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वर्धा : प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को ‘हिन्दू आतंकवाद’ पर आड़े हाथों लिया, मगर क्या यह ज़रूरी है?

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Image Credits: India Tv News

April 3, 2019

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चुनाव आयोग की सख्त मनाही और दिशनिर्देशों के बावजूद, भाजपा पुनः आने वाले लोकसभा चुनावों में, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के ध्रुवीकरण करने की ओर मुड़ती हुई दिख रही है. यह किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए एक ख़तरनाक संकेत है.

महाराष्ट्र के वर्धा में चुनावी सभा के दौरान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा उठाते हैं तो वहीं दूसरे स्टार प्रचारक, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भारतीय सेना को “मोदी की सेना” बता रहे हैं.

यह सही है कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द की संरचना यूपीए के दूसरे कार्यकाल में उस समय के गृह मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा 25 अगस्त, 2010 को डीजीपी और आईजीपी के कॉन्फ्रेंस में कहा था. इसके बाद भग्वा आतंकवाद जैसे शब्द भी हवा में काफी फैले.

भाजपा जब सत्ता में आयी थी तब उस समय उनके लिए मुद्दे हिन्दू या भग्वा आतंकवाद से कहीं बढ़ कर, काला धन, बेरोज़गारी, एमएसपी, भ्र्ष्टाचार थी, फिर हमारे प्रधानमंत्री उन मुद्दों पर क्यों कुछ पुख्ता तथ्य नहीं रखते? हिन्दू या भग्वा आतंकवाद मुद्दों पर वापस जा कर इन चीज़ों से को उठाने का मतलब क्या है?

“हिन्दू जाग चूका है” ऐसे वाक्यों का प्रयोग फिर से किसी धार्मिक उन्माद की ओर हमारे समाज को चुनाव से पहले धकेल सकता है. हिन्दू सोया कब, किसके नज़र में हैं सवाल यह है?

भाजपा सत्तारूढ़ है, ज़ाहिर है उसे अपनी विगत कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाकर और भावी योजनाएं बताकर, जनादेश मांगना चाहिए. किन्तु विकास और रोज़गार जैसे मोर्चे पर सरकार बुरी तरह विफल हुई है और अब आंकड़ों में हेराफेरी के आरोप अब सार्वजनिक हो रहे हैं. बाबरी मस्ज़िद भी ढह चुकी है और मंदिर निर्माण का वादा भी सिर्फ़ एक वादा ही रहा. ऐसे में सरकार के पास तुम बनाम मैं, पाकिस्तान, कांग्रेस के 70 साल, गौरक्षा, राष्ट्रवाद, अम्बेडकर आदि मुद्दे ही इस चुनाव में भुनाए जाना संभावित है.

ये सर्वविदित और सर्वमान्य है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता वर्ना ये सब जानते हैं कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले और गौरक्षा के नाम पर पीट पीट कर मार डालने वाले किस धर्म या वर्ग से आते हैं. ये चुनाव अभियान एक तीव्र ध्रुवीकरण की ओर मुड़ता प्रतीत हो रहा है,  बिसहडा गांव की चुनावी सभा में योगी आदित्यनाथ का, अख्लाक हत्याकांड के आरोपी लोगों को प्रथम पंक्ति में बिठाना, इसका एक संकेत ही है.

राहुल गांधी के वायनाड की अतिरिक्त सीट से चुनाव लडने को भी अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की लड़ाई बना देने वाले, ये भूल जाते हैं कि “सबका साथ और सबका विकास” उन्हीं की सरकार का नारा है. होना ये चाहिए कि प्रधानमंत्री देवबंद या रामपुर की सीट से चुनाव जीतकर अपने इस नारे की सार्थकता को स्थापित करें और साबित करे कि वे समाज के हर वर्ग और तबके को साथ लेकर चलने में सक्षम हैं. वर्धा में उनके यह कहना कि “कांग्रेस में अब बहुसंख्यक के जगह से लड़ने की क्षमता नहीं है और इसीलिए वह (राहुल गाँधी) चुनाव वहां से लड़ रहे हैं जहाँ हिन्दू अप्ल्संख्यक हैं.” ऐसे भाषण श्रोताओं तक आते आते वर्ग विशेष में भेद करने के लिए प्रेरित कर जाती है.

“बात जब जुबां बदलती है उसका अर्थ बदल जाता है”, आप शायद मन में ऐसी भावना न रखते हो. प्रतिद्वंदी के डर और उनको घेरने के ख्याल से आपने इन सब बातों को कह डाला, मगर यह भाषण कांग्रेस पर कटाक्ष करने के बाद आपकी चुनाव की रणनीति पर सवाल खड़े करती है कि आप चुनाव अपनी उपलब्धि पर लड़ना चाहते हैं या धार्मिक उन्माद पर?

न्यूजीलैंड में मस्ज़िद पर चरमपंथी हमला होने के बाद, वहां के समाज और सरकार ने बताया कि कैसे अल्पसंख्यकों को भी साथ रखा जाता है. लेकिन “विभाजन की राजनीति” बहुत पुरानी और परखी हुई है, संभावित है कि भाजपा, हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना दोबारा जीवित करे.

2014 के चुनाव में भाजपा के जीतने पर बहस नहीं होती थी, मगर इस बार हम यह साफ़ देख सकते हैं कि अबकी बार मोदी सरकार पर समाज, देश, यहाँ तक कि दोस्त और परिवार भी आपस में बहस कर रहे हैं, किसान, मज़दूर, मिडिल क्लास, युवा, पत्रकार, लेखक कुछ आप के साथ हैं कुछ आपके खिलाफ. तो इसका जवाब उन्हें देशद्रोही, पाकिस्तानी आदि कह कर देंगे या उनके उनके सामने आकर प्रश्नों के तथ्यात्मक जवाब दे कर?

इस बात पर आत्ममूल्यांकन करने की ज़रूरत है.

एक लोकतंत्र के नागरिक होने के कारण हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम इस वक़्त हर मिली जानकारी की तथ्यात्मक जांच करें, अपने असल मुद्दों पर नेताओं का चुनाव करें न कि उन मुद्दों पर जो पंचवर्षिय योजना के तहत हर पांच साल में हमारे सामने लाया जाता है और हम उस उन्माद में बह कर वोट कर डालते हैं.

लेखक: आयरा अविषि

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