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ग्रीन यात्रा: जापानी तकनीक से ये एनजीओ एक एकड़ में उगाते हैं 12,000 पेड़

तर्कसंगत

March 21, 2019

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तेजी से हो रहे शहरीकरण ने दुनिया को उसके हरे रंग से बदरंग कर दिया है. जब हम ज्यादा इमारतों बनाते हैं और अपने बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए आगे बढ़ते हैं तो हम पर्यावरण और प्रकृति की कीमत पर ऐसा करते हैं. हालांकि हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जो प्रकृति के मूल्य को समझते हैं. प्रदीप त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली ग्रीन यात्रा NGO उन्हीं में से एक है.

दुनिया में हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से ग्रीन यात्रा कई महानगरीय और छोटे शहरों तक पहुँच रही है जो वर्तमान में सरकार के अनुसार 33% से कम है. ग्रीन यात्रा को नये नये तरीकों से काम करने का तरीका उसे अलग बनाता है इन्हीं में से एक हैं  ‘मियावाकी तकनीक‘.

ग्रीन यात्रा का लक्ष्य 2025 तक भारत में लगभग 10 करोड़ पेड़ लगाना है. NGO ने मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों और कस्बों को कवर किया है. हालांकि त्रिपाठी और उनकी टीम ने महसूस किया कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ लगाने के लिए जगह एक बाधा थी. उनकी टीम ने मुंबई पहुंचकर यह समस्या और अधिक देखी और जल्द ही सोचा कि उन्हें ऐसे तरीकों की तलाश करनी होगी जो उन्हें वर्तमान जमीन पर ही अपने लक्ष्य को पूरा करने में मदद करे.

 

मियावाकी तकनीक

यह जमीन की कमी का सामना करने के बाद था कि टीम को जापान के पौधा रोपण करने के तरीकेमियावाकी’ के बारे में पता चला. इस तरीके से पेड़ लगाने पर न केवल जगह बचती है बल्कि लगाये गये पौधे को विकास में भी मदद होती है. यह सूरज की रोशनी को जमीन तक पहुंचने से रोकता है जिससे खरपतवार के विकास को रोका जाता है.

 

 

जापानी वनस्पतिशास्त्री और प्लांट इकोलॉजी विशेषज्ञ, डी अकीरा द्वारा विकसितमियावाकीतकनीक से सेंट्रल रेलेसाइड वेयरहाउस कंपनी लिमिटेड (CWCL) जोगेश्वरी ईस्ट, मुंबई के सामने टीम ने लगभग एक एकड़ में 12,000 पेड़ लगाये हैं. इस तरह के बड़ी परियोजना में टीम ने SayTrees नाम के एक संगठन के साथ पहले चरण में ही 30 विभिन्न देशी प्रजातियों के 3,000 पेड़ लगाये. जिसमें बहुस्तरित 2-3 फीट के पौधे बहुत पास पास लगाये जाते हैं जैसे 2-5 पौधे प्रति वर्ग मीटर. ये पौधे सिर्फ 2 साल में 20 फीट लंबे पेड़ तक उग सकते हैं.

 

 

 

तर्कसंगत से बात करते हुए त्रिपाठी ने बतायामियावाकी से केवल 20 से 30 वर्षों में एक जंगल बन सकता है जबकि पारंपरिक तरीकों से 200 – 300 साल लग जाते हैं. यह तकनीक हमें एक ही जमीन पर विभिन्न प्रकार के पेड़ लगाने में मदद करती है. हम विशेष रूप से एक क्षेत्र के मूल पेड़ लगाते हैं क्योंकि इन पेड़ों को बहुत रख-रखाव की आवश्यकता नहीं होती है. इसके अलावा हम किसी भी प्रकार के रासायनिक या कृत्रिम उर्वरकों का उपयोग नहीं करते हैं.

 

 

“क्या हम लापरवाही को बर्दाश्त कर सकते हैं”

त्रिपाठी बताते हैंदिल्ली की एक संस्था ने अनुमान लगाया है कि हम जिस ऑक्सीजन की सांस लेते हैं अगर  उसके पैसे लिये जाये तो प्रत्येक व्यक्ति को एक दिन में 13 लाख रुपये देने होंगे. हममें से ज्यादातर लोग प्रकृति को महत्व नहीं देते हैं क्योंकि ऑक्सीजन जैसी चीजें अब तक मुफ्त हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या हम प्रकृति के प्रति इस लापरवाही को बर्दाश्त कर सकते हैं?”

 

 

तर्कसंगत तेजी से हो रहे प्रकृति की कमी का मुकाबला करने के लिए एक नई विधि का उपयोग करने पर ग्रीन यात्रा की सराहना करता है  हम अपने समुदाय के सदस्यों को इस तरह की परियोजनाओं से प्रेरणा लेने और पृथ्वी को बचाने के लिए अपना योगदान देने के लिये कहेंगे.”

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