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एक पुराणी अवधारणा से बाहर, भारत में ट्रांसजेंडर लड़ रहे हैं चुनाव.

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Image Credits: Khabar Adda

April 5, 2019

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा LGBT कम्युनिटी को मान्यता दिए जाने के कुछ ही महीनों बाद, उड़ीसा की तीन ट्रांसजेंडर महिलाएं राजनीती में उतर रही हैं. महिला जनता दल (BMJD) पार्टी की उपाध्यक्ष मीरा परिदा, एक ट्रांस कार्यकर्ता हैं जिन्होंने राजनीति में कई ट्रांस महिलाओं को शामिल किया है और पार्टी के उपाध्यक्ष का पद संभालने वाली पहली ट्रांसजेंडर हैं, जो उड़ीसा के बेगुनिया निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगी.

उन्होंने उड़ीसा समाचार को दिये गए एक इंटरव्यू में कहा “मैं खुर्दा जिले के बेगोनिया निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहती हूँ. यह भविष्य में हमारी राजनीतिक पार्टी में एक LGBT विंग बनाने की दिशा में एक छोटा सा कदम है.”

इसके अलावा मीरा, ऑल ओडिशा थर्ड जेंडर वेलफेयर ट्रस्ट, की अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने ओडिशा में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक NGO भी शुरू करी है.

 

उड़ीसा चुनाव में अन्य ट्रांसजेंडर महिलायें

ओडिशा सन टाइम्स के अनुसार, 27 वर्षीय काजल नायक भी जाजपुर जिले में कोरइ विधानसभा सीट के लिए दौड़ रही हैं. एक और ट्रांसवुमेन मेनका, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं. मेनका भुवनेश्वर में एक सीट के लिए लड़ेंगीं. उन्होंने कहा “कोई भी समाज तब तक सुधर नहीं सकता जब तक महिलाओं का सशक्तीकरण नहीं होता. मैं एक कड़ा संदेश देना चाहती हूं कि थर्ड जेंडर किसी से कम नहीं हैं.”

इस महीने से शुरू होने वाले आम चुनाव में पहली बार होगा जब ट्रांसजेंडर, तीसरे लिंग के रूप में अपना वोट डालेंगे. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत लगभग 5 लाख ट्रांसजेंडर का घर है, लेकिन केवल 39,000 ही अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों से पंजीकृत हैं.

 

ट्रांसजेंडर का प्रतिनिधित्व

स्नेहा काले ने तब सुर्खियां बटोरीं जब वह आम चुनाव लड़ने वाली पहली ट्रांस महिला बनीं. भारत की पहली Miss Trans Queen वीना सेंड्रा भी पिछले महीने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कांग्रेस में शामिल हुईं. इस साल की शुरुआत में, उसी पार्टी ने अपना पहला ट्रांसजेंडर पदाधिकारी अप्सरा रेड्डी को नियुक्त किया. 2015 में, मधु किन्नर को रायगढ़ से भारत का एकमात्र ट्रांसजेंडर मेयर चुना गया है.

पिछले साल, शबनम मौसी ने भारत में पहली बार ट्रांसजेंडर विधायक बनकर इतिहास रच दिया था.

2014 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांस आइडेंटिटी को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन अभी भी समाज उन्हें न तो एक नेता के रूप में और न ही एक नागरिक के रूप में स्वीकार करता है. हैदराबाद में अपनी राजनीतिक पार्टी के कार्यालय के लिये भटक रहे एक ट्रांसजेंडर नेता चुनाव अभियान के दौरान लापता हो गये.

पिछले महीने, एक व्यक्ति ने अपने मंदिर से एक ट्रांस पुजारी को हटा दिया. सरकार के लंबे प्रयास के बाद भी, ट्रांस समुदाय हाशिए पर हैं. कई ट्रांसजेंडर ने सरकार के ट्रांसजेंडर बिल 2014 की यह कहते हुए आलोचना की है कि “यह अच्छे से ज्यादा नुकसान करेगा.”

 

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