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ओडिशा का यह डॉक्टर आदिवासियों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है

तर्कसंगत

April 10, 2019

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हैजा के प्रकोप से पीड़ित, कोरापुट जिले के दासमंतपुर ब्लॉक में कई आदिवासी लोगों की ज़िन्दगी-मौत का सवाल बन गया, जिसने ओडिशा के डॉ. चितरंजन जेना के दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ी. पहले 2007 में, जब उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के परिणामस्वरूप आदिवासी लोगों की गतिविधियों को देखा. उन्होंने उस स्थिति में सुधार के लिए कुछ करने की ठानी. ओडिशा में कोरापुट जिले को सबसे अविकसित क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहां ग्रामीण अपने स्वास्थ्य मानकों के साथ समझौता करते हैं और गरीबी की स्थिति में ही रह रहे हैं. लेकिन डॉ. चितरंजन जेना पिछले दो साल से कड़ी मेहनत कर रहे हैं, क्योंकि वह अपनी टीम के साथ हर हफ्ते कई किलोमीटर पैदल चलकर यह सुनिश्चित करने जाते हैं, कि स्वास्थ्य सेवायें उस जिले के सबसे दूर के गाँवों में भी पहुँचें.

अपने काम के बारे में तर्कसंगत से बातचीत में डॉ. चितरंजन कहते हैं, ”कोरापुट जिले के आदिवासी लोग दयनीय परिस्थितियों में रहते हैं. अपने कॉलेज के दिनों में ही मैंने कई चिकित्सा के मामलों की याद आती है, जब आदिवासी क्षेत्र के लोग बहुत बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव/कमी में मर गए थे. इसके अलावा, वह हमारे दैनिक जीवन में स्वच्छता बनाए रखने के महत्व के बारे में जागरूकता की कमी रखते हैं, जो उन्हें बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है.

 

 

कोरापुट जिले की हरी भरी घाटियाँ हजारों आदिवासी निवासियों का घर हैं. जनजातीय आबादी वाले इस क्षेत्र के गाँव, मानव विकास संकेतकों के निम्न स्तर को दर्शाते हैं. लेकिन उस क्षेत्र में इस तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, यह युवा और दयालु चिकित्सक, यह सुनिश्चित करने के लिए अथक रूप से काम कर रहे हैं, कि चिकित्सा सुविधाएं उन तक हर हाल में पहुंचे. उन्होंने गाँवकू चला समितिबनाई जिसका अर्थ है कि ‘गांवों की तरफ चलते है, उनके साथ-साथ उनके पेशे में समान विचारधारा वाले लोगों को शामिल किया गया है ताकि वह सभी भी आदिवासी क्षेत्र में गरीब लोगों को अपनी सेवाएं प्रदान कर सकें. उनके लिए, यह विचार जरूरतमंद लोगों को दी गई सेवा, भगवान के लिये की गई सेवा के बराबर है.

तर्कसंगत के साथ उनकी इस नेक पहल के बारे में बात करते हुए, डॉ. चित्तरंजन ने कहा, “2016 में चिकित्सा अधिकारी के रूप में इस जिले में मेरी पहली पोस्टिंग के बाद, मैं यहां के लोगों की समस्याओं से अच्छी तरह से परिचित हो गया. “गाँवकू चला समिति” के तहत, हम स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे हाथ धोने, मासिक धर्म, पीने के साफ पानी के बारे में जागरूकता बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, ताकि वह स्वस्थ जीवन जी सकें. इसके अलावा, मैं इस पेशे से जुड़े दूसरों लोगो से यह अपील करता हूं, कि वे अपनी सेवाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाएं.

 

 

इस समिति ने उस क्षेत्र के कई गांवों को अपने लक्ष्य में शामिल किया है, ताकि वह अपने विषय में महत्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता फैला सकें और उनके जीवन को बेहतर बना सकें. इसके अंतर्गत आने वाले बारह गाँव हैं- घाटमुंदर, अलची, बाघालमती, कलाती, गदरी, हालादिसिल, बेंडेला, अंबागुड़ा, कोरगुड़ा, फुंडागुडा, गडलिगुम्मा और लारेश. मलेरिया और डेंगू की रोकथाम में मच्छरदानी के उपयोग, मच्छर प्रजनन को रोकने के लिए पानी की सफाई, सफाई और रोकथाम के लिए विभिन्न गतिविधियाँ, पहले छह महीनों के लिए विशेष स्तनपान के महत्व पर स्तनपान कराने वाली माताओं की परामर्श और समुदाय की नियमित स्वास्थ्य जांच, ख़राब पस्थितियों को बदलने के लिए आयोजित की जा रही है.

 

 

उनकी पहल के परिणामस्वरूप, ग्रामीणों में कई सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं और इसे हर जगह से सराहना भी मिली है. इसी तरह की तर्ज पर, उन्होंने स्वास्थ सहायिका बहिनी (SSB) नाम से एक और पहल शुरू की है, जो ग्रामीणों के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को साझा करने और चिकित्सा अधिकारियों को इसकी सूचना देने की शक्ति देता है. यह पहल आदिवासी लोगों को चिकित्सा सेवाओं से लाभान्वित करने की शक्ति देता हैं, जो सेवाएँ अतीत में उन तक नहीं पहुंच पा रही थी. डॉ. जेना के वास्तविक प्रयासों के लिए सभी धन्यवाद, इस क्षेत्र में पिछड़ापन धीरे-धीरे बदल रहा है और वह इस जिले में तीव्र स्वास्थ्य परिदृश्य की स्थिति को बदलने के प्रति आशान्वित हैं. उनके अनुसार, आदिवासी लोगों के सामने कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन्हें केवल केंद्र और राज्य के हस्तक्षेप से हल किया जा सकता है.

 

 

डॉ. चितरंजन जेना ने तर्कसंगत को बताया,“उन्होंने कहा अभी जो हमारे लिये सबसे बड़ी समस्या है, वह है आंतरिक गांवों में सड़क संपर्क की कमी. अगर सरकार इन क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को लेकर बेहतर काम करती है, तो हम आपातकालीन स्थितियों में एम्बुलेंस प्रदान कर सकेंगे. भाषा का अंतर उन्हें मुख्यधारा से अलग करता है और उनके साथ जुड़ना मुश्किल हो जाता है. लेकिन हम सब तब तक इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, जब तक की हम इसे अन्य जिलों के लिए एक उदाहरण के रूप में स्थापित ना कर ले जाये.”

 

 

यद्यपि अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण जैसी अन्य समस्याओं के साथ इस जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है, लेकिन आदिवासी गांवों के चेहरे को पूरी तरह से बदलने के लिए उनके लिए एक कठिन चुनौती पेश की गई है, और वह एक सकारात्मक बदलाव लाने में अपना काम कर रहे हैं.

तर्कसंगत इस युवा डॉक्टर को आदिवासी क्षेत्र के लोगों के लिए अपनी सेवाएं प्रदान करने और एक बेहतर कल के लिए उनके महान प्रयासों को सलाम करता है.

 

लेख: अंकिता सिंह 

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