मेरी कहानी

मेरी कहानी : मैं एक फोटोग्राफर और एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस की सर्वाइवर भी हूं.

तर्कसंगत

Image Credits: Shampa Kabi

March 24, 2019

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मैं एक क्रिएटिव प्रोफेशनल हूं, एक फोटोग्राफर, और एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (एक्सडीआर टीबी) की सर्वाइवर भी हूं. अंतिम नाम मेरे लिए ज्यादा खास है क्योंकि जब मैं टीबी से लड़ रही थी, तो ऐसे दूसरे मरीज़ों को ढूंढ रही थी, खासकर महिलाएं जो खुलकर टीबी के बारे में बात कर रही हैं या टीबी को हराने के बारे बता रही हैं, या फिर जिन्होंने टीबी के बाद एक बेहतर जीवन पाया हो. लेकिन दुर्भाग्य से मुझे ऐसा कोई नहीं मिला.

 

आमतौर पर, मैं हमेशा चर्चा में आने से बचती हूं. एक फोटोग्राफर के रूप में मेरा काम यही होता है कि पर्दे के पीछे रहकर दूर से सब गतिविधियों को देखूं. लेकिन इस बार मुझे यह लगा कि मुझे सबके सामने आकर, खुलकर अपनी बात रखनी होगी.

 

तो ये 2013 की बात है. मैं सिर्फ 19 साल की थी जब मुझे खांसी होनी शुरु हुई और मेरा वजन घटने लगा. टेस्ट होने के बाद पता चला कि मुझे एक्सडीआर टीबी है. मैंने सही इलाज कराने में ज़रा भी देर नहीं की क्योंकि मुझे टीबी के बारे में पहले से जानकारी थी. दरअसल, मैं एक टीबी प्रभावित परिवार से आती हूं. मेरे पिता, दादा और अंकल को भी पहले टीबी हो चुकी है और सब लोग ठीक भी हो चुके हैं. लेकिन मैं यहां साफ कर दूं कि टीबी की बीमारी अनुवांशिक कारणों से नहीं होती – यह किसी को भी हो सकती है. लेकिन तब मुझे यह पता नहीं था कि टीबी के कारण ऐसी गलतफहमियों के कारण ही इसके मरीज़ों के साथ भेदभाव होता है. मैंने टीबी को कोई आम बीमारी समझ लिया था. लेकिन मैं गलत थी.

 

हालांकि, मेरे आसपास के लोगों ने मेरी पूरी देखभाल की और हर वक्त मुझे खुश रखा..आप जानते हैं ना कि लोग कैसी बात करते हैं, हम उसके घर नहीं जाएंगे, उसे टीबी हुई है. मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके बावजूद मैंने यह देखा कि लोगों को टीबी के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी और इससे दूसरे मरीज़ों को नुकसान हो रहा था.

 

टीबी का इलाज तो कर सकते हैं, लेकिन पूरी जानकारी ना होने और गलतफहमियों का क्या करें? वैसे तो मेरे सभी दोस्त मेरे साथ सामान्य रूप से पेश आते थे, लेकिन उनके माता-पिता उन्हें मुझसे दूर रहने के लिए कहते थे. हमारी पीढ़ी के लोग इस बात को समझते हैं, वो खुद से जानकारी हासिल करते हैं. लेकिन मुझसे पहले की पीढ़ियों के लिए टीबी का मतलब डर होता था, उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती. ऐसा नहीं है कि वो संवेदनशील नहीं है, बल्कि उन्हें पूरी जानकारी ही नहीं है. सरकार और मेडिकल कम्यूनिटी टीबी का इलाज करने में इतने व्यस्त हैं कि वो लोगों को यह बताना भूल जाते हैं कि टीबी मरीज़ों के साथ कैसा व्यवहार करें. खासकर, टीबी मरीज़ों के साथ होने वाले भेदभाव को अनदेखा ही कर दिया जाता है क्योंकि उन्हें नहीं पता कि इसे कैसे दूर करें. उन्हें यह समझ नहीं आता कि यह भेदभाव धीरे-धीरे मरीज़ों का आत्मविश्वास खत्म कर देता है और मानसिक तनाव पैदा करता है. आप कमज़ोर महसूस करते हैं, कभी-कभी आप यह मानने को तैयार नहीं होते कि आपको टीबी हुई है. टीबी का मतलब सिर्फ दवाएं लेना नहीं होता, बल्कि इसे स्वीकार करने की ज़रूरत है, हिम्मत करने की ज़रूरत है.

 

सच कहूं तो टीबी से जुड़ी इस खामोशी से मेरा दम घुटने लगा था. मैं भाग्यशाली थी जो मुझे मेरे परिवार और दोस्तों का साथ और प्यार मिला. लेकिन उन लोगों का क्या होता होगा, जिनके पास किसी का सहारा नहीं होता?

 

महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले दोगुना भेदभाव झेलना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि पुरुषों को छोड़ दिया जाता है. अगर महिलाओं को लगातार अपने पतियों या ससुराल वालों द्वारा छोड़ दिये जाने का डर सताता है, तो पुरुषों को अपनी नौकरियां / आमदनी खोने का खतरा होता है.

 

जब मैंने टीबी के बारे में बात करना शुरु किया, तो मैंने देखा कि लोग मुझसे बचने की कोशिश करते हैं और कुछ लोग तो अक्सर मुझसे दूर ही रहते थे. हर प्रकार की टीबी संक्रामक नहीं होती और दवाएं लेने के बाद अधिकतर मरीज़ों का संक्रमण भी जल्द ही खत्म हो जाता है. टीबी से बच्चे पैदा करने की क्षमता भी प्रभावित नहीं होती है. टीबी से ठीक होने के बाद आप पूरी तरह से सामान्य जीवन जी सकते हैं. आज ना सिर्फ मैं टीबी से ठीक होकर ज़िंदा हूं बल्कि सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी नामक टीबी से ठीक हुए मरीज़ों के एक समूह की प्रतिनिधि भी हूं.

 

मुझे टीबी के बारे में बात करने से खुशी होती है. इस चुप्पी को तोड़ने पर मुझे ऊर्जा महसूस होती है. मेरे लिए हर दिन एक नया दिन है. मैंने टीबी के बारे में बोलने का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं नहीं चाहती टीबी के मरीज़ तकलीफ में रहें. अगर आपको टीबी हुई है, तो इसके बारे में बात करें, इसे छिपाने की ज़रूरत नहीं है, इसमें किसी की गलत नहीं है – आपकी तो बिल्कुल नहीं.

 

कहानी : मानसी खड़े 

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