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महबूबा मुफ्ती : अनुच्छेद 370 को हटाया तो, जम्मू-कश्मीर भी भारत से स्वतंत्रता होगा

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Image Credits: India Today

April 15, 2019

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पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोमवार, 8 अप्रैल को कहा कि संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के परिणामस्वरूप जम्मू और कश्मीर, भारत से आजाद हो जायेगा. इस अनुच्छेद ने जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिया है.

उन्होंने PTI से बताया “यदि आप जम्मू और कश्मीर को धारा 370 से मुक्त करते हैं तो आप राज्य को देश से भी मुक्त कर देंगे. मैंने कई बार कहा है कि अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर को देश से जोड़ने वाला पुल है. यदि आप इस पुल को तोड़ते हैं तो भारत इस राज्य पर अपना संवैधानिक हक खो देगा. जिससे यह अपने आप में एक व्यावसायिक शक्ति बन जायेगा.”

 

“जम्मू-कश्मीर या भारत नहीं बचेगा”

जम्मू और कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती, 2019 के आम चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में किये गये एक वादे का जवाब दे रहीं थीं जिसमें संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने और अनुच्छेद 35A को भंग करने की बात कही गयी है. मुफ्ती के अनुसार “भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हुई है. चाहे वह किसानों का मुद्दे हों, बेरोजगारी या महंगाई हो. इसलिये वे अपने वोट हासिल करने के तरीके खोजने की कोशिश कर रहे हैं.”

मुफ्ती ने Scroll.in से बताया “जम्मू-कश्मीर की स्थिति में कोई भी बदलाव होने पर पूरे क्षेत्र को खतरा हो सकता है. पुलवामा आतंकी हमले ने हमें इस तथ्य की झलक दी कि यह क्षेत्र “विस्फोटकों का ढेर” है. अगर बीजेपी इस तरह के बयान देती है और इस तरह के इरादे रखती है तो जम्मू-कश्मीर आग की लपटों में घिर जायेगा और कोई भारत नहीं बचेगा.” अपने बयान में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा “अगर आप एक चिंगारी जलाएंगे तो सब कुछ जल जायेगा, फिर ना जम्मू-कश्मीर बचेगा और ना ही भारत.”

दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हुई है जिसमें उन्हें (महबूबा मुफ़्ती) और नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला को 2019 के लोकसभा चुनाव न लड़ने की अपील की गयी है. जिस पर उन्होंने ट्वीट करके कहा “यदि भाजपा धारा 370 को खत्म कर देती है तो वे स्वचालित रूप से भारतीय में चुनाव लड़ने से बच जायेंगे क्यूंकि 370 ख़तम होने पर वे स्वतंत्र हो जायेंगे और भारत का संविधान उन पर या जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होगा.”

नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक को फटकार लगायी है जब उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A से राज्य को कोई खतरा नहीं है.

कांग्रेस नेता सलमान अनीस सोज़ ने ट्विटर पर लिखा “2009 के बाद से, भाजपा कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित रूप से घाटी में लौटाने का वादा कर रही है और 1984 से अनुच्छेद 370 को खत्म कर रही है.”

जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने भी कहा कि धारा 370 के हटने से राज्य के लोगों के लिये “आज़ादी” का मार्ग प्रशस्त होगा.

अब्दुल्ला ने डाउनटाउन श्रीनगर के मुनवराबाद इलाके में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा “क्या वे (दिल्ली वाले) सोचते हैं कि वे धारा 370 को निरस्त कर देंगे और हम चुप रहेंगे? वे गलत हैं. हम इसके खिलाफ लड़ेंगे. मुझे लगता है कि अल्लाह की भी यही इच्छा है कि वे इसे निरस्त करें. उन्हें ऐसा करने दो, इससे हमारी आजादी का मार्ग प्रशस्त होगा.”

 

भाजपा नेताओं ने क्या कहा

मंगलवार 9 अप्रैल को, भाजपा नेताओं ने बताया कि कश्मीर घाटी के नेता संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A के नाम पर लोगों की भावनाओं के साथ खेल रहे हैं.

जम्मू कश्मीर के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा अध्यक्ष रविंदर रैना ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुये बताया “इन दो आर्टिकल्स का इस्तेमाल उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गुलाम नबी आजाद औरअन्य आधा दर्जन नेताओं ने किया है. इन नेताओं ने मूल रूप से आर्टिकल्स की रक्षा के नाम पर आज तक राज्य पर शासन किया है.”

“हमारे पास पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी हैं जो इन प्रावधानों के कारण नागरिकता के अधिकारों से वंचित हैं. राज्य को गहराई से और भावनात्मक रूप से स्वार्थी राजनेताओं ने बाँट दिया है. ऐसे नेता इस तरह के मुद्दों पर लोगों की भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं.”

 

अनुच्छेद 35A में क्या लिखा है?

संविधान में लिखा होने के बावजूद, जम्मू और कश्मीर राज्य में ना कोई मौजूदा कानून लागू है और ना कोई कानून राज्य के विधानमंडल द्वारा लागू किया गया है.

  •       जम्मू और कश्मीर राज्य के जो स्थायी निवासी हैं या होंगे, उनके वर्गों को परिभाषित करना.
  •       ऐसे स्थायी निवासियों का विशेष अधिकारों और विशेषाधिकारों या अन्य व्यक्तियों के सम्मान के रूप में कोई प्रतिबंध लगाना.
  •       राज्य सरकार के अधीन रोजगार.
  •       राज्य में अचल संपत्ति का अधिग्रहण.
  •       राज्य में समझौता.

छात्रवृत्ति और ऐसे अन्य प्रकार की सहायता के अधिकार जो राज्य सरकार प्रदान कर सकती है जो भारत के अन्य नागरिकों को किसी भी अधिकार से वंचित रखता है.”

 

यह कैसे हुआ?

1947 से पहले, J & K ब्रिटिश सरकार के अधीन एक रियासत हुआ करती थी. रियासतों के लोग ब्रिटिश का नहीं बल्कि “राज्य का विषय” था.

अनुच्छेद 35A को जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल की सलाह पर तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आदेश से 1954 में संविधान में शामिल किया गया था.

26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में प्रवेश के बाद, महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार को रक्षा, बाहरी मामलों और संचार पर नियंत्रण दिया. भारत के साथ संविधान में जुड़ना और अनुच्छेद 370 ने इस रिश्ते को औपचारिक रूप दिया.

J & K और भारत सरकार के बीच के संबंधों को आगे बढ़ाने के लिये 1952 में दिल्ली में इस समझौते पर चर्चा हुई. यहाँ, सरकारें इस बात पर सहमत थीं कि राज्य के सभी निवासियों को भारतीय नागरिकता दी जायेगी, लेकिन राज्य को विशेष अधिकारों और कानून बनाने का अधिकार होगा – जिन्हें स्थायी निवासी कहा जायेगा.

दिल्ली समझौते पर लोकसभा में अपने बयान में, प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा:

“नागरिकता का प्रश्न स्पष्ट रूप से उभरा है. वहां पूर्ण नागरिकता लागू होती है. लेकिन कश्मीर के हमारे मित्र एक या दो मामलों को लेकर बहुत आशंकित थे. महाराजा के समय में बहुत पहले वहाँ किसी भी बाहरी व्यक्ति अर्थात कश्मीर के बाहर के किसी भी व्यक्ति को, कश्मीर में भूमि खरीदने या रखने से रोकने के लिए कानून बनाये गये थे.

यदि मैं इसका उल्लेख करता हूं तो पुराने दिनों में महाराजा बड़ी संख्या में अंग्रेजों के वहां आने और वहां बसने से बहुत डरते थे क्योंकि जलवायु मनोरम है और अंग्रेज संपत्ति का अधिग्रहण कर रहे थे इसलिए उनके अधिकांश अधिकार ब्रिटिश शासन के अधीन महाराजा से छीन लिये गये थे, फिर भी महाराजा इस बात पर अड़े रहे कि बाहर से किसी को भी वहाँ भूमि का अधिग्रहण नहीं करना चाहिये और वह जारी है.”

“इसलिए कश्मीर की वर्तमान सरकार उस अधिकार को बचाये रखने के लिए बहुत उत्सुक है क्योंकि वे डरते हैं और मुझे लगता है कि यह डर सही है कि कश्मीर ऐसे लोगों से घिर जायेगा जिनकी एकमात्र उद्देश्य ज्यादा पैसा कमाना और वहां जमीन खरीदना हैं क्यूंकि यह जगह मनोरम है.”

“अब वे इसे उदार बनाने के लिए पुराने महाराजा के कानूनों को अलग-अलग करना चाहते हैं लेकिन फिर भी बाहर के व्यक्तियों द्वारा भूमि के अधिग्रहण पर जांच होनी चाहिये. हालांकि, हम इस बात से सहमत हैं कि इसे मंजूरी दे दी जानी चाहिये. पुराने राज्य के विषयों की परिभाषा ने भूमि, सेवाओं और अन्य छोटी चीजों के अधिग्रहण के बारे में कुछ विशेषाधिकार दिये हैं.”

“इसलिए हम इस पर सहमत हुये और ध्यान दिया: राज्य विधायिका में राज्य के स्थायी निवासियों के अधिकारों और विशेषाधिकारों को परिभाषित करने और लागू करने की शक्ति होगी. विशेष रूप से संपत्ति के अधिग्रहण, सेवाओं की नियुक्ति और तब तक पुराना राज्य कानून लागू रहेगा.”

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