मेरी कहानी

मेरी कहानी: “मैंने अपनी अमेरिकी नौकरी छोड़ ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए काम करने का फैसला किया”

तर्कसंगत

March 28, 2019

SHARES

मेरा चार लोगो का परिवार था, मैं, मेरा छोटा भाई और मेरे माता-पिता. मेरे पिताजी भारतीय एयरफोर्स में थे और उनके साथ, हमने उनकी ट्रांस्फेरेबल नौकरी के कारण बहुत यात्रा की और भारत के लगभग सभी राज्यों में हम रह चुके थे और इस तरह हम हर तरह की संस्कृति में पले बढ़े. तो, अब जब कोई मुझसे एक सरल सवाल पूछता है कि आप कहाँ से हैं? तो मैं एक राज्य या शहर का नाम नहीं दे पाती हूं क्योंकि मेरी बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं, मैं उन जगहों, संस्कृतियों और लोगों की आत्मीयता को महसूस कर सकती हूं और मुझे लगता है कि हर कोई मेरा है और मैं उन सभी की हूं. डिफेन्स के माहौल के लिए उनको धन्यवाद, जिसने मुझे समानता और समावेशन, सभी मानव जाती को  दिए जाने वाले अधिकार पर विश्वास दिलाया.

 

मैंने कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की और ETH (एजुकेशन टू होम) रिसर्च लैब ज्वाइन किया, वहा मैंने डॉ. विजय भटकर के साथ काम किया. उन्हें भारत में सुपर कंप्यूटर के जनक के रूप में जाना जाता है. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और अपने शुरुआती दिनों में हमने वर्चुअल क्लासरूम के एक प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया. वर्ष 2002 में, हमने एक सॉफ्टवेयर प्रणाली बनाई, जिसके जरिये हम दूर बैठे पिछड़े क्षेत्र में अल्पविकसित छात्रों को शिक्षा प्रदान कर सकते है. उन दिनों में डेस्कटॉप वेब कैमरा का उपयोग करके हमारे सॉफ्टवेयर सिस्टम के साथ, हम छात्रों के लिए लाइव सेशन को प्रदान कर सकते हैं. राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने हमसे मुलाकात की और हमे आगे मार्गदर्शन किया. उन्होंने मुझे एक बात भी बताई जो मुझे अभी भी याद है, असली सतुष्टि, सफलता या धन में नहीं है, आप उसे दूसरों को देने में और उनकी मदद करने मात्र से प्राप्त कर सकते हैं.

 

बाद में, मैं बेहतर संभावनाओं के लिए यूएस चली गयी और वहां 9 साल तक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के रूप में काम किया. जॉब और करियर के नज़रिए से देखे तो यह सब कुछ सबसे अच्छा था जो कभी भी किसी के साथ भी हो सकता है, लेकिन मुझे समाज सेवा में गहरी दिलचस्पी थी, तब भी जब मैं मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए काम कर रही थी, वहां पर भी सामाजिक मुद्दे हमेशा मेरे दिमाग में रहते थे.

 

नवंबर 2016 में, मैं भारत में एक लंबी छुट्टी पर आयी और मैंने बहुत से लोगों से मुलाकात की और महसूस किया कि भारत केवल कुछ ही लोगों के लिए विकसित हुआ है. बाकी लोगों के लिए समान कठिनाइयाँ हैं, उनके लिए भारत कुछ ख़ास नहीं बदला है. फिर मैंने उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव शिकोहाबाद में एक घटना के बारे में सुना, जहाँ 42 साल की एक महिला की मृत्यु हो गई क्योंकि उसने एक सेनेटरी नैपकिन के रूप में ब्लाउज का इस्तेमाल किया था. ब्लाउज में लगे धातु का हुक उसके शरीर में प्रवेश करते ही टिटनेस की वजह से मृत्यु हो गई. यह मेरे लिए चौंकाने वाला था और मुझे तुरंत ऐसा लगा कि मुझे इसके बारे में कुछ करना चाहिए.

अंत में, मैंने निर्णय कर लिया, और अमेरिका में अपनी नौकरी छोड़ दी, वापस आ गयी, अपना एक एनजीओ “स्फेरुल फाउंडेशन” शुरू किया और अब मैं पूरी तरह से एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं.

 

मैं महिला सशक्तीकरण, मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH अधिनियम), लिंग समानता और समावेश, बच्चों और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण के लिए काम करती हूं. लोगों को, जीवन और सुरक्षा का अधिकार होना चाहिए, उनकी एक स्थायी आजीविका होनी चहिये, उनकी बात सुनी जानी चाहिए, उनकी एक पहचान होनी चाहिए और मेरा मानना ​​है कि आवश्यक कार्रवाई के बाद यहाँ सब संभव है. हमारे जैसे विकासशील देशों में, महिलाओं और बच्चों को अक्सर सबसे अधिक उत्पीड़ित किया जाता है, उनकी जरूरतों और अधिकारों पर ध्यान देना चाहिए. इसलिए, हम वर्तमान में उनसे संबंधित मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और इस प्रकार अपनी सामाजिक पहलों को नयी पहचान दे रहे हैं.

 

मैंने लड़कियों के लिए एक पुस्तक मून टाइम भी लिखी है, यह पीरियड्स (माहवारी) पर एक कॉमिक बुक है. पीरियड्स के लिए लोगों ने मुझसे कॉमिक पर सवाल किया ?? इसे कौन पढ़ेगा ?? लेकिन अब यह पुस्तक न केवल भारत में पढ़ी जाती है बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और कई अन्य देशों में भी पढ़ी जाती है.

 

मासिक धर्म शुरू होने के बाद 5 में से हर 1 लड़की स्कूल से छोड़ देती है. वह यह भी नहीं जानती हैं कि मासिक धर्म एक जैविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है और कॉमिक किताबें इसे चित्रात्मक रूप से सारी बातो को प्रदर्शित करती हैं और युवा दिमाग पर अधिक प्रभाव डालती हैं, क्यूकी यह बहुत लंबे समय तक किसी की याद में बनी रहती है. इसलिए, मैं किताब लिखने के विचार के साथ आगे आयी, जिसमे किशोरी लड़कियों के लिए जो अभी युवावस्था से गुजर रही है, जो बच्चों और किशोरी के दोनों के लिये अनुकूल हो, ऐसा प्रदर्शित किया गया है. 

मेरी अंतिम इच्छा मेरे जीवनकाल में यह है कि एक दिन कोई मुझे आकर बोले, “कृपया अपनी दुकान बंद कर दें क्योंकि अब आप जिन मुद्दों पर काम कर रही थी, वह अब मौजूद नहीं हैं”.

 

कहानी: गीता बोरा 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...