सप्रेक

हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ्तम आत्मा – माखन लाल चतुर्वेदी

तर्कसंगत

April 4, 2019

SHARES

आज हिंदी साहित्य के महान रचनाकार, कवि, लेखक और एक पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध श्री माखन लाल चतुर्वेदी की जन्मतिथि है. अपनी कविताओं और रचनाओं से उन्होंने हिंदी भाषा को एक अलग पहचान दी है. वे केवल एक साहित्यकार ही नहीं अपितु एक सच्चे देशप्रेमी भी थे. देश की आजादी के लिए होने वाले स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने जोर शोर से हिस्सा लिया था. सच्चे अर्थों में वे एक संपूर्ण व्यक्ति थे. उनकी मुकम्मल पहचान ‘एक सच्ची भारतीय आत्मा’ के रूप में है जो पूर्णतया सही भी है.

माखन जी का जन्म 4 अप्रैल 1889 मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था. अपनी प्रारंभिक शिक्षा के साथ साथ उन्हें संस्कृत ,बंगला ,अंग्रेजी ,गुजरती आदि भाषाओं का ज्ञान था.

 

राष्ट्रप्रेम और साहित्य साथ साथ

माखन लाल चुर्वेदी जी एक सच्चे राष्ट्र भक्त थे. जब देश अंग्रेजो के अत्याचार से जूझ रहा था उन्होंने अपनी कलम की ताकत से देश की आजादी में हाथ जुटाने का निर्णय लिया. सन्‌ 1908 में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार’ पर ‘हिन्दी केसरी’ द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया था. सन्‌1913 में खंडवा के हिन्दी सेवी कालूराम गंगराड़े की मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का संपादन किया परन्तु जल्दी ही सब छोड़ कर पूरी तरह पत्रकारिता और  साहित्य-राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गये.

सन्‌ 1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान माखन लाल जी ने गणेश शंकर विद्यार्थी जी के साथ मैथिलीशरण गुप्त और महात्मा गाँधी से मुलाकात की थी. सन्‌1918 में प्रसिद्ध ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नाटक की रचना की और 1919 में जबलपुर में ‘कर्मयुद्ध’ का प्रकाशन किया. स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण 1921 में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन 1922 में जल्दी ही रिहा भी हो गये थे. साल 1924 में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने ‘प्रताप’ नामक पत्रिका का संपादन किया था.

सन्‌ 1920 में महात्मा गाँधी के शुरू किये हुये ‘असहयोग आंदोलन’ में पहली गिरफ्तारी देने वाले माखनलालजी ही थे. सन्‌ 1930 में भी ‘सविनय अवज्ञा’ आंदोलन में भी उन्हें पहली गिरफ्तारी देकर अपनी राष्ट्र भक्ति और देश प्रेम को सबसे ऊपर रखा था.

 

साहित्य, पुरस्कार और सम्मान

छायावाद युग के कवि माखन लाल चतुर्वेदी जी तीन चीजों की वजह से जाने जाते थे पहली – पत्रकारिता, दूसरी – अभिभाषण/ व्याख्यान और तीसरी – कविताएँ, निबंध, नाटक और कहानी.

उन्होंने अत्यंत सरल भाषा और ओजपूर्ण भावना के साथ हिंदी की कई रचनायें की जिसमें ‘हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिनी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, ‘बीजुरी काजल आंज रही’ जैसी कुछ प्रमुख हैं.

साल 1943 में उनकी रचना ‘हिम किरीटिनी’ के लिए उन्हें उस समय के हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कार ‘देव पुरस्कार’ से नवाजा गया था. साल 1949 में ‘हिमतरंगिनी’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.

उनकी हिंदी साहित्य के लिए लगन भावना और देश के प्रति समर्पण के लिए भारत सरकार ने साल 1963 में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया लेकिन 10 सितंबर 1967 को हिन्दी भाषा पर आघात करने वाले संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलालजी ने यह अलंकरण लौटा दिया था.

‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से कविताएं लिखने के कारण मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें ‘एक भारतीय आत्मा’ की भी उपाधि दी थी.

इतना ही नहीं मध्य प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए कहा गया था लेकिन उन्होंने यह कह कर माना कर दिया कि शिक्षक और साहित्यकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बना तो मेरी पदावनति होगी और उन्होंने मुख्यमंत्री के पद को ठुकरा दिया, जिसके बाद रविशंकर शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाया गया था.

एक बार ‘फिराक गोरखपुरी’ ने कहा था ‘उनके लेखों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदिशक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही हो या गंगा स्वर्ग से उतर रही हो. यह शैली हिन्दी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई है. मुझ जैसे हजारों लोगों ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलालजी से ही सीखी है.’

 

पुष्प की अभिलाषा

माखन लाल जी की श्रेष्ठतम रचनाओं में ‘पुष्प की अभिलाषा’ एक विशेष स्थान रखती है. जब 1999 में पाकिस्तान से कारगिल का युद्ध हुआ था और हिंदुस्तान ने जीत हासिल की थी तब सैनिकों की याद में एक टोलोलिंग के द्रास सेक्टर में एक ‘वॉर मेमोरियल’ बनाया गया था जिसे पर माखन लाल चतुर्वेदी जी की कुछ पंक्तिया आज भी लिखी हैं और वास्तव में ये पंक्तिया सत्य ही प्रतीत होती हैं.

 

“चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ,

चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक”

 

एक विचार

आज के इस तेजी से प्रगति पर बढ़ते हुये समाज में शायद हम हमारे पूर्वजों को भूल चुके हैं या ये सब हमारे स्कूल की किताबों में ही सिमट कर रहे गये हैं. उनकी उपलब्धियां, उनका संघर्ष, साहित्य और देश प्रेम के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. इसीलिए हमारी ये नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने कवियों और साहित्यकरों को याद रखे क्यूंकि आज हम जो भी बोलते, लिखते या पढ़ते हैं उसके लिये उन्होंने बहुत योगदान दिया है.

 

लेखक: अभय पराशरी 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...