पर्यावरण

भारत की जलवायु नीति कैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को आकार दे रही है.

तर्कसंगत

April 3, 2019

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जलवायु और ऊर्जा नीति शोधकर्ता, अनिरुद्ध मोहन ने अपने शोध पत्र में, दो दशकों से ज्यादा समय तक विश्व की जलवायु नीति में भारत की भागीदारी का विश्लेषण किया. वह बताते हैं कि कैसे भारत वैश्विक जलवायु नीति के विपरीत पक्ष से हटकर अब जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को आकार दे रहा है. इसका एक अच्छा उदाहरण 2015 के पेरिस समझौते और तब से भारत की हिस्सेदारी है.

पेरिस समझौता में सभी देशों जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक साथ आते हैं और इसके प्रभावों को अपनाते हैं. साथ ही विकासशील देशों को भी ऐसा करने में मदद करते हैं.

2015 में, समझौते को अंतिम रूप देने से पहले, भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये किये जाने वाले कामों की एक सूची पेश की थी जिसमें भारत ने तीन प्रमुख बिन्दुओ को बताया.

  1.     ग्रीन हाउस गैसों की उत्सर्जन तीव्रता में 30-35% की कमी.
  2.     गैर-जीवाश्म ईंधन(fossil Fuel) के माध्यम से बिजली उत्पादन क्षमता में 40% वृद्धि.
  3.     वनारोपण  के माध्यम से कार्बन सिंक्स का निर्माण जो 2.5-3 बिलियन टन CO2 के बराबर है.

 

इन लक्ष्यों को पूरा करने की समय सीमा 2030 बताई गयी है.

पिछले साल जनवरी से, जब राष्ट्रीय बिजली योजना (NEP) जारी हुई थी उससे महीने पहले तक, भारत अपनी समय सीमा से पहले ही तीन में से दो लक्ष्यों को पूरा करने में अच्छी तरह से कार्यरत था लेकिन कोयला खनन पर सरकार की हाल ही में हुई कार्यवाही ने इस पर पानी फेर दिया जोकि अर्थव्यवस्था, लोगों और भारत के प्राकृतिक वातावरण की सकारात्मकता पर खतरे ही घंटी है.

NEP ने अक्षय ऊर्जा के लक्ष्यों को बताते हुये, घरेलू कोयला उत्पादन को भी शामिल किया है जोकि 2020 तक 1,000 मिलियन टन तक पहुंच जायेगा जिसे 2017 के मुकाबले 676 मिलियन टन के साथ 60% की वृद्धि माना जा रहा है.

 

आर्थिक दृष्टिकोण

WHO ने अपनी हल ही में जारी CPO 24 रिपोर्ट में बताया कि यदि भारत पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करता है, तो स्वास्थ्य लाभ में 3.2-8.4 ट्रिलियन US -डॉलर का फायदा होगा जोकि हमारे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 1.5-3 गुना होगा. फिर भी सरकार द्वारा कोयले के लिए दी जाने वाली सब्सिडी, पर्यावरण मंत्रालय के पूरे बजट से लगभग 400 गुना अधिक है.

कार्बन ट्रैकर इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, अक्षय ऊर्जा स्रोतों की लागत में वर्षों से लगातार गिरावट आई है और भारत में 2017 में, हवा और सौर ऊर्जा की कीमत में 50% की गिरावट आई है जो कोयला से बनाने वाली बिजली की तुलना में सस्ता है.

हाल ही में प्रस्तावित खुर्जा थर्मल पावर प्लांट के IEEFA की विश्लेषण रिपोर्ट में बताया गया है “कोयला बिजली में निवेश करना सार्वजनिक और वित्तीय संसाधनों की बर्बादी है. भारत का बिजली क्षेत्र देश के ’खराब कर्ज’ के बोझ के लिए 40-60 बिलियन डॉलर का जिम्मेदार है. डेवलपर्स की संख्या उनके नियोजित लेकिन अब लंबे समय तक चलने वाले कोयला बिजली संयंत्रों से दूर जा रहे हैं जिसके तहत कोयला आधारित क्षमता की बहुत सारी योजनाएं पहले ही समाप्त हो चुकी हैं. भारत में थर्मल पावर सेक्टर की समस्याएं गहरी हैं और कोई समाधान नहीं है.”

 

रोजगार और पर्यावरण का दृश्टिकोण

TERI द्वारा भारत में कोयला संक्रमण का विश्लेषण करने वाली एक रिपोर्ट के अनुसार, कोयला क्षेत्र 5,00,000 से अधिक लोगों को सीधा  रोजगार देता है लेकिन मजदूर उत्पादकता में तेजी से वृद्धि होने के कारण यह संख्या काफी हद तक घट रही है. यह छह कोयला समृद्ध राज्यों (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और ओडिशा) के श्रम बाजार में नये प्रवेशकों को 2018 और 2030 के बीच 45 मिलियन के क्रम में पेश करता है, लेकिन इसमें कोई रोजगार दिखाई नहीं देता है.

कोयला शक्ति पर ग्रीनपीस की रिपोर्ट में कई आंकड़ों पर प्रकाश डाला गया. रिपोर्ट में बताया गया है ” पूरे ग्रह पर, 11 बिलियन टन CO2 कोयले से होने वाले बिजली उत्पादन से आता है. 2005 में यह CO2 उत्सर्जन का लगभग 41% था 2030 तक बढ़कर 60% हो जायेगा.”

दिसंबर 2018 में द लांसेट प्लेनेटरी हेल्थ पर प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में 2017 में 12.5% मौत ​​वायु प्रदूषण की वजह से हुई थी. अध्ययन के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक बिजली उत्पादन के लिए कोयला जलाना है. विश्व बैंक, दक्षिण एशिया के हॉटस्पॉट्स 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में औसतन मौसम में बदलाव के कारण 2050 तक जीवन स्तर में पर्याप्त कमी होगी जो भारत की अर्थव्यवस्था पर 1.2 ट्रिलियन डॉलर पर बोझ डालेगी.

2014-2018 से वन्यजीव उल्लंघन के कई मामले सामने आये हैं. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, SC-NBWL ने उन लोगो के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है जो गंभीर रूप से वनों को नुकसान पहुंचाते हैं. हाल ही में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने छत्तीसगढ़ में संरक्षित हसदेव अरंद जंगलों के 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले ‘परसा कोयला ब्लॉक’ से कोयला खनन का मुद्दा उठाया है.

हसदेव क्षेत्र मध्य भारत के सबसे बड़े वन क्षेत्रों में से एक है. अत्यधिक जैव-विविध और पारिस्थितिक रूप से समृद्ध होने के अलावा, यह कई वन-निवास आदिवासी समुदायों जैसे गोंडों के घर भी है. ये समुदाय काफी हद तक अस्तित्व के लिए कृषि पर निर्भर हैं. कोयला मंत्रालय ने जिस कोयला-क्षेत्र की मैपिंग की गई है, उसमें इसका 1,502 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र शामिल हैं. 13 फरवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने 19 राज्यों के जंगलों में रहने वाले (मुख्य रूप से आदिवासियों) को बेदखल करने का आदेश दिया, जिन्हें FRA ने खारिज कर दिया था.

स्पष्ट रूप से, पर्यावरण पर अपने रुख और अपने दावों को पूरा करने के नाम पर सरकार की बातों में गहरा विरोधाभास है. अगले कदम पर पहुंचने और जलवायु परिवर्तन और संबंधित मुद्दों पर उन्हें अपने रुख का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है क्योंकि यह इस देश के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा.

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