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आख़िर मैं नोटा क्यों नहीं दबा सकता?

तर्कसंगत

April 11, 2019

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नोटा अर्थात् “नन ऑफ द अबव”, का महत्व दबी जुबान में पिछले तीन महत्वपूर्ण हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में सुनने को मिला. कुछ तथाकथित सवर्णों और बेरोजगार वर्ग ने नोटा अभियान चलाया और भाजपा को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.

नोटा का प्रतिशत चुनाव दर चुनाव बढ़ रहा है. कुछ चुनावों में तो ये मुख्य राजनीतिक पार्टियों के प्रत्यक्षियों को मिलने वाले वोटों के बाद तीसरे या चौथे स्थान पर हैं. सभी राजनैतिक पार्टियां इसका बढ़ता प्रभाव देख रहीं है, लेकिन कोई कुछ कहता नहीं. क्यों नहीं कहता, आप ख़ुद समझदार हैं.

 आइए! इसके इतिहास में जाते हैं. नोटा का आविष्कार सोवियत संघ के चुनावों में 1990 में हुआ. उद्देश्य साफ था कि वोटर की चुनाव में सहमति सिर्फ उपलब्ध विकल्पों से ना ली जाए अपितु उसकी विकल्पों से असहमति भी रिकॉर्ड की जाए, तभी तो ये एक स्वस्थ लोकतंत्र बनेगा. 1990 से पैर फैलाता हुआ ये नोटा, धीरे धीरे विश्व के अनेक देशों अमरीका, स्पेन, बुल्गारिया, ग्रीस, कनाडा, इंडोनेशिया, भारत, पाकिस्तान और ना जाने किस किस देशों में घुस गया. सभी जगह ये अपनी पकड़ मजबूत और मजबूत किए जा रहा है.

भारत तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां नोटा का आना तो लाज़िमी था ही. 2009 में भारतीय चुनाव आयोग ने उच्चतम न्यायालय से इसको लागू करने के बारे में पूछा, भारतीय सरकार को इसके अन्य देशों में प्रभाव को देखते हुए प्रारंभिक विरोध करना बनता था सो उन्होंने किया लेकिन सिविल सोसाइटी और तथाकथित बुद्धिजीवी लोग, जनहित याचिकाओं के साथ इसके समर्थन में उतर आए.

27 सितंबर 2013 को उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को ये आदेश दिया कि वो नोटा का बटन हर  ईवीएम में लगवा दे ताकि चुनावों में अधिकतम भागीदारी हो. यक़ीन नहीं करेंगे लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में ही 60,00,00 वोटों के साथ इसका प्रतिशत कुल डाले गए वोटों का 1.1% था. कई जगहों पर तो शीर्ष उम्मीदवारों के बीच वोटों के अंतर से भी, नोटा पर वोट ज्यादा पड़े. उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के दक्षिण ग्वालियर विधानसभा से विधायक श्री नारायण सिंह कुशवाह महज़ 121 वोटों से जीते जबकि नोटा को 1550 वोट मिले.

18 सितंबर 2015, को विख्यात भारतीय डिजाइन संस्थान अहमदाबाद ने इसकी आसान पहचान के लिए एक लोगो, चुनाव चिन्ह के तौर पर दे दिया “बैलेट पेपर पर एक बड़ा काला क्रॉस”. अगली बार चुनाव में मतदान के समय इस पर ज़रूर गौर फरमाइए.

अब आप नोटा क्यों नहीं दबा सकते, इसका भी एक कारण है. भारत में चुनाव आयोग, नोटा के मतों की गिनती तो करता है लेकिन उन्हें अवैध मानता है और चुनाव परिणामों में इसका योगदान नहीं होता. नोटा की गणना, कुल वैध मतों में नहीं की जाती और उम्मीदवारों की जमानत जब्त करने में नहीं की जाती.

जो भी हो, नोटा एक हथियार के रूप में उभर रहा है जिससे सभी राजनीतिक पार्टियां अपने एकाधिकार में ख़तरे के तौर पर देख तो रहीं हैं लेकिन ये और पैर ना पसार ले इसलिए कुछ बोल नहीं रही हैं. सभी राजनीतिक दल समझते हैं कि जनता त्रस्त है लेकिन क्रोनी कैपातिलिज्म और जातिगत वोटिंग के कारण, ध्रुवीकरण को ही आसान विकल्प जान भुनाती हैं. गरीबी, भूखमरी, बेरोज़गारी जैसे मुख्य मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, आरक्षण, पाकिस्तान जैसे मुद्दे नेताओं की चुनाव रैलियों में जगह बनाते हैं.

हालांकि नोटा प्रतिशत अधिक होने पर दोबारा चुनाव कराने और नोटा प्राप्त करने वाले उम्मीवारों को दोबारा चुनाव लड़ने से रोकने जैसे तमाम सुझावों भी दिए गए, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के विरोध और दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर जनरल वर्ग द्वारा नोटा के ग़लत इस्तेमाल के कारण, ये मसला चुनाव आयोग में विचाराधीन है. जिसका हल निकट भविष्य में संभावित है और नोटा शायद और ताकतवर विकल्प के रूप में उभरे.

लेखक: आयरा अविशि 

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