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बीएसएनएल और एयर इंडिया को पीछे छोड़ते हुए इंडिया पोस्ट को 15,000 करोड़ रुपये का घाटा

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Image Credits: Jagran.com

April 17, 2019

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भारत सरकार के स्वामित्व वाले उपक्रम इंडिया पोस्ट ने घाटे के मामले में अन्य सरकारी उपक्रमों बीएसएनएलऔर एअर इंडिया को भी पीछे छोड़ दिया है. पिछले तीन वित्त वर्ष में इंडिया पोस्ट का घाटा बढ़कर 150 फीसदी की बढ़त हुई है. अब यह सबसे ज्यादा घाटे वाली सरकारी कंपनी हो गई है.

इंडिया पोस्ट ने वित्त वर्ष 2018-19 में वेतन और भत्तों पर 16,620 करोड़ रुपये ख़र्च किए. इसमें पेंशन का ख़र्च 9,782 करोड़ रुपये भी जोड़ दें तो कुल ख़र्च 26,400 करोड़ रुपये हो जाता है. घाटे में चल रही अन्य कंपनियों की तरह इंडिया पोस्ट के फाइनेंसेज उच्च वेतन और भत्तों की वजह से काफी कम हो चुकी है. कंपनी के वेतन और भत्ते की लागत कंपनी की वार्षिक आय के 90 फीसदी से अधिक है.

घाटे के लिए बदनाम दूसरी सरकारी कंपनी बीएसएनएल को वित्त वर्ष 2018-19 में 7,500 करोड़ रुपये और एयर इंडिया को वित्त वर्ष 2017-18 में 5,337 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2019 में कंपनी के राजस्व और ख़र्च के बीच का अंतर 15,000 करोड़ रुपये का है. केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में की जाने वाली बढ़ोतरी के चलते इंडिया पोस्ट में वेतन लगातार बढ़ रहा है, जिससे डाक सेवाओं से होने वाली आय में भी लगातार गिरावट आ रही है.

 

 

कंपनी वित्तीय संकट से बाहर निकलने के लिए लगातार कोशिश कर रही है, लेकिन प्रोडक्ट कॉस्ट और पारंपरिक मेलिंग सर्विसेस में उपलब्ध सस्ते विकल्पों के बीच असमानता के कारण इसमें नाकाम हो रही है. सूत्रों ने कहा कि इंडिया पोस्ट से अपनी 4.33 लाख इम्प्लाइज की वर्कफोर्स और 1.56 लाख पोस्ट ऑफिसेस के नेटवर्क के दम पर ई-कॉमर्स और अन्य वैल्यू एडेड सर्विसेस में संभावनाएं खंगालने के लिए कहा जा सकता है.

एक अधिकारी ने कहा, ‘डाक सेवा जैसी सार्वभौमिक सेवा के लिए घाटा होगा क्योंकि देश में सभी व्यावसायिक बैंकों की शाखाओं (1.16 लाख) की तुलना में डाक कार्यालयों की संख्या् अधिक है. हालांकि उत्पाद सेवा और उसकी कीमत के बीच बड़े अंतर को घटाए जाने की जरूरत है.’

इंडिया पोस्ट अपने हर पोस्ट कार्ड पर 12.15 रुपये ख़र्च करता है लेकिन उसे सिर्फ 50 पैसे यानी लागत का चार फीसदी ही मिलता है. औसतन पार्सल सेवा की लागत 89.23 रुपये है लेकिन कंपनी को इसका सिर्फ आधा ही मिलता है. बुक पोस्ट, स्पीड पोस्ट और रजिस्ट्रेशन आदि के साथ भी ऐसा ही होता है.

व्यय सचिव की अध्यक्षता में व्यय वित्त समिति ने हाल ही में डाक विभाग से कहा था कि यूजर्स से शुल्क वसूलने के लिए कंपनी को आत्मनिर्भर होना चाहिए क्योंकि केंद्र के बजट में इस तरह के रेकरिंग वार्षिक घाटा शामिल नहीं होता. लागत बढ़ती जा रही है लेकिन आय घट रही है क्योंकि इसके विकल्प मौजूद है. लोग डाक के बजाए अब ईमेल, फोन कॉल आदि का इस्तेमाल करने लगे हैं.

 

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