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संथाली लड़कियों ने उस विचारधारा को चकनाचूर कर दिया जिसने उन्हें फूटबाल खेलने से रोका

तर्कसंगत

April 1, 2019

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पश्चिम बंगाल में संथाल किशोर लड़कियों ने सामुदायिक प्रतिबंधो का सामना करने के बावजूद फुटबॉल का सहारा लिया है. उन्हें उम्मीद है कि खेल उन्हें गरीब सामाजिक आर्थिक बंधनों से मुक्ति दिलाएगा.

मालती हंसदा को यह विश्वास करना बहुत मुश्किल लगता है, कि उन्हें बड़ा सपना देखने के लिए दंडित किया गया था. उसकी आंखों में आंसू भर आते हैं, उस दिन को याद करते हुए जब नवंबर 2018 में ग्रामीणों के एक समूह ने उसकी बेरहमी से पिटाई की और उसके बालों को खींचकर भरे समाज उस पर अत्याचार किये.

उसका एकमात्र दोष यह था कि वह गाँव की कुछ अन्य लड़कियों के साथ फुटबॉल खेल रही थी और अपने भाग्य को बदलने और गरिमा के साथ जीने की उम्मीद कर रही थी. लेकिन ग्रामीणों ने इसे खेल से सम्बंधित नहीं लिया. उन्होंने सोचा कि घुटने के ऊपर शॉर्ट्स पहने हुयी यह किशोरिया हमारे रिवाजों का घोर अपमान कर रही हैं. उन्होंने लड़कियों के बीच डर पैदा करने और दूसरों को उसी रास्ते पर ले जाने से रोकने का फैसला किया.

लड़कियों पर किए गए क्रूर हमले से शारीरिक घाव तो हुए लेकिन यह उनके उत्साह को कम करने में विफल रहा, इसके बावजूद अब उनका उत्साह दोगुना हो गया है. लड़कियां दृढ़ संकल्प और एकाग्रता के साथ अथक प्रयास करती हैं, यह साबित करने के लिए कि सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि और उत्पीड़न उन लोगों को नहीं रोक सकती जो अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दृढ़/अडिग हैं.

 

मुश्किलों को पीछे छोड़ दिया 

हांसदा और दूसरी लड़कियों की कहानी तब ज्यादा अद्भुत लगती है जब इसे इस तरह से देखा जाये कि वह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक अत्यंत पिछड़े आदिवासी संथाल समुदाय की है. संथालों को अभी भी विकास का स्वाद लेना बाकी है और राजनीतिक वर्ग का मानना है कि इस समुदाय की कोई वैल्यू नहीं है यह बस एक गारंटीड/पक्का वोट बैंक है.

हांसदा (16), पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं. उन्होंने कुछ साल पहले अपने पिता को खो दिया था और उनकी माँ अजीविका के लिये छोटे- मोटे काम करके गुजारा करती है. “वह बड़ी मुश्किल से हर हफ्ते 300 रुपये कमाती है, जो कि पर्याप्त नहीं है. हम बस किसी तरह से जीवित रहने का प्रयास कर रहे हैं”, हंसदा ने विलेजस्क्वायर.इन को बताया, “ऐसे दिन भी आते थे, जब हमें खाली पेट ही सोना पड़ता था”.

कठिनाई ने उन्हें एक अच्छा फुटबॉलर बनने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए और अधिक दृढ़ बना दिया है. दसवीं कक्षा की छात्रा हंसदा ने कहा, “मैं अपने देश और अपने परिवार के लिए प्रशंसा लाना चाहती हूं. मैं साबित करना चाहती हूं कि संथाल की लड़कियां किसी भी तरह से दूसरों से कमज़ोर नहीं हैं”. “वह दिन गए जब हमें अपने पति का गुलाम माना जाता था, घर के भीतर रहने और बच्चों की देखभाल करना हमारी किस्मत बताया जाता था”.

 

आने वाली चुनौतियां

हांसदा के दोस्त और फुटबॉलर बिट्टी मार्डी भी आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से हैं. उनके पिता एक किसान हैं जिनके पास थोड़ी सी जमीन है. पानी की कमी और खेती से तुच्छ/कम आय परिवार के लिए आर्थिक तंगी का कारण बन रहा है.

 

 

किशोर मार्डी ने अपने वर्तमान के कष्ट पर ध्यान देने से इनकार कर दिया और दृढ़ता से विश्वास किया कि वह फुटबॉल के साथ अपना जीवन बदल सकती है. मार्डी ने VillageSquare.in से कहा,मैं अपना भविष्य बदलना चाहती हूं; वर्तमान में अत्यधिक रहना, मेरे सपनों को कुचल देंगे. आत्मविश्वास उनके स्वरों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. “मैं किसी की भी बात नहीं सुनूंगी जो मुझे रोकने की कोशिश करता है”.

हांसदा और मार्डी 15 लड़कियों के एक समूह का हिस्सा हैं, जिसमे सभी की उम्र 11 से 17 साल के बीच है. वह संथाल समुदाय से हैं और उन्होंने अपने सपनों को हासिल करने के लिए, बाधाओं को अनदेखा कर दिया है. लड़कियां बीरभूम जिले के रामपुरहाट ब्लॉक के गरिया और भालका पहाड़ी गाँवों में रहती हैं.

 

स्वदेशी संथाल

संथाल एक जातीय समूह हैं, जो झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा राज्यों के मूल निवासी हैं. वह ज्यादातर संथाली, एक ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा बोलते हैं जो मुंडा भाषाओं में सबसे अधिक बोली जाती है. 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल की कुल आदिवासी आबादी 5.3 मिलियन थी. 51.8% पर संथाल आधे से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं.

कृष्णा चंद्र कॉलेज में इतिहास के सहायक प्रोफेसर कार्तिक चंद्र बर्मन ने कहा, जिन्होंने बीरभूम में 2010 से 2016 तक संथालों पर एक शोध किया, “वह लोग अभी भी अपने स्वयं के पुराने रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं, जहां बाल विवाह आम है और पदानु-क्रमित व्यवस्था पर किसी भी तरह के प्रश्न को, बहुत कठोर प्रतिरोध और तिरस्कार के साथ देखा जाता है.”

बर्मन ने कहा, “वह अभी भी जिले के अन्य समुदायों की तुलना में पिछड़ गए हैं और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है.” वह खेती करते हैं और उसके बाद श्रम कार्य में लग जाते हैं. बर्मन ने VillageSquare.in को बताया, “वह बदलाव को पसंद नहीं करते और वह इसे उनके नियमित जीवन में दख़ल देना मानते हैं”. फुटबॉल खेलने वाली लड़कियों के खिलाफ, उनके विरोध में यह पूरी तरह से स्पष्ट था.

बर्मन ने बताया कि राज्य में आदिवासी आबादी के बीच साक्षरता दर 57.93% थी, जबकी बीरभूम जिले में यह लगभग 44.10% थी, जिसमें से आदिवासी पुरुष साक्षरता 46.20% और आदिवासी महिला साक्षरता दर 25.70% है.

 

दिल जीतना

गरिया गाँव के निवासी लखी हेम्ब्रम (17) ने कहा कि फुटबाल खेल खेलने का उनका यह जुनून दो साल पहले शुरू हुआ था जब स्थानीय गैर-लाभकारी संगठन उथनाऊ ने उन्हें इसे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया. हेम्ब्रम ने कहा, “जब उन्होंने खुद को फुटबॉलर बनाने की इच्छा को लेकर हमारे पास पहुंचे तो हम काफी उत्साहित हो गये थे”. “हमने सोचा था कि यह हमारे भाग्य को बदल सकता है और हमारे परिवारों को गरीबी से ऊपर उठा सकता है”.

हेम्ब्रम ने VillageSquare.in को बताया, शुक्र है, हमारे परिवारों ने हमारा समर्थन किया, लेकिन ग्रामीणों के एक वर्ग ने बहुत नाराजगी भी व्यक्त की. ” जब युवाओ ने हमें मैदान में शॉर्ट्स में प्रैक्टिस करते हुए देखा तो उन्होंने बहुत सेक्सुअल कमेंट और अपमानजनक/ एक महिला को दुःख देने वाली बाते कही”.

 

 

हालांकि बीरभूम कोलकाता से सिर्फ 190 किमी दूर स्थित है, लेकिन अधिकांश लड़कियों ने 2018 में एक टूर्नामेंट के लिए शहर में अपनी पहली यात्रा की थी. जनवरी 2018 से, लड़कियों ने राज्य के भीतर कई टूर्नामेंटों में भाग लिया है और विरोधियों और दर्शकों का दिल जीतने के अलावा मैच जीते हैं. उन्होंने लड़कों की टीमों के साथ भी टूर्नामेंट खेले हैं और बहुत अच्छा प्रदर्शन भी किया.

 

विरोध का सामना करना

मीडिया की रिपोर्ट में लड़कियों के दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत की प्रशंसा ग्रामीणों के साथ, कुछ अच्छी नहीं रही. उन्होंने लड़कियों को समुदाय को बुरा चित्रित करने के लिए एक सबक सिखाने का फैसला किया.

नवंबर 2018 में, गरिया में ग्रामीणों का एक समूह मैदान में आ गया जहाँ लड़कियाँ अभ्यास कर रही थीं और उन पर धावा बोल दिया. 11 साल की मिताली किस्कू ने VillageSquare.in  को बताया, “उन्होंने हमारी फुटबॉल को सुई से पंचर कर दिया और फिर उन्होंने हमें पैरो से और मुक्के से भी बहुत मारा”.

किस्कू ने कहा, “हमलावरों ने हमें हमारे बालों से खींचा और लगातार थप्पड़ भी मारे”. अगर हमने फुटबॉल खेलना बंद नहीं किया, तो उन्होंने हमें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी. हम मदद के लिए चिल्लाते रहे लेकिन कोई भी हमारे बचाव में नहीं आया.

हम आदिवासी लड़कियों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से मुख्यधारा से जोड़ना चाहते थे. उथनू के सचिव कुणाल देव ने VillageSquare.in को बताया, लेकिन ग्रामीणों के एक वर्ग द्वारा उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा”, “हमे हमारा कार्यालय भी बंद करना पड़ा”

संपर्क करने पर, ग्राम प्रधान दिलीप किस्कू, जिन पर लड़कियों ने मारपीट का आरोप लगाया है, ने आरोपों से इनकार किया, और तंज कसते हुए कहा, “मैंने उन्हें नहीं पीटा”. फोन काट देने से पहले, “उन्होंने बस इतना कहा कि यह सभी मेरे खिलाफ झूठे आरोप हैं.

 

आगे बढ़ते हुए

हेम्ब्रम, और 11 लड़कियां मल्लारपुर में उथनाऊ कार्यालय में रह रही हैं, जब ग्रामीणों ने उनके साथ मारपीट की. ऐसे और हमलों न हो उन पर इसलिए उन्होंने दूसरे स्थान पर अभ्यास करना शुरू कर दिया है. जो लोगो की पहुच से बाहर है.

पेड़ों और जंगली झाड़ियों से घिरी भूमि पर रस्सियों के साथ बांस के खंभे उनके गोलपोस्ट के रूप में काम करते हैं. लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी ने उनके जुनून को कभी कम नहीं किया है. लड़कियों ने कहा, “हम दृढ़ता से मानते हैं कि फुटबॉल में हमारे प्रति लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव लाने की शक्ति रखता है जो कि हमें पिछड़ा मानते हैं और हमारे अस्तित्व के लिए विषम नौकरियों में शामिल हैं”.

जैसे गाँव में शाम ढल गयी, एक लड़की गुनगुनाते हुए “अपना टाइम आएगा”, गली बॉय मूवी का बॉलीवुड का एक चर्चित गाना, हिम्मत से भरी हुई लड़कियों ने अपना अभ्यास जारी रखा.

 

 VillageSquare.in की अनुमति से प्रकाशित 

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