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ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वावलम्बी स्वरोज़गार का जरिया बन रहा है नंदघर

तर्कसंगत

April 10, 2019

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 हम भारतीय आने वाले समय में वर्ल्ड पॉवर बनने का दम भर रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि हममें एक राष्ट्र के रूप में ऐसा करने की क़ाबलियत और इच्छाशक्ति दोनों ही है. मगर इसके साथ साथ हमारे सामने कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जिससे हम नज़र नहीं चुरा सकते, या ये कहें कि उन बातों पर ध्यान दे कर हमारा हाल जंगल में नाच रहे मोर की तरह होता है जो बादल देख कर ख़ुशी से नाचता है मगर अपने पैर देख कर मायूस हो जाता है.

हमारे लिए मायूस होने का कारण है ग्रामीण परिवेश में बच्चों और महिलाओं की उपेक्षा. शहरी भारत और ग्रामीण भारत को मिल रही सुविधाओं  में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.

शहर में  महिलाएं जहाँ पुरुषों से कंधे से कंधे मिला कर या उनसे आगे बढ़ रही हैं. गाँव में अभी भी महिलाओं को अपनी बुनियादी अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है, न उन्हें अपनी जीविका कमाने की सहर्ष आज़ादी है न ही खुदसे अपने फैसले लेने का हक़ है. शहर के बच्चों को हर अत्याधुनिक सुविधाएं और अच्छी शिक्षा और पोषण मिल रहा है, ग्रामीण परिवेश के बच्चों की कहानी इसकी उलट है.

इन्हीं बुनियादी कमियों को पूरा करने के लिए वेदांता समूह नंदघर के माध्यम से एक सतत प्रयास कर रहा है. वेदांता विश्व स्तर पर काम करने वाली एक कंपनी है.

नंदघर एक बेहतर आंगनवाड़ी का यथार्थ रूप है. जिसे देश भर में बनाया जा रहा है. यह  महिलाओं के कौशल विकास और बच्चों की शिक्षा और पोषण पर केंद्रित है. व्यापर पर आधारित कौशल विकास कार्यक्रम होने के कारण इससे  जुडी महिलाओं को अपने लिए आजीविका कमाने का मौका मिल रहा है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उनके द्वारा  चलाये गए कैंपेन #BalanceForBetter की मदद से कई महिलाओं  ने नंदघर  से मिली सहायता के कारण ख़ुद के लिए बेहतर जीवन जीने की संभावनाओं की तारीफ़ की और साथ ही आभार व्यक्त किया.

अपनी अनुभव को साझा करते हुआ बनारस की धर्मा मौर्य कहती है कि “घर की चारदीवारी के बाहर एक अलग दुनिया थी मगर नंदघर की वजह से मुझे खुद से कमाने का आत्मविश्वास मिला, और आज में अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जी रही हूँ.”

यह कहानी  केवल एक धर्मा मौर्य की नहीं बल्कि उनके जैसी हज़ारों महिलाओं की है, जिनके मन मैं  कुछ करने की चाह थी और स्वावलम्बी होने की लालसा भी थी. अगर कमी थी तो एक मार्गदर्शक और मौके की. नंदघर ने उन्हें यह दोनों चीज़ दी है. नीचे दिए लिंक पर  ऐसी ही महिलाओं की कहानियां यहाँ देखिये 

 

 

वेदांता समूह के  फाउंडर और चेयरमैन अनिल  अग्रवाल का मानना है कि एक देश तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके बच्चे और महिलाओं  पर ध्यान दिया जाये. वेदांता ने महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ जुड़कर 11 राज्यों में 4000 नंदघर बनाने का लक्ष्य रखा है जिससे वह 8.5 करोड़ बच्चों और 2 करोड़ महिलाओं की ज़िन्दगी में एक सकारात्मक बदलाव ला पाएंगे.

एक अभूतपूर्व सफलता का  उदाहरण देते हुए वेदांता समूह ने चक्सू ब्लॉक जयपुर में अपने 500वें नंदघर के उद्घाटन की घोषणा की. आज राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश  में कुल मिलाकर 502 नंदघर के द्वारा 17000 बच्चों को प्रीस्कूल की पढ़ाई कराइ जा रही है. वहीं 11000 बच्चों को हर दिन पौष्टिक खाना दिया जा रहा है.

हमारा देश जहाँ 70%  आबादी ग्रामीण परिवेश में रहती है, जो खेती पर निर्भर है वहां इतने बड़े आबादी की महिलाओं और बच्चों की बुनियादी मुश्किलों और ज़रूरतों पर ध्यान दिया बगैर हम आगे बढ़ने की कल्पना नहीं कर सकते.

तर्कसंगत वेदांता समूह के द्वारा चलाये जाने वाले नंदघर के अथक प्रयासों की सराहना करता है जो भारत  के ग्रामीण महिलाओं और बच्चों को सशक्त और आत्मनिर्भर बना रहा है. ये वह लोग हैं जिन्हें नंदघर ने अशिक्षा, बेरोज़गारी, रूढ़िवादिता, असुरक्षित भविष्य के  बेड़ियों से मुक्त किया है और इनमें आत्मनिर्भरता, शिक्षा, स्वरोज़गार, खुशहाल भविष्य की संभावनाओं को मज़बूत किया है. 

 

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