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भारत पर चिकित्सक संकट : देश में 6 लाख डॉक्टरों, 20 लाख नर्सों की कमी

तर्कसंगत

Image Credits: Jagran (Representational)

April 16, 2019

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अमेरिका के Center for Disease Dynamics, Economics & Policy (CDDEP) द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया है कि भारत में तक़रीबन 6,00,000 डॉक्टरों और लगभग बीस लाख नर्सों की कमी है. शोधकर्ताओं ने बताया कि कर्मचारियों की कमी रोगियों को जीवनरक्षक दवाओं तक पहुंचने से रोक रही है.

 

अध्ययन क्या कहता है?

भारत में करीब 65% स्वास्थ्य का खर्चा खुद के जेब से किया जाता है जो लगभग 5.7 करोड़ लोगों को सालाना गरीबी रेखा के नीचे ले जाता है. जान बचाने वाली एंटीबायोटिक्स उपलब्ध होने पर भी मरीज और उनके परिवार के सदस्य ऊंचे दाम नहीं दे पाते हैं. अध्ययन में बताया गया है कि ऐसे ऊँचे खर्चों के लिये, सरकार द्वारा कुछ न करने को जिम्मेदार ठहराया जाता है.

अध्ययन के अनुसार, दुनिया में हर साल 57 लाख एंटीबायोटिक उपचार से होने वाली मौतों में से अधिकांश कम और मध्यम-आय वाले देशों में होती हैं. इन देशों में, उपचार होने लायक जीवाणु संक्रमणों से काफी ज्यादा मौतें होती है जोकि एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों से करीब 700,000 अधिक है. शोधकर्ताओं ने क्रमशः मध्य, निम्न और उच्च आय वाले देशों में एंटीबायोटिक दवाओं में महत्वपूर्ण बाधाओं की पहचान करने के लिये क्रमशः भारत, युगांडा और जर्मनी में इंटरव्यू और साहित्य समीक्षाएँ आयोजित की हैं.

 

डॉक्टरों और नर्सों की कमी

उचित स्वास्थ्य देखभाल में एक अच्छे कर्मचारियों की कमी बाधा के रूप में काम करती थी. भारत में, प्रत्येक 10,189 लोगों के लिये एक सरकारी डॉक्टर है यानी भारत में लगभग 6,00,000 डॉक्टरों की कमी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) 1: 1000 के अनुपात की सिफारिश करता है. साथ ही नर्स-रोगी का अनुपात 1: 483 है जो लगभग दो मिलियन नर्सों की कमी बताता है.

CDDEP के निदेशक रामनयन लक्ष्मीनारायण ने बताया “वर्तमान में एंटीबायोटिक दवाओं की कमी से, एंटीबायोटिक प्रतिरोध की तुलना में ज्यादा लोगों जान जाती है लेकिन ये बाधायें क्यों हैं इस बारे में हमारे पास कोई अच्छा कदम नहीं है. रिसर्च और खोज के बाद और नई एंटीबायोटिक दवा होने के बाद भी नियमित बाधायें आती हैं जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं में देरी और बाजार में दवा की उपलब्धता नहीं हो पाती है.”

उनके शोध से पता चलता है कि 1999 और 2014 के बीच बाजारों में आने वाली  21 नई एंटीबायोटिक्स, अधिकांश उप-सहारा अफ्रीकी देशों से आती थीं जिसमें से 4 या 5 ही पंजीकृत थे. इसके अलावा, सिर्फ एक एंटीबायोटिक या एक दवा के अस्तित्व का यह मतलब नहीं है कि वे उन लोगों मिल रही हैं जिन्हें इसकी आवश्यकता है.

शोध में बताया गया है कि विश्व स्तर पर, एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित उपयोग और खराब रोगाणुरोधी पर्यवेक्षण न केवल उपचार को रोकता है बल्कि दवा के प्रतिरोध को भी बढ़ावा देता है. जिससे पहले से मौजूद दवाओं की उपलब्धता और भी कम हो जाती है. 1960 के दशक के बाद से, नये टीके और ​​परीक्षणों के लिये अनुसंधान और विकास धीमा हो गया है क्योंकि निवेश की बात आने पर कम बिक्री से लाभ कम होता है. कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं का समावेश, अनुसंधान और विकास में मंदी के लिए एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आया है.

भारत की स्वास्थ्य सेवा दो गुना संकट से जूझ रही है – खराब बुनियादी ढांचा और मानव संसाधन. विभिन्न स्रोतों से संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि डॉक्टरों की कमी ने देश के बहुत से हिस्सों में जान जाने में योगदान दिया है. जबकि सरकार ने स्वास्थ्य खर्चे को बढ़ाने की कसम खाई है लेकिन मुख्य समस्या महंगी दवाईयाँ और उनकी कमी है जिसके लिये कुछ किया जाना चाहिये.

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