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पूर्व-डीआरडीओ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कांग्रेस को ए-सैट पर औपचारिक प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया था

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Image Credits: Hindustan Times

April 5, 2019

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27 मार्च को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया. इस संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत का पहला एंटी-सैटेलाइट हथियार (A-SAT) सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया. इसके बाद लोग और राजनितिक संगठन इस बयान पर विभाजित थे. पूर्व रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख वीके सारस्वत ने एक आश्चर्यजनक खुलासा किया, उन्होंने कहा कि ए-सैट के लिए प्रपोज़ल यूपीए के दौर में भी की गई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसे मंज़ूर नहीं किया.

इसके अलावा पूर्व डीआरडीओ प्रमुख सारस्वत के बयान पर यूपीए सरकार के समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) रहे शिवशंकर मेनन ने एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) मिसाइल परीक्षण को लेकर हो रहे हंगामे के बीच महत्वपूर्ण जानकारी दी है. उन्होंने द वायर से बातचीत में उन रिपोर्टों को खारिज किया है जिनके मुताबिक मनमोहन सिंह सरकार ने रक्षा एवं अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) को ए-सैट परीक्षण करने की अनुमति नहीं दी थी. खबर के मुताबिक शिवशंकर मेनन ने कहा, ‘मैं पहली बार ऐसा सुन रहा हूं. (वीके) सारस्वत (पूर्व डीआरडीओ प्रमुख) ने कभी भी ए-सैट परीक्षण की अनुमति को लेकर मुझसे नहीं पूछा.’

शिवशंकर मेनन ने कहा कि सारस्वत ने ‘एक अनौपचारिक पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने इसकी अनुमति या मंजूरी कभी नहीं मांगी’.

 

अनुमति को लेकर असमंजस

मिशन शक्ति को बढ़ावा देते हुए सारस्वत ने कहा था कि भारत में अब तकनीकी क्षमता है. मोदी सरकार की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्ताव को मनोहर पर्रिकर के सामने रक्षा मंत्री के वर्तमान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. जी सतीश रेड्डी ने रखा था, जब मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री का पद संभाला था. सारस्वत के अनुसार मिशन के विवरण को एनएसए अजीत डोभाल ने पीएम मोदी के सामने रखा. सारस्वत ने कहा, “पीएम ने परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए साहस और दूरदर्शिता दिखाई.”

जब इस पर विचार किया गया कि क्या इस तरह की परियोजना का प्रस्ताव पहले किया गया था, सारस्वत ने कहा कि यूपीए के दौर में, मंत्रियों और यहां तक ​​कि एनएसए (मेनन ने उस समय कार्यालय का प्रस्ताव रखा था), हालांकि, न तो कोई प्रतिक्रिया और न ही वित्तीय संसाधन मिली जिससे यह कार्यक्रम रोक दिया गया, यह उन्होंने इकनोमिक टाइम्स को बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के मिशन के लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी, आगे कहा कि भारत के “पिछले चार वर्षों में” कि राजनयिक रिश्तों के कारण ऐसा हुआ है.

सारस्वत के दावे को दोहराते हुए, मेनन ने कहा कि सबसे पहले तो ए-सैट के लिए कोई अनुमति नहीं मांगी गई थी. उन्होंने कहा कि एक अनौपचारिक प्रस्तुति की गई थी, जबकि कोई अनुमोदन या मंजूरी नहीं मांगी गई थी.

मेनन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए, सारस्वत ने द प्रिंट से बात करते हुए कहा कि तब (यूपीए के दौर में) मानदंडों के अनुसार, उन्होंने एक वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में तत्कालीन सरकार के सामने प्रस्तुति दी थी. “प्रस्तुति के बाद, कोई प्रतिक्रिया नहीं थी और उन दिनों में जैसा की होता था. यदि कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती है, तो हमने अनुमति मांगने के लिए किसी भी लिखित अनुरोध के साथ आगे बढ़ना सहीं नहीं समझा, यह मानते हुए कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है. इसलिए उस समय, हमने इस काम को आगे न ले जाने का फैसला किया,” उन्होंने कहा. उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि उन्होंने लिखित अनुमति नहीं ली है और कहा, “इस बात तक, श्री मेनन द्वारा दिया गया बयान और मेरे द्वारा बताई गई स्थिति बिल्कुल एक जैसी ही है.”

 

 

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