मेरी कहानी

मेरी कहानी : मेरे पिता भी सख्त दिखते हैं और अपनी परेशानियां किसी को नहीं बताते

तर्कसंगत

Image Credits: Humans Of Bombay

March 21, 2019

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मेरे दादा जी के निधन के बाद पापा को गांव का सरपंच बना दिया गया. उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही रूक गई. जब मैं 5 साल की हुई हमलोग गांव छोड़ शहर आ गये ताकि मेरी और मेरे भाई की पढ़ाई किसी अच्छे स्कूल में हो पाए.

पापा सुबह के 4 बजे से दाख़िले के लाईन पर खड़े होकर इंतजार करते उनकी बारी का. तब जाकर कहीं हमें एक अच्छे स्कूल में दाखिला मिला. लेकिन उसकी फिस भी अपना फन फैलाए हमें घूर रहीं थीं. पापा ने भी हार ना मानते हुए सारी मुसिबतों का सामना किया और हमें अच्छी शिक्षा के साथ – साथ अच्छी परवरिश भी दी, किसी चीज की कमी नहीं होने दी. और अपनी जरूरतों को सिमित करते चले गए.

सरपंच कि जिम्मेदारीयों के वजह से पापा हमारे साथ नहीं रह पाते लेकिन हर हफ्ते 6 घंटे का रास्ता तय कर हमसे मिलने आते थे. मेरी मां बहुत चिंतित रहती थी उनके स्वास्थ्य को लेकर क्योंकि उन्हें खाना बनाना नहीं आता था. इसलिए जब भी पापा घर आते तो घर पर त्योहारों जैसा पकवान बनता.

पापा ने एक छोटा सा बैंक खोला था,  गरिब किसानों के लिए. मैं जब कक्षा 4 में थी तब कुछ समस्याओं के वजह से वो अपना ऋण चुकाने में असर्मथ थे और हमारी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर होती चली गई. लेकिन फिर भी उन्होंने इसका एहसास कभी होने नहीं दिया, सबकुछ बस अकेले ही झेलते चले गए. हमारी ज़रूरतों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.

वहां के लोगों को उनपे बहुत विश्वास था इसलिए लोगों ने बहुत मदद किया और हमें इस मुसिबत से बाहर निकाला.

15 साल बाद सरपंच के पद से उन्होंने सेवा निवृत्त ले लिया, लेकिन पंचायत का हिस्सा बने रहे. उनकी जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव आए और उन सब का उन्होंने अकेले ही सामना किया और हमें भनक तक नहीं लगने दिया. लेकिन फिर भी मैं समझ जाती थी कब वो परेशान होते और कब उन्हें हमारे प्यार की जरूरत होती.

मेरे पिता मेरा आदर्श है. काश! मैं इतनी लायक़ बनूं कि अपने पिता के हर त्याग का मूल्य चुकां सकूं. मैं अगर अपने पिता की उदारता का एक चौथाई हिस्सा भी पा सकूं , तो मैं यह गर्व से कहूंगी ” मैं अपने पापा की बेटी हूं.”

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