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एक अध्ययन के अनुसार – अधिकांश स्कूल जाने वाले बच्चे मानसिक स्वास्थ्य से अनजान होते हैं.

तर्कसंगत

Image Credits: The Times Of India

April 2, 2019

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उदासी, गुस्सा, चिंता और निराशा ये सब हमारे दैनिक जीवन का अनुभव है. हम ज्यादातर इन्हें यह सोचकर अनदेखा कर देते हैं कि यह सिर्फ एक अस्थायी पल है जो गुजर जायेगा जो कि ज्यादातर मामलों में सही भी साबित होता है. लेकिन इन भावनाओं के आसपास ही रहना एक बड़ी समस्या है जिसे हम छुपाते और दबाते हैं और कई बार ये मानसिक बीमारियों का रूप ले लेता है – जैसे अकेलापन, चिड़चिड़ापन, उदासी आदि.

आजकल युवाओं को होने वाले कई मानसिक बीमारियों का खुलासा अनेक आर्टिकल्स ने किया है. वास्तव में ज्यादा चिंता का विषय स्कूल जाने वाले बच्चों का है. जिस समय एक व्यक्ति सामाजिक रूप से अस्वीकार्य काम करने लगता है उसे ‘पागल’ बोल दिया जाता है. माता-पिता भी इन बातों को नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये छोटे मुद्दे हैं. हालाँकि ये वही लक्षण हैं जो बड़े होने पर एक जबरदस्त मोड़ ले लेते हैं.

यह स्वीकार किया जाना महत्वपूर्ण है कि बच्चों में भी निराशा, विक्षोभ, घबराहट, उदासी, ईर्ष्या, भय, चिंता, क्रोध और शर्मिंदगी जैसी भावनायें होती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवहार में होने वाले बदलाव जैसे Attention Deficit Hyperactivity Disorder (ADHD), oppositional defiant disorder, बातचीत या आचरण में बदलाव  और कुछ सीखने में होने वाली कठिनाइयों को अक्सर स्कूल जाने वाले बच्चों देखा जाता है. अवसाद, उदासी और चिंता भी अक्सर इन्हीं बच्चों में देखा गया है.

 

Fortis की रिपोर्ट

स्कूलों में काम करने वाले मानसिक स्वास्थ्य समुदाय के लोगों की राय और उनका दृष्टिकोण जानने के लिए, Fortis ने एक सर्वे किया. अध्ययन से पता चला कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के बारे में स्कूली बच्चों को जानकारी नहीं है. अध्ययन के अनुसार, 65% पेशेवरों लोगों का मानना ​​था कि छात्र सबसे आम मानसिक बीमारियों से अनजान थे. 91% प्रतिभागियों ने माना कि मानसिक स्वास्थ्य को उनके स्कूलों में उचित महत्व नहीं दिया जाता है और छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया या ऑनलाइन प्लेटफार्म को प्राथमिकता दी है.

96% प्रतिभागियों ने माना कि स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक पाठ्यक्रम को शामिल करने की आवश्यकता है. 29% काउंसलर (डॉक्टर) के अनुसार, जब बच्चे परेशान होते हैं तो अपनी चिंताओं को किसी को बताने की बजाय खुद तक ही सीमित रखते हैं जो जानकारी न होने के कारण होता है. 88% प्रतिभागियों का मानना ​​था कि जब दोस्तों के बीच मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक चिंताओं पर बातचीत होती है, तो बच्चों को पता ही नहीं होता कि कैसे प्रतिक्रिया दें.

डॉ. समीर पारिख, MBBS, DPM, MD (psy), सलाहकार मनोचिकित्सक, मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान निदेशक-फोर्टिस नेशनल मेंटल हेल्थ काउंसिल के निदेशक ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को बढ़ाना बेहद जरूरी है और इसे बच्चों को जल्द से जल्द बताना और समझाना चाहिये. उन्होंने बताया कि यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है ताकि बच्चे जब भी कुछ गलत महसूस करें तो किसी से मदद मांगना या बात करना उन्हें आसान लगे.

उन्होंने बताया “जैसे लोग अपनी शारीरिक परेशानी या दर्द के बारे में तुरंत बात करते हैं वैसे ही उन्हें अपने मनोवैज्ञानिक दर्द और परेशानी के बारे में बात करना चाहिये क्योंकि वे अब बड़े हो चुके हैं. स्कूल में छात्रों को बुनियादी जीवन कौशल के लिए प्रशिक्षित किया जाता है जिससे वे दुनिया की चुनौतियों से अच्छी तरह निपट सकें. इसी तरह दिमागी विकास और सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य भी सभी के लिए जरुरी है और इसकी भी शिक्षा होनी चाहिये.”

 

तर्कसंगत का तर्क

बच्चों और युवाओं में मानसिक रूप से पीड़ित होने पर भी मदद ना पहुँच पाने का प्रमुख कारण है जानकारी का ना होना. कई मामलों में वे पहचान ही नहीं पाते कि उन्हें हुआ क्या है. यह एक बीमारी है जिसका इलाज किया जा सकता है.

मानसिक बीमारी के बारे में गलत विचार धारा एक बुराई है जो समय के साथ जीवन को नष्ट कर सकती है. लोग जब यह पता लगाने में असमर्थ होते हैं कि क्या करना है तो आत्महत्या कर लेते हैं. डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्तियों के आत्महत्या के कई मामले सामने आये हैं. अवसाद, चिंता और अन्य मानसिक बीमारी का उपचार हो सकता है. जिस तरह लोग शारीरिक बीमारियों के बारे में बात करना अजीब नहीं समझते, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य पर भी खुली चर्चा करनी चाहिये.

स्कूलों में बच्चों को निश्चित रूप से मानसिक बीमारियों के बारे में शिक्षित करना चाहिये और उन्हें बताना चाहिये कि किसी से बात करना बहुत महत्व रखता है.

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