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तर्कसंगत : भारतीय लोकतंत्र में बुतों की राजनीति

तर्कसंगत

Image Credits: NDTV

April 4, 2019

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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बहिन मायावती जी, ने गत मंगलवार, 2 अप्रैल 2019 को उच्चतम न्यायालय में,  उत्तर प्रदेश में दलित महापुरुषों के साथ स्वयं की प्रतिमा लगवाने में जन धन (पब्लिक मनी) उपयोग करने के ख़िलाफ़ दाख़िल हुई याचिकाओं के जवाब में, हलफनामा दाखिल किया. ये हलफनामा काबिल- ए-गौर है क्योंकि ये भारतीय राजनीति के एक दिलचस्प पहलू को उजागर करता है.

“भारत में स्मारक बनाना और मूर्तियां लगाना कोई नई घटना नहीं है. कांग्रेस के कार्यकाल में, कांग्रेस ने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, लगभग सबके पुतले जन धन से ही पूरे देश में लगवाए लेकिन किसी ने कोई याचिका दायर नहीं की.” बसपा प्रमुख अपने दायर हलफनामे में परंपरागत रस्मों को बताते हुए लिखतीं हैं.

भाजपा को एक कदम आगे बताते हुए, हाल ही में जनता के 3000 करोड़ रुपयों की लागत से बने 182 मीटर ऊंचे गुजरात के सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा की बात करती हैं और उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वकांक्षी अयोध्या में 200 मीटर ऊंची भगवान राम की प्रतिमा लगवाने वाली योजना, जिसके डिजाइन, भूमि अधिग्रहण और प्रोजेक्ट रिपोर्ट की लागत ही जनता के 200 करोड़ रुपयों की प्रारंभिक लागत वाली है. वे अन्य राज्यों में भी, जहां अटल बिहारी वाजपेई, वाई एस रेड्डी, छत्रपति शिवाजी, एन टी आर, जयललिता, मां कावेरी आदि कई महान लोगों की प्रतिमाओं पर हुए जन धन से खर्च का उदाहरण देती हैं.

दलित नेता बहिन मायावती जी, स्वयं को समाज के पिछड़े से पिछड़े तबके के क़रीब बताते हुए कहती हैं कि उन्होंने अपना सारा जीवन अविवाहित और समाज के दबे हुए वर्ग के उत्थान में बिताया है,  जिसके एवज और सम्मान में लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली राज्य विधानसभा ने सर्व सम्मति से, मूर्तियों और स्मारकों (जिसमें उनका स्वयं का शामिल था) पर होने वाले जन धन के खर्चे की बजट में मंजूरी दी थी.

“मेरी प्रतिमा लगवाने का निर्णय जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली, विधानसभा की इच्छा से ही हुआ लेकिन कुछ लोगों को किसी दलित महिला को मिलने वाला ये सम्मान बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में व्यर्थ जनहित याचिकाओं का अंबार लगा दिया जो मुख्यमंत्री का ख़ुद की प्रतिमा और स्मारक निर्माण के नाहक मुद्दे को उठाती हैं.” वह कहती हैं.

बसपा के चुनाव चिह्न, हाथी मूर्तियों के लगाने पर वे कहती हैं कि हाथी वहां सिर्फ़ सजावट के तौर पर लगाए गए हैं, ना कि बसपा के प्रचार के लिए. राष्ट्रपति भवन, राजभवन और भारतीय नोट पर भी हाथियों की प्रतिमा को उल्लेखित करते हुए वे बताती हैं कि उल्टा उत्तर प्रदेश के दलित स्मारकों में हाथियों की प्रतिमा लगवाने की प्रेरणा उन्हें राष्ट्रपति भवन से ही मिली.

मामला न्यायालय में विचाराधीन है इसलिए हमारी कोई भी प्रतिक्रिया यहां उचित नहीं होगी. किन्तु गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी के यथावत रहने और सभी राजनीतिक पार्टियों का जन धन का इस्तेमाल, महिमा मंडन में करने पर ये विख्यात कहावत तो कह ही सकते हैं कि

“दुनियां के हमाम में सभी नंगे है,

फ़र्क बस इसका है कि ख़िडकी किस तरफ खुलती है.”

लेखक: आयरा अविषि

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