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क्या नक्सल प्रभावी इलाके में चुनावी नियुक्ति में सुरक्षा और सम्मानजनक मुआवज़ा मिल सकता है?

तर्कसंगत

Image Credits: India Today/ Representational Image

April 12, 2019

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“आगामी 2019 के लोकसभा चुनावों में मेरी ड्यूटी नक्सल प्रभावित इलाके में लगा दी गई है. घर में बूढ़े मां बाप है और एक छोटी बिटिया, अब नौकरी के कारण चंद रुपयों के लिए जान जोख़िम पर लगाने की मज़बूरी है. हालांकि जिलाधीश महोदय ने सभी एहतियात बरतने का और पूरी सुरक्षा का भरोसा दिया है, पर क्या कोई हमले ना होने की गारंटी दे सकता है?” एक सरकारी शिक्षक ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया.

चुनाव आयोग का एक आदेश वॉट्सएप ग्रुप में, चुनाव अधिकारियों के बीच फ़ैला हुआ है कि चुनाव के दौरान हार्ट अटैक या प्रकर्तिक मृत्यु होने पर 10 लाख़ रुपयों और किसी हमले में मृत्यु होने पर 20 लाख़ रुपयों का मुआवजा चुनाव आयोग द्वारा दिया जावेगा. इस वॉट्सएप मेसेज की पुष्टि, चुनाव आयोग की वेबसाइट से तो नहीं होती लेकिन ओड़िशा के चुनाव आयुक्त ने सामान मुआवजे की घोषणा 2014 में की थी, इस बात की तस्दीक कुछ पुरानी खबरों से की जा सकती हैं.

इन चुनाव ड्यूटी पर जाने वाले कर्मचारियों का दैनिक मानदंड भी उतना आकर्षक नहीं, कि जान दांव पर लगा दी जाए. प्रशासन संख्या कम होने का कारण बताकर, इच्छुक ना होने पर ड्यूटी भी कैंसल नहीं होने देता. ऐसे में ये सवाल उठता है कि कैसे मज़बूरी में गया कोई कर्मचारी चुनाव जैसी गंभीर ड्यूटी के लिए उपयुक्त है? और उससे बिना किसी डर एवं दवाब में कार्य करने की अपेक्षा की जा सकती है?

अब इस मुद्दे का दूसरा पहलू देखते हैं. चुनाव आयोग उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए 50 – 70 लाख़ ख़र्च करने की अनुमति, चुनाव की घोषणा से चुनाव संपन्न होने के एक दिन पहले तक करने की देता है और ये ख़र्च इससे ज्यादा ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कई पर्यवेक्षक भी नियुक्त किए गए हैं.

कई एनजीओ और सिविल संस्थाएं, आगामी चुनाव में  प्रचार और धन – सामग्री वितरण आदि में लगभग 2 लाख करोड़ रुपयों के ख़र्च होने का अपने अनुमान सही होने का दावा भी कर रहे हैं. वैसे पिछले 2014 के लोकसभा चुनावों में भी, जिस प्रकार मीडिया और अन्य संसाधनों का उपयोग हुआ उपर्युक्त आंकड़े को पूर्णतः नकारा भी नहीं जा सकता. चुनाव लड़ना कितना महंगा हो चुका है, ये भी किसी से अब छुपा नहीं है.

 

बिजनेस और सत्ता, एक दूसरे के पूरक

“क्रोनी कैपिटालिज्म” अब कोई नया शब्द नहीं रह गया. सभी जानते है कि बिजनेस से पैसा आता है और पैसे से राजनीतिक ताकत, इसलिए बिजनेस की कामयाबी की चाबी सत्ता में बैठे लोगों के पास है और सत्ता पाने की चाबी ऊंचे बिजनेस करने वाले लोगों के पास. इनकम टैक्स विभाग भी राजनीतिक पार्टियों के लगभग 46 फ़ीसद दान में मिले धन की तस्दीक नहीं कर पाता और ना ही कोई दूसरा राजनीतिक दल इस पर सवाल उठाता है.

अब एक तरफ़ तो जहां चुनावों में लगने वाला अपार और अघोषित धन है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के सबसे बड़े त्यौहार में अधमन से लगा एक मध्यम वर्गीय मजबूर कर्मचारी.

 

समस्या का संभावित हल

वैसे जब तक भारतीय समाज जाति, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, रंग, वर्ण, धर्म आदि के नाम पर विभाजित रहेगा, तब तक तो ये राजनीतिक पार्टियां विभाजन की आग पर ही सत्ता के लिए अपनी अपनी रोटी सकती रहेंगी. नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंसा या कम वोटिंग से, इनके स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता. प्रत्याक्षी तो चुनकर आ ही जाता है और वो सरकार बनाने में योगदान करता ही है.

राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वे लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए ऊंचा उठे और हिंसा संभावित क्षेत्रों में, स्थानीय नागरिकों और चुनाव कर्मचारियों का ऊंचा मनोबल बनाए रखने में सहयोग करें.

चुनाव आयोग को भी चाहिए कि वे मानदंड एवं मुआवजे की राशि को तुलनात्मक रूप से सम्मानजनक बनाए और सुनिश्चित करे कि चुनाव जैसी महत्वपूर्ण ड्यूटी पर लगा कोई भी कर्मचारी, बिना मन से या किसी दवाब में कार्य करने के लिए बाध्य ना हो. संभवतः बेरोजगारों की लंबी फेहरिस्त से या कुछ जांचे परखे वॉलंटियर्स को इस काम पर लगाया जाए.

 

लेखक: आयरा अविशि 

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