मेरी कहानी

मेरी कहानी: अब तो एक उंगली से मिटा दी जाती हैं तमाम यादें यह नाउम्मीदी का दौर है कुछ कहते सुनते रहा करो…

तर्कसंगत

Image Credit : Dr. Swayambhu Shalabh

April 17, 2019

SHARES

खतों की बात पुरानी हो चली…

वो भी क्या दिन थे जब खतों में दिल का हाल लिखा जाता था…कोरे कागज पर जज्बात उकेरे जाते थे.. लफ़्जों में अहसास पिरोये जाते थे… पढ़ने वाला भी उसी शिद्दत से हर्फ़ दर हर्फ़ महसूस करता था…खत भेजने में भी वही शिद्दत होती थी…जवाब आने के इंतज़ार में भी वही बेताबी रहती थी…वो जज्बात पन्नों पर अरसे तक महफूज रहते थे…

जमाने की हवा ऐसी चली कि मिलने जुलने और मिल बैठ कर गपशप करनेवाले वाले लोग भी अचानक आंखों के सामने से गायब हो गए…

फिर यह काम फोन से होने लगा…मोबाइल आने के बाद लोग दूर रहकर भी एक दूसरे के करीब महसूस करने लगे…

वक्त तेजी से बदला…अब तो फोन कॉल करना भी भारी लगने लगा है…पूरा माहौल ही बदल गया…होली दीवाली हो…नया साल हो या कोई और पर्व त्योहार…हर मौके पर एक मैसेज सभी सगे संबंधियों और दोस्तों को फॉरवर्ड कर देना कितना आसान हो गया है…हम अचानक से डिजीटल दुनिया में आ गए हैं…

हमारी भावना… हमारी संवेदना…हमारी पूरी दुनिया ही मोबाइल फोन और लैपटॉप में सिमट गई है…अब हर किसी को अलग अलग संदेश भेजने की जहमत उठाने की भी जरूरत नहीं पड़ती…एक मैसेज कहीं से कॉपी करके एक साथ तमाम लोगों को ब्रोडकास्ट कर देना है…

अपने मन की बात कहने या खुद से कुछ लिखने की जरूरत ही खत्म हो गई है जैसे…सिर्फ कॉपी पेस्ट और फॉरवर्ड करना सीखना है…

जेब में अब कलम रखना जरूरी नहीं रहा… स्मार्ट फोन रखना जरूरी हो गया है…सेकेंडों में एक मैसेज सबों के पास पहुंच जाते हैं…बस एक मैसेज फॉरवर्ड कर दिया… बात भी खत्म…सारा काम भी खत्म…सबसे बड़ा गजब ये कि एक पल में उंगली से डिलीट भी कर दी जाती हैं तमाम यादें…

इसमें कोई शक नहीं कि इस डिजिटल युग में इस तकनीकी सहूलियत ने संप्रेषण को आसान बनाया है लेकिन क्या इस बात का खयाल रखा जाना जरूरी नहीं कि यह आदत कहीं हमारी अभिव्यक्ति की क्षमता को ही न खत्म कर डाले… हमारे जज्बात ही न मर जाएं… संवादहीनता की इस सुरंग में चलते चलते कहीं हम बिल्कुल तन्हा न हो जाएं…

लेख – डा. स्वयंभू शलभ

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...