पर्यावरण

ओडिशा में महिलायें 20 साल से कर रही हैं जंगल की रक्षा

तर्कसंगत

April 15, 2019

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ओडिशा में महिलाओं का एक समूह 1999 के विनाशकारी तूफान के बाद करीब 20 साल से जंगल की रखवाली कर रहा है. महिलाओं के पास लकड़ी तस्करों और लकड़बग्घों से मैंग्रोव और कैसरिना वन की रक्षा के लिये एक योजना है. सुपर साइक्लोन की वजह से मैंग्रोव ने ग्रामीणों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था. जादवपुर विश्वविद्यालय के 2019 के एक अध्ययन में बताया गया कि ओडिशा के तटीय जिलों में बाढ़ से ज्यादा चक्रवात का खतरा होता है.

महानदी डेल्टा में पुरी के प्रसिद्ध मंदिर जिले के गुंडलबा गाँव की 75 महिलाये, झूला झूलने और उनकी मज़बूत बाँस की डंडियों से तटवर्ती वुडलैंड की इस रेतीली पट्टी को लकड़ी तस्करों और पेड़ काटने वालों से बचा रही हैं.

“हम अपनी लाठी को जमीन पर मारते हैं और 10-10 के समूहों में पहरा देते हैं. हम जंगलों के अंदर फैल जाते हैं और सीटी बजाते हैं. स्थानीय जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने की मंशा रखने वाला कोई भी व्यक्ति हमारी सीटी और पेड़ की टहनियों पर हमारे डंडे की आवाज सुनकर भाग जाता है.” 52 साल की चारुलता बिस्वाल ने इस अद्भुत यात्रा के बारे में मोंगबाय-इंडिया के संवाददाता को बताया.

बिस्वाल, पीर जहानिया वन सुरक्षा समिति की सचिव हैं, जिनका पोषण उन महिलाओं द्वारा किया जाता है जो 1999 में उत्तरी हिंद महासागर से उठे सुपर साइक्लोन की तबाही के बाद इस मिशन में शामिल हुई थीं.

इस समूह ने 2012 में, अपने गाँव की प्राकृतिक विरासत को फिर से जिन्दा करने के प्रयासों के लिये UNDP India Biodiversity अवार्ड जीता था. यह गाँव राज्य के पुरी जिले में अस्सरांगा समुद्र तट से सिर्फ आधा किलोमीटर दूर है.

 

 

पीर जहानिया तीर्थ के किनारे पर धीरे-धीरे लहरों की शांत ध्वनि और खूबसूरत सूरजमुखी के खेत हैं जिसे 29 अक्टूबर, 1999 को चक्रवात ने  बर्बाद कर दिया था.

बिस्वाल ने बताया “भारत और विश्व के सभी लोग चक्रवात के बारे में जानते हैं. इसने हमारे घरों और खड़ी फसलों को नष्ट कर दिया था. कसारिना के बागान भी इससे प्रभावित हुये थे. मिट्टी खारी हो गई थी. कई दिनों से खाना नहीं मिला था और हमारे बच्चों के पास पहनने के लिए कपड़े भी नहीं थे. लेकिन हमने महसूस किया कि यह जंगल मैंग्रोव प्रजातियों के कारण था और हम अभी भी जीवित हैं. तब हमने संकल्प लिया कि हम जंगल की रक्षा करेंगे और इसकी जैव विविधता को बहाल करेंगे.”

सुरक्षा दस्ते की स्थापना के बारे बिस्वाल ने बताया कि 2001 में 70 महिलाये एक साथ आईं जिसके बाद 75 हेक्टेयर के वन क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिये हर घर से आई महिलाओं ने वन सुरक्षा समिति का गठन किया. देवी नदी के पास इस गाँव में अब 103 घर हैं. समिति के शुरुआती दिनों में पुरुषों की एक सहायक भूमिका थी लेकिन अब इसमें पुरुष सदस्यों को भी शामिल करना शुरू कर दिया गया है.

बेहेरा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया “पुरुष लोग सुपर साइक्लोन के बाद आजीविका को फिर से स्थापित करने और घरों के पुनर्निर्माण में व्यस्त थे. महिलाओं ने प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल करने के लिए इसे स्वयं शुरू किया. यह वह महिलाये हैं जो इन संसाधनों की देखभाल के लिए सुरक्षा और निगरानी दस्ते का निर्माण करती हैं.”

“हम दिन में दो बार गश्त के लिए जाते हैं. अपने दैनिक कामों को पूरा करने के बाद, हम सुबह 7.30 बजे से निगरानी का एक दौरा करते हैं और फिर अपने घरों को लौट जाते हैं. हमारे दोपहर के भोजन के बाद हम फिर से सतर्कता के लिये निकलते हैं.”

 

लेकिन क्या उन्हें जंगल में डर नहीं लगता?

 

“नहीं, हमें क्यों डरना चाहिये? जंगल हमारे घर का एक विस्तार रूप है. हालाँकि हमारे पास अधिकार नहीं है फिर भी हम इसके प्रति कर्त्तव्य महसूस करते हैं. यहाँ प्रत्येक पेड़ की तुलना एक बच्चे से की जाती है” बिस्वाल ने बताया.

“क्या अपने बच्चों को तकलीफ में देख कर दुख नहीं हुआ था? एक माँ ऐसा ही सोचती है और हमारे लिये पेड़ हमारी विरासत हैं. हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह स्वाभाविक रूप से हमारे अंदर से आता है. इससे हमें एक-दूसरे के जीवन जानने का मौका भी मिलता है. हम आजकल एक दूसरे को सचेत करने के लिये मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं.”

 

Women of forest protection committee in Odisha

https://india.mongabay.com/2019/03/a-womens-squad-in-odisha-defends-its-forest-for-20-years/The women vigilantes protecting Odisha's forests.#EnvironmentAndHer #IntlForestDay #InternationalDayofForests

Posted by Mongabay-India on Wednesday, 20 March 2019

 

रहीमा बीबी ने बताया “हमने कई लोगों को पकड़ा है और लोगों के खिलाफ कई मामले दर्ज किये हैं. कभी-कभी हमें इन चोरों को धमकाने के लिये अपनी लाठी का इस्तेमाल भी करना पड़ता है.”

समिति के सदस्यों ने जंगल के प्रबंधन के लिये, नियमों के एक सेट को पारित किया है जिसमें उन प्रथाओं को शामिल किया गया है जो उन्हें पड़ोसी गांवों के साथ संघर्ष से बचने में मदद करते हैं और लकड़ी के अपने स्टॉक के लिये जंगल पर निर्भर रहते हैं.

मिसाल के तौर पर, महिला समिति ने हर महीने एक दिन तय किया है जिसके दौरान गाँव के सभी घरों में जंगल से ईंधन (लकड़ियां) इकट्ठा करने की अनुमति है.

रहिमा बीबी ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच एकता पर जोर देते हुए कहा “हम वन विभाग के साथ सहयोग करते हैं लेकिन विभाग के अधिकारी आते हैं और चले जाते हैं.” शुरुआत में, महिलाओं ने वन आवरण के महत्व पर जागरूकता पैदा करने में समय और ऊर्जा का योगदान भी दिया है.

“कैसरिना के पेड़ और अन्य प्रजातियां नमक के असर वाली हवा को किसान भूमि में जाने से रोकती हैं और साथ ही खेतों में कहर बरपाने ​​वाली नमी से भरी हवा को आगे बढ़ा देती हैं. मैंग्रोव वन, तटीय क्षेत्र की मिट्टी के कटाव को भी रोकते हैं और कुल मिलाकर जंगल वन्यजीवों का संरक्षण करते हैं.”

एक महिला ने बताया, सुपर साइक्लोन में, लगभग 30,000 कैसरिना के पेड़ बर्बाद हो गये थे और मैंग्रोव जलमग्न हो गया था.

बेहेरा ने विस्तार से बताया “सुपरकाइक्लोन में लगभग 70 प्रतिशत पेड़ नष्ट हो गये थे. मैंग्रोव के पत्तों का टूटना शुरू हो गया था लेकिन उनकी जड़ें बरकरार थीं. स्थानीय समुदाय के सदस्यों ने मैंग्रोव पौधों और अभी भी खड़े कैसुरिनास को देशी प्रजातियों के रूप में उबारना शुरू कर दिया था.”

भारत जैव विविधता पुरस्कार प्रशस्ति पत्र के अनुसार, मैंग्रोव वन क्षेत्र 1985 में 2.58 वर्ग किमी से बढ़कर 2004 में 4.21 वर्ग किमी हो गया है.

“धीरे-धीरे जंगल वापस आ रहा है. पक्षियों ने घोंसला बनाना शुरू कर दिया है और हमने एक बार फिर पक्षी की आवाज सुनी है. अब हिरण इतनी संख्या में हैं कि वे कभी-कभी हमारी फसलों पर हमला भी कर देती हैं, ”बिस्वा ने बताया.

 

 

बिस्वाल और रहीमा बीबी ने जंगल ने उनके गाँव की ओर इशारा करते हुये बताया “जंगल के करीब के गाँव के एक हिस्से में मीठा पानी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि मैंग्रोव और अन्य पेड़ प्रजातियां खारे पानी को जाने से रोकती हैं”

हमारे कृषि क्षेत्र तूफानी लहरों और हवाओं के प्रचंड प्रभाव से सुरक्षित हैं. समिति को विश्वास है कि आपदाओं से निपटने के लिए यह अच्छी तरह से तैयार है.

बिस्वाल ने बताया “1999 के चक्रवात ने हमें सिखाया है कि जिन गांवों को मैंग्रोव ने ढाल दिया था. उन्हें ऐसी आपदा से बेहतर सुरक्षा मिली है. हम अब सामुदायिक वन प्रबंधन के लिये वन विभाग के साथ अपने समूह को पंजीकृत करने की तैयारी कर रहे हैं.”

उत्तर हिंद महासागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के 122 वर्षों (1877-1998) का विश्लेषण करने वाले एक अध्ययन के अनुसार “अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में लगभग चार गुना अधिक उष्णकटिबंधीय चक्रवात आते हैं. मई, अक्टूबर और नवंबर में चक्रवात सबसे अधिक आते हैं. हर साल औसतन पांच से छह उष्णकटिबंधीय चक्रवात आते हैं.  नवंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या दोगुनी हो जाती है.”

 

 

ओडिशा में पिछले 200 वर्षों (1804 से 1999) में 128 उष्णकटिबंधीय चक्रवात दर्ज किये गये हैं जिसमें 28 से 30 अक्टूबर, 1999 को 7.5 मीटर का सुपर साइक्लोन आया था जिसमें लगभग 10,000 लोग मारे गये थे. बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती बाढ़ तूफान, तेज बारिश और उच्च वर्षा के कारण उच्च जल स्तर के साथ जुड़ा हुआ है.

जादवपुर विश्वविद्यालय में 2019 के ‘स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज’ के अनुसार, इन जिलों की मुख्य आजीविका कृषि (71 प्रतिशत) है. महानदी के डेल्टा के पास समुदाय पर ऐसे चक्रवात का गहरा असर पड़ा है.

बिस्वाल ने बताया “अब हम युवा पीढ़ी को इसमें शामिल कर रहे हैं और एक ऐसी विरासत बना रहे हैं जो भविष्य में संसाधनों का बेहतर दिशा में उपयोग कर सके.”

 

यह लेख मूल रूप से 21 मार्च, 2019 को मोंगाबे में प्रकाशित हुआ था.

 

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