश्चित रूप से हर ऐसे व्यक्ति के पास पहुँचूँगी, जिसे मदद की जरूरत है. दो साल पहले मैं ट्रांसजेंडर लोगों के साथ एक एक्टिंग प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी. जब मैं उनसे मिली, मैंने सोचा कि मैं उनके लिए क्या कर सकती हूं. आप जानते हैं, मेरे पास एक ट्रांसजेंडर ड्राइवर है जो मेरी सुरक्षा चाहे दिन हो या रात का कोई भी समय क्यों न हो; को सुनिश्चित करता है. हमें उन्हें वह सम्मान और प्रतिष्ठा दिखाने की जरूरत है जिसके वह हकदार हैं; हमें उन्हें रोजगार प्रदान करने की आवश्यकता है. मैंने उनके हाथ पकड़ लिए और चल पड़ी उनके साथ. बस एक साधारण मुस्कान के साथ बहुत कुछ किया जा सकता है.

 

लोगों से अच्छी तरह से बात करें, उनकी समस्याओं को सुनें, उनके दोस्त बनें – यह स्वयं में एक बड़ी मदद है. आपको बदलाव लाने के लिए अपने रास्ते से हटने की जरूरत नहीं है.

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