मेरी कहानी

मेरी कहानी: “जब उन्हें खुशी मिलती है, तो मुझे खुशी होती है”

तर्कसंगत

April 2, 2019

SHARES

स्पेशल ओलंपिक के इस साल, 2019 संस्करण में भारत ने कुल होने वाले 24 खेलों में से 14 में भाग लेकर विलक्षण खेल दिखाया और कुल 368 पदक हासिल किए. भारतीय एथलीटों ने ना केवल इस साल बल्कि पिछले सालों में भी, देश का नाम ऊंचा किया है. उनकी इच्छा, द्रणशक्ति और प्रतिभा के अलावा एक पूरी लोगों की सेना है जिसमें उनके मातापिता, दोस्त और कोच हैं, जो उन्हें लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करते हैं.

अर्पिता मोहापात्रा, एक ऐसी ही भूमिका में है. स्पेशल  ओलंपिक भारत टीम के बतौर कोच, वे बौद्धिक विकलांग खिलाड़ियों को ओपन स्विमिंग का प्रशिक्षण देती हैं. Humans of New York से बात करते हुए वे बताती है कि वे कैसे इन एथलीटों के पीछे की एक ताक़त बन गई. वे ऐसे विशेष मानवीय योग्यता रखने वालों के लिए, भारतीय रथ मेमोरियल अकादमी भी चलाती हैं. यह एक ऐसा समुदाय है, जो दिव्यांगों को खेल और शारीरिक गतिविधियों की मदद से सशक्त करता है.

“हमारे गांव के पास एक छोटी सी नदी थी और पापा ने मुझे वहां नहाते- नहाते तैरना सिखा दिया. स्कूल के बाद में अक्सर पानी में घुस जाती थी और दिन में घंटों तैराकी किया करती. पापा रात के खाने के वक़्त, मुझे जबरदस्ती खींच के बाहर निकाला करते थे. लेकिन हमारा गांव एक दम पारंपरिक और रूढ़वादी था, व्यस्क महिलाओं को तैराकी की मनाही थी.”

“सो ऐसे में मुझे तैराकी 15 वर्ष की होने पर छोड़नी पड़ी और तब तक दोबारा शुरू ना कर सकी, जब तक मैं अपने बीसवे सालों में नहीं आयी. ख़ैर, तब मैं शहर आ चुकी थी लेकिन वहां भी कोई महिला शिक्षक नहीं थी.”

“मैंने ही शुरुआत की. मेरी क्लास के दौरान, मैं एक ऑटिस्टिक लड़के को देखती जो किनारे खड़ा रहता और पानी को निहारता. कोई भी उसको सिखाना नहीं चाहता था.”

“पुरूष सहकर्मी, उसके द्वारा खुरचे जाने और खा लिए जाने के भय से दूर ही रहते थे. लेकिन मैं बता सकती थी कि वो इच्छुक था और मैंने पहले उसके साथ पानी से खेलना शुरू किया. मैं उसके ऊपर पानी की बूंदें उछाल देती और धीरे धीरे खेल में, मैंने उसकी टांगें खीचकर पानी में उतार दिया. पानी में सांस कैसे लेना और छोड़ना, उसे सिखाया. वो मेरी गर्दन पकड़कर, मेरी पीठ पर चढ जाता और मैं पानी में स्ट्रोक लगाती.

हालांकि वो कभी कभी मुझे मारता और काट भी लेता, कभी कभी तो कसकर गर्दन भी दबा देता, लेकिन वो कभी भी बुरी भावना से नहीं होता. उसके दिमाग में होता कि वो सही कर रहा है. समय लगा लेकिन धीरे धीरे ही सही, वो तैरना सीख़ गया.”

“अब मुझे देखते ही, वो दौड़ा चला आता है. इस अनुभव ने  मुझे ऐसे विशेष बच्चों के लिए ताक़त दी और मैं लगभग 200 बच्चों को तैराकी सिखा चुकी हूं.”

“कोई सरकारी मदद नहीं है. इन बच्चों को देखने भी कोई नहीं आता. इसलिए मैं गांवों में जाती हूं और उन्हें ढूंढ निकाली हूं. मैं उन्हें नदियों और तालाबों में तैरना सिखाती हूं.”

“जब वो ख़ुश होते हैं, मुझे ख़ुशी होती है. बस उनके लिए ही, मैंने हाल ही में ये अकादमी शुरू की है.”

 

“There was a small river near our village, and my father taught me to swim while we bathed. Before long I was sneaking…

Posted by Humans of New York on Wednesday, 27 March 2019

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...