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यूपी: सपेरों के इस समुदाय में, लड़की के जन्म पर उसकी माँ की पूजा की जाती है

तर्कसंगत

April 15, 2019

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क्या आपने एक गाँव देखा है जहाँ एक कुंवारा लड़का बहन न होने पर शादी नहीं कर सकता है? यदि नहीं, तो आपको उत्तर प्रदेश के जोगीडेरा गांव (तहसील बिल्हौर) का दौरा करना चाहिए. दिलचस्प बात यह है कि इस सदियों पुरानी परंपरा का ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के बहुप्रचारित सरकारी अभियान से कोई लेना-देना नहीं है.

राज्य की राजधानी लखनऊ से केवल एक घंटे की दूरी पर होने के बावजूद ‘बेटी को बचाने की मान्यता रखने वाले ये सपेरे इस सरकारी अभियान से अनजान हैं. इन्हें हमारे आपकी तरह शहर की सुख सुविधाओं से लेना देना नहीं है न ही इन्हें प्राइवेट अस्पताल में जा कर लिंग जांच करवाने की लालसा.

जब से वे 15 वीं सदी के संत गुरु गोरखनाथ के शिष्य बने, तब से इनके समुदाय ने हमेशा महिलाओं को ‘शाक्ति’ (देवी पार्वती) के रूप में देखा और उसी के अंबुरूप इज़्ज़त दी है, इनका मानना है कि वही शक्ति उन्हें घातक सांपों को पकड़ने, सांपों का इलाज करने, उसके जहर काटने से लड़ने के लिए साहस देती है.

 


 

सपेरों की जीवनशैली भी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी यह समुदाय अनिश्चितताओं और अन्य परेशानियों से भरा जीवन जी रहा है, इनके जीवन यापन का तरीका आज तक नहीं बदला, जो एक तरह से यह भी बतलाता है कि इनकी जीविका इस आधुनकि भारत में भी चल जा रही है किसानों की तरह नहीं जो अब गाँव छोड़ शहर की तरफ भाग रहे हैं, अपवाद अपितु हर जगह होते हैं.  सबसे दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस समुदाय के ‘महंत’ हैं.

20 वीं शताब्दी में उनके लिए परिस्थिति वास्तव में काफी अच्छी थीं, जब देशी रियासतों के शासकों ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया और अपने ब्रिटिश आकाओं को खुश करने के लिए उन्हें विदेश भेजा और ‘रस्सी चाल’ का प्रदर्शन किया, जिसने भारत को स्नेक चार्मर्स की भूमि के रूप में ब्रांडेड किया था और कई लेखकों ने भारत को चमत्कारी शक्तियों और करतबों वाले अर्ध-नग्नो के राष्ट्र के रूप में चित्रित किया.

 


 

इनका यह हुनर अब खतरे में है, और पहले से अधिक चिंताजनक स्थिति भी है क्यूंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम- 1972 के तहत यह जानवरोन का उपयोग अपनी आजीविका कमाने के लिए नहीं कर सकते.


समय के साथ उनकी स्थिति ख़राब हुई मगर इससे उनके मन में लड़कियों और औरतों के प्रति प्यार कम नहीं हुआ. जोगीडेरा गाँव का एक सपेरा गड्ढों से भरी एक धूल भरी सड़क पर चलता हुआ,हर रोज़ अपनी आजीविका कमाने निकलता है, वह कमाने के लिए अपने घर की महिला का उपयोग करने के बजाय मरना पसंद करेगा. इसलिए नहीं क्यूंकि उसे उसकी क्षमता पर शक है इसलिए कि ये उसके खुद के लिए असहनीय होगा.  

वन अधिकारियों द्वारा हमें परेशान करने के बाद, हमने पैसे कमाने के लिए ‘नागिन’ बैंड का गठन किया. हमारे समुदाय के सदस्यों ने फैसला किया कि केवल पुरुष ही नृत्य प्रदर्शन करेंगे. हम पैसे कमाने के लिए एक महिला को डांस करने से ज्यादा मरना पसंद करेंगे,” शमशेर नाथ ने कहा, जो संजू सपेरा बैंड चलाते है और समुदाय के नेता भी है.

उनके सहयोगी कमलेश नाथ ने कहा, “परंपरा हमारा धर्म है. हम ये याद रखते हैं कि हमारे पूर्वजों ने क्या उपदेश दिया है. पूर्वजों ने हमसे कहा था कि हम अपनी बेटियों की शादी बिना बेटियों के परिवार में न करें. हमारे लिए, यह एक आज्ञा है जिसे हम कभी मना नहीं कर सकते.”

नाथ ने आगे कहा “बेटी के बिना परिवार एक बुरा शगुन नहीं है, ये भाग्य का खेल भी है पिछले जन्म में किए गए पापों का परिणाम है.”

बालिकाओं को बचाने की परंपरा के बारे में बोलते हुए, कमला देवी ने कहा: “मुझे लगता है कि यह केवल हमारे समुदाय में है कि हम महिलाओं को बहुत सम्मान मिलता है. अन्य समुदायों में, एक महिला एक बालिका को जन्म देने के लिए मार दी जा सकती है, लेकिन हमारे यहाँ, ऐसा करने के लिए सचमुच उसकी पूजा की जाती है.”


समुदाय की अन्य महिलाओं के विचार लगभग समान थे लेकिन उनकी अपनी समस्याए भी थी. एलपीजी सिलिंडर उनकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर है, जो जोगीदेरा तक पहुंचना बाकी है. उन्होंने देखा है कि प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना के कारण पड़ोसी गाँव की महिलाओं की खाना पकाने की जीवन शैली कैसे बदल गई है.

“हमें केवल पारंपरिक ‘चूल्हा’ का उपयोग करने की स्वतंत्रता है.” हर कोई सिलेंडर प्राप्त कर रहा है, मैं चाहती हूं कि किसी दिन हम भी सिलेंडर का उपयोग करके खाना बनाएंगे,” उर्मिला नाथ ने कहा.

जब उनकी खराब स्थिति के बारे में पूछताछ की गई, तो उप-विभागीय मजिस्ट्रेट हिमांशु गुप्ता के पास उनके आर्थिक अभाव के बारे में कोई जवाब नहीं था.

जबकि समुदाय ने यह सब उनके भाग्य के रूप में स्वीकार कर लिया है गुप्ता को उनके अस्तित्व के बारे में बिल्कुल भी पता नहीं था. चुनाव-संबंधी कार्यों में बहुत व्यस्त होने के बहाने, उन्होंने बस इतना कहा कि यदि आपके पास ऐसा कोई विवरण है, तो आप ब्लॉक कार्यालय जाएं. जबकि ब्लॉक के अधिकारियों को चुनाव-संबंधी कार्य के लिए  फ़ील्ड में होने के लिए कहा गया है.

 


हालांकि, जब संपर्क किया गया, तो अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) वीरेंद्र पांडे ने उनकी दुर्दशा के बारे में सुना और यहां तक ​​कि जल्द ही गांव का दौरा करने का आश्वासन दिया और गुप्ता से रिपोर्ट लेने का वादा किया.

जोगिदेरा की अविश्वसनीय कहानी हर एक सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि भारत में महिला सशक्तीकरण कहाँ है ? सत्ता के उच्च गलियारों में या सपेरों के दिलों में. वे अनपढ़, गरीब लेकिन निर्दोष, संतुष्ट और खुश हैं. हालाँकि, वे स्मार्टफोन के बिना खुश हैं, लेकिन  उन्होंने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को अनजाने में एक वास्तविकता में बदल दिया.

 

लेख: रज़ा नक़वी 

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