मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैं सिस्टम से लडूंगी, अपनी निर्दोषिता सिद्ध करूंगी और किसी अन्य साथी महिला बैंककर्मी के लिए कमजोरी का उदाहरण नहीं बनूंगी.

तर्कसंगत

Image Credit: Sulabh Jain

April 1, 2019

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मैं, अलंकृता (बदला हुआ नाम) एक सार्वजनिक क्षेत्र बैंक (पब्लिक सेक्टर बैंक) में पिछले लगभग 10 वर्ष से कार्यरत थी. प्रोबेशनरी अफ़सर से शाखा प्रमुख बनने का सफ़र काफ़ी उतार चढ़ाव वाला रहा, जहां काफ़ी कुछ सीखने को मिला भी और काफ़ी कुछ खोना भी पड़ा.

 

सीखने में प्रोफेशनलिज्म, बैंकिंग क्षेत्र की छोटी बड़ी गतिविधियां, विभिन्न जिम्मेवारियां आदि और खोने में परिवार का महत्वपूर्ण वक़्त, पुराने दोस्त, ऑफिशियल मीटिंग में आत्म- सम्मान वगैरह शामिल है.

 

वो दिन आज भी मेरे ज़ेहन में एक दम ताजातरीन है, जब पापा ने अपॉइंटमेंट लेटर हाथों में दिया था. पूरे मोहल्ले में मिठाई बटवाई थी क्यूंकि इंजीनियरिंग को छोड़कर कॉमर्स लेकर भी सरकारी नौकरी वो भी बैंक में मैनेजर की, हासिल करने वाली मैं अकेली ही तो थी. पूरे एक साल में लगभग सारे अख़बार, मैगज़ीन्स, पुराने पेपर्स और ना जाने क्या क्या चाट डाले थे.

 

नौकरी के शुरू के 8 सालों में मैंने बैंक को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और मैंने जो भी शाखा में कार्यभार ग्रहण किया, उसे स्टाफ की कमी के बावजूद बहुत अच्छे से संचालित किया. रीजनल कार्यालय से समय समय पर सराहना के साथ टारगेट के लिए उलाहना भी मिली, जिसे मैंने सदैव कार्यशैली का हिस्सा माना. कभी भी महिलाओं को पुरुषों से कम नहीं माना और अपनी महिला स्टाफ के साथ रिकवरी जैसे फ़ील्ड कार्यों पर सप्ताहांत में भी गई. शादी के बाद भी मैंने आफिस और घर किसी तरह मैनेज कर रखा था.

 

पति भी सरकारी नौकरी में पास के ही एक दूसरे शहर में कार्यरत थे और लगभग 150 किलोमीटर सप्ताहांत में ट्रेन से अप डाउन करते थे. सभी कुछ ठीक ही चल रहा था और मैंने भी पति के कार्यस्थल के पास ट्रांसफर के लिए अर्जी दे दी थी. अर्जी मंजूर नहीं हुई बल्कि उल्टा कई किलोमीटर दूर उप शाखा प्रबंधक बनाकर लखनऊ स्थानांतरित कर दी गई. मैंने अपने शीर्ष अधिकारियों से बात की और कई पत्र भी लिखे जिसमें उन्हें केंद्र के वित्तीय सेवा विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज) के स्पाउस ग्राउंड पर ट्रांसफर वाले सर्कुलर की भी बात की.

 

सिवाय अगले वित्तीय वर्ष में दोबारा अर्जी लगाकर ट्रांसफर पाने के आश्वासन के अलावा मुझे कुछ नहीं मिला. मैंने मन को समझाया और अकेली नए शहर में किसी तरह काम पर मन लगाया किन्तु प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था, मैं अगले ही माह गर्भवती हो गई. मेरी तबियत शाखा में ही खराब हुई और मैं अस्पताल में इलाज के लिए गई, जहां मुझे मेरे गर्भवती होने का पता चला. चूंकि मेरा वजन काफ़ी कम था और गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में चक्कर आना, सिर चकराना आदि शिकायतें आम होती है डॉक्टर ने मुझे कंप्लीट बेड़ रेस्ट की तस्दीक की.

 

मैंने फ़ोन कर शाखा प्रमुख को इस बारे में इत्तला दी और एक एसएमएस भी डाल दिया. परिवार को बताया तो स्वाभाविक रूप से मेरे पति लखनऊ आए और मुझे साथ चलने को कहा. मैंने शाखा प्रमुख को फोन किया और उनकी स्वीकृति के साथ शहर छोड़ दिया. घटते वजन की वजह से तबियत और बिगड़ती गई, मैं चाहते हुए भी वापिस नहीं जा पाई. उधर मेरे शाखा प्रमुख को मेरी माह भर की लंबी छुट्टी पर कुछ संदेह हुआ और मेरी आगे की भी सारी छुट्टियां अनाधिकृत कर दी. मैंने फोन पर बात की और उन्हें अपनी स्तिथि के बारे में समझाया. समझना तो दूर, उन्होंने मेरा फ़ोन उठाना बंद कर दिया.

 

मैंने ऑफिस के सहकर्मियों और अन्य शीर्ष अधिकारियों से मेरी परिस्थिति को समझने की अपील की, पर धीरे धीरे सबने किनारा कर लिया. आश्चर्य तब हुआ जब मुझे प्रधान कार्यालय से अनाधिकृत छुट्टियों की वजह से नौकरी से निकाल देने का पत्र प्राप्त हुआ. मैंने अपने सारे डॉक्टर के पर्चे और अपनी गर्भावस्था के मुश्किल हालातों को समझाया, पर सब निरर्थक रहा. यहां तक कि दवाब में महिला सहकर्मियों ने भी मुझे वांछित सहयोग नहीं दिया.

 

मैंने गर्भावस्था के बीच में ही कार्यालय जाने की कोशिश की किंतु मुझे प्रधान कार्यालय की चल रही जांच के कारण ज्वाइन करने से रोक दिया गया, यहां तक कि तनख्वाह भी रुक गई. काफ़ी पत्राचार किया और काफ़ी प्रार्थना की, किन्तु किसी ने भी हाथ आगे नहीं बढ़ाया. मेरी पति के कार्यस्थल पर ट्रांसफर की दूसरी अर्जी को भी ठुकरा दिया. मैं सदमे में थी कि जब मुझे बैंक की सर्वाधिक ज़रूरत थी तो मुझे ही दोषी ठहरा दिया गया.

 

ख़ैर, मैं एक प्यारी सी बेटी की मां बनी और मैंने अपने अस्पताल के कागज़ आफिस में भेजें. बजाय बैंक को अपनी गलती स्वीकार करने के, मुझे अगला पत्र बैंक से अनाधिकृत छुट्टी के कारण चार्जशीट होने का प्राप्त हुआ. कुछ समझ ही नहीं आ रहा था और मैंने पुनः अपनी मेटरनिटी लीव को स्वीकृत करने की प्रार्थना की. बैंक ने जमा किए गए डॉक्टरों के सभी कागज़ो को पर्याप्त नहीं माना और मुझे तत्काल प्रधान कार्यालय में जांच कमेटी के सामने उपस्थित होने को कहा गया.

 

मैं अपनी छोटी बेटी के साथ, किसी तरह ट्रेन का 28 घंटे का सफ़र तय करके वहां पहुंची. लगा वो समझेंगे किन्तु मुझे तत्काल ही वापिस शाखा ज्वाइन करने को कहा गया. मैंने अपनी परिस्थिति को समझने की अनेक प्रार्थना की किंतु पूरी कमेटी, जिसमें सभी शीर्ष अधिकारी पुरूष थे, अडिग रही. हार कर और धन के अभाव में, मुझे वापिस बीच मेटरनिटी लीव ही शाखा ज्वाइन होने जाना पड़ा. वहां शाखा प्रमुख ने मेरे सभी कागज़ो को देने और उनके अनाधिकृत व्यवहार की शीर्ष तक शिकायत करने को अपने विरुद्ध ले लिया, रीजनल मैनेजर के साथ मिलकर मुझे सबक सिखाने का तय कर लिया. मेरी इतने सालों की कड़ी मेहनत निरर्थक रही और आज मैं बैंक के लिए बेकार हो गई.

 

अत्यंत छोटी बेटी होने के कारण, मेरे लिए परिस्थिति वैसे ही विषम थी. मेरी पुरानी छुट्टियों को स्वीकृत करने और अपनी गलती सुधारने के बजाय, मुझे मेरे अधिकार की विश्राम (सबेटिकल) लीव भी नहीं दी गई और स्पाउज ग्राउंड ट्रांसफर वाली एप्लिकेशन भी तीसरी बार फिर दबा डी गई.  मुझे अंततः तोड़ देने और दोषी ठहराने की अजीब सी ज़िद, मैंने लगभग सभी पुरुष शीर्ष अधिकारियों में देखी. लगातार हो रहे अपमान और उपेक्षा से आहत होकर परिवार की मंजूरी से, मुझे मात्र 10 सालों में ही सेवा से त्यागपत्र देना पड़ा….उस नौकरी से जो मेरे लिए सबसे ऊपर थी और सबसे अज़ीज़ भी.

 

ख़ैर, मुझे पुरूष सत्तामकता से फौरी हार मानना ही पड़ा. किन्तु अब बैंक से बाहर आकर लगातार सिस्टम से लडूंगी, अपनी निर्दोषिता सिद्ध करूंगी और दोषियों को उचित सजा दिलाकर, अपनी किसी अन्य साथी महिला बैंककर्मी के लिए कमजोरी का उदाहरण नहीं बनूंगी.

 

पापा, अक्सर किसी कवि की ये लाइन दोहराते थे, जो आज इस माहौल पर सटीक बैठती है:

 

“लहरों को ख़ामोश देखकर ये मत समझना,

कि लहरों में रवानी नहीं है।

ये जब भी उठेंगी, उठेंगी तूफान बनकर,

बस अभी उठने की ठानी नहीं है ।। “

 

कहानी: अलंकृता

स्रोत : सुलभ जैन

 

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