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सैम मानेकशॉ जन्मदिवस : जानिए की सैम मानेकशॉ का नाम सैम बहादुर कैसे पड़ा

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Image Credits: In Today

April 3, 2019

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सैम मानेकशॉ दुनिया के सबसे निडर, शानदार सेना पुरुषों में से एक हैं, उनके जैसे व्यक्तित्व वाला आर्मी अफसर देश ने शायद ही देखा होगा. आज, हम उनकी 105 वीं जयंती पर उनकी याद उनके व्यक्तित्व और उनके उपलब्धियों पर नज़र डालते हैं. दिलचस्प बात यह है कि, मानेकशॉ डॉक्टरी की पढ़ाई करना चाहते थे मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. वह भारत के पहले फाइव स्टार फील्ड मार्शल बने. इसके अलावा साहस और चतुराई से उन सभी युद्धों में अग्रणी रहे, जिनका वह हिस्सा रहे थे. चार दशकों की सेवा में, उन्होंने पाँच युद्धों में भाग लिया – द्वितीय विश्व युद्ध, 1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1962 का चीन-भारत युद्ध, 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 का बांग्लादेश मुक्ति युद्ध. उन्हें पद्म विभूषण और पद्म भूषण से सुशोभित किया गया.

 

चार दशकों का शानदार सैन्य करियर

उनका जन्म 3 अप्रैल, 1914 को पंजाब के अमृतसर में पारसी माता-पिता के यहाँ हुआ था. प्रारंभिक योजना चिकित्सा के क्षेत्र में आगे बढ़ने और एक डॉक्टर बनने की थी, हालांकि, अपने पिता द्वारा मेडिकल की पढाई  के लिए लंदन भेजने से इनकार करने के खिलाफ विद्रोह स्वरूप, मानेकशॉ ने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रवेश के लिए आवेदन किया. एक खुली प्रतियोगिता के माध्यम से चुने गए 15 कैडेटों में से, वह मेरिट के क्रम में छठे स्थान पर थे.

वह और अन्य कैडेट 1932 में IMA में प्रशिक्षित होने वाले पहले बैच का हिस्सा थे.

भारतीय सेना में सैम मानेकशॉ का कार्यकाल अद्वितीय है. उनका प्रतिष्ठित सैन्य करियर ब्रिटिश भारतीय सेना से जुड़े रहने से लेकर, द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने और पांच युद्धों के साथ चार दशकों में फैला है. वह पहले भारतीय सेना अधिकारी हैं जिन्हें फील्ड मार्शल के सर्वोच्च पद पर पदोन्नत किया गया.

 

मानेकशॉ 1969 में भारतीय सेना के 8 वें चीफ ऑफ स्टाफ बने थे. उन्हें सैम बहादुर के नाम से जाना जाता था. उनके इस नाम ‘सैम बहादुर’ के पीछे की भी एक रोचक कहानी है. बात तब की है जब मानेकशॉ चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ थे और गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों से मुखातिब थे, उस समय उन्हें लोग सैम के नाम से ही ज़्यादा जानते थे. उनके पूरे नाम उन्हें सम्बोधित नहीं किया जाता था. उन्होंमें एक गोरखा से पुछा कि ‘ क्या तुम मेरा नाम जानते हो?” सिपाही ने हाँ में जवाब दिया तो मानेकशॉ ने पुछा मेरा नाम क्या है ? जवाब मिला ‘सैम’. उन्होनें पुछा आगे? तब घबराहट में उस गोरखा ने कहा ‘बहादुर’ यह सुन कर सभी हंस पड़े खुद मानेकशॉ भी, और उनका नाम सैम बहादुर पड़ गया.

इसी गोरखा रेजिमेंट के बारें में उन्होनें कहा था कि “अगर कोई यह कहता है कि वह मरने से नहीं डरता है तो दो बात हो सकती है- या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर वो एक गोरखा है”

 

पाकिस्तान का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का सृजन

सैम की रणकुशलता की पहचान उस समय हुई जब भारत ने पश्चिम पाकिस्तानी में मुक्ति बाहिनी विद्रोहियों की मदद करने का फैसला किया. लेकिन क्या भारत युद्ध से निपटने के लिए तैयार था? यह भी एक सवाल था. सैम ने यह स्पष्ट किया कि भारत उस समय उपलब्ध गोला-बारूद और सैनिकों के आधार पर तैयार नहीं था. इसके बाद, इंदिरा गांधी ने सैम के इस्तीफे से इनकार कर दिया, सैम ने युद्ध में जीत की गारंटी दी अगर उन्हें अपनी शर्तों पर संघर्ष की तैयारी करने की अनुमति दी जाएगी और इसके लिए एक तिथि निर्धारित की जाएगी. इंदिरा गांधी ने शर्तों को स्वीकार किया और फिर इसके बाद का इतिहास सभी जानते हैं.

 

 

1971 में पाकिस्तान द्वारा उत्तर भारत के ऊपर छद्म हवाई हमले शुरू करने के बाद भारत बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल हुआ. बाद में भारत-पाकिस्तान युद्ध दो युद्ध मोर्चों पर लड़ा गया था. जब मानेकशॉ के नेतृत्व में भारतीय सेना आखिरकार उस साल दिसंबर में युद्ध के लिए गई, पाकिस्तान सेना को हराकर ही रुकी. 9 दिसंबर 1971 को मानेकशॉ का पाकिस्तानी सैनिकों को पहला रेडियो संदेश था, “भारतीय सेनाओं ने आपको घेर लिया है. आपकी वायु सेना नष्ट हो गई है. आपको उनसे किसी तरह की मदद की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए. चटगाँव, चल्ना और मंगला बंदरगाह सील हो गए हैं. कोई भी आपको समुद्र से मदद नहीं पहुंचा सकता है. आपकी किस्मत अब हमारे हाथों में है. मुक्ति बाहिनी और बाकी लोग आपके द्वारा किए गए अत्याचारों और क्रूरताओं का बदला लेने के लिए तैयार हैं … बर्बादी से किसी को क्या मिलेगा ? क्या आप घर नहीं जाना चाहते और अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं? समय मत गंवाओ; एक सैनिक के लिए शस्त्र डालने में कोई अपमान नहीं है. हम आपको एक सिपाही की इज़्ज़त मान सम्मान देंगे.

महज 13 दिनों में, पाकिस्तान ने 16 दिसंबर, 1971 को ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया. युद्ध में 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदियों के रूप में लिया गया, और यह पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से के बिना शर्त आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हो गया. एक नए राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश का जन्म हुआ.

अपने महान नेतृत्व गुणों और सैन्य विशेषज्ञता के अलावा, मानेकशॉ को अपनी त्वरित बुद्धि के लिए भी जाना जाता था.

अंततः निमोनिया की जटिलताओं के कारण सैम की मृत्यु हो गई और उनके अंतिम शब्द यही थे कि “मैं ठीक हूँ”. कुछ विवादों के कारण जिसमें मानेकशॉ सेवानिवृत्ति के बाद शामिल थे, यह बताया गया कि उनके अंतिम संस्कार में वीआईपी प्रतिनिधित्व का अभाव था. शोक का कोई राष्ट्रीय दिवस घोषित नहीं किया गया, जो राष्ट्रीय महत्व के नेता के लिए होनी चाहिए. हमें इस बात का खेद है.

तर्कसंगत सेना और उसके बाद के समय में उनकी बहादुरी, साहस, अनुशासन और दृढ़ संकल्प के लिए सैम को सलाम करता है. हम हमेशा हमारे देश के लिए किये गए आपके योगदान को याद रखेंगे और आपके इतिहास से प्रेरित होते रहेंगे.

 

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