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योगिता रघुवंशी : 49 साल की सिंगल मदर और भारत की पहली महिला ट्रक ड्राइवर

तर्कसंगत

Image Credits: The Hindu

April 18, 2019

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आज की महिलाएं पुरुषों के दबदबे वाले कामकाज में अपनी दावेदारी और हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा रही हैं. मगर हम फिर भी अपने घर की महिलाओं को वैसे ही काम काज चुनते हैं जिसमे ज़्यादा खतरा न हो और हो सके तो घर बैठे आसानी से किया जा सके. मगर हमारी आपकी सोच से कहीं ऊपर 49 साल की योगिता रघुवंशी  भारत की पहली महिला ट्रक ड्राइवर हैं.

 

 

 

लॉ के साथ कॉमर्स ग्रेजुएट और सिंगल मदर 

मध्यप्रदेश राज्य के भोपाल शहर की रहने वाली योगिता एक लॉ ग्रेजुएट हैं और साथ ही दो बच्चों यशिका और याश्विन की माँ भी हैं. वह बीते 15 सालों से ट्रक चला रही हैं और लाखों किलोमीटर तक से ज़्यादा का सफर अपने ट्रक से देश के कोने-कोने तक तय कर चुकी हैं. तो क्या वो ऐसा अपने शौक को पूरा करने के लिए कर रही हैं ? नहीं ऐसा नहीं है, किसी और आम लड़की की तरह उनकी ज़िन्दगी भी पहले अच्छी गुज़र रही थी, उन्होनें बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी से लॉ में ग्रेजुएशन कॉमर्स की भी पढाई की साथ ही उनके पास ब्यूटीशियन का प्रमाणपत्र भी है और लॉयर्स एंड जुरिस्ट्स में काम कभी किया. योगिता ना केवल हिंदी, बल्कि अंग्रेजी, गुजराती, मराठी और तेलुगू भी काफी अच्छे से बोल लेती हैं.

 

 

मुसीबत से सामना

1991 में शादी के वक़्त उन्हें बताया गया कि उनके होने वाले पति मध्यप्रदेश कोर्ट में प्रक्टिस करते हैं, मगर यह झूठ निकला और वह अपनी शादी से खुश नहीं थी. किस्मत के लिए इतना काफी नहीं था कि वह हालात से सम्झौता कर अपनी ज़िंदगी जी रही थी. 2003 में उनके पति राजबहादुर रघुवंशी की सड़क हादसे में मौत हो गई और उसी पर दूसरा आघात ये कि, उनके पति की अंत्येष्टि में शरीक होने के लिए आ रहे उनके भाई की भी सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी.

 

 

योगिता बताती हैं कि “उस वक़्त मुझ पर जैसे मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था, अगर मैं अपनी वकालत की प्रक्टिस करती तो मुझे किसी भी सीनियर वकील के साथ काम करने पर उतने पैसे नहीं मिलते कि मैं अपने दोनों बच्चों की अच्छे से भरण पोषण कर सकती. तो मुझे वैसे काम की तलाश थी जिससे मुझे अपनी आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त पैसा मिले.”

 

 

उन्होनें अच्छी कमाई के लिए ड्राइविंग का क्षेत्र चुना है. वो कहती हैं कि इस जॉब में उन्हें हर दिन 2 से 3 हजार रुपये मिल जाते हैं और उसी पैसों से उन्हें अपने दो बच्चों का पालन-पोषण करना है. इस काम से उनका ड्राइविंग और अलग-अलग राज्यों की यात्रा का शौक भी पूरा हो जाता है. वह कहती हैं कि “मैं ये काम दूसरों को उदाहरण देने के लिए नहीं कर रही बल्कि हालात से समझौता कर के मैं यह काम कर रही हूँ.”

 

दूसरों से सहयोग

अपनी इस काम के बारे में योगिता बताती हैं कि उन्हें भी हाईवे पर ट्रक चलाने वाले ड्राइवरों की तरह कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. ट्रक चलाते वक्त चौकन्ना रहना होता है, ताकि कोई हादसा ना हो. देशभर में ट्रक से सफर करने वाली योगिता को इस काम में दूसरे ड्राइवर्स से काफी मदद मिली है. योगिता का कहना है कि अपने ट्रक चलाने के लंबे सफर में उन्हें कभी कोई डर और खतरा महसूस नहीं हुआ. वहीं बाकी ड्राइवर भी उन्हें प्रोत्साहित करते हैं. योगिता कहती हैं कि ढाबों पर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया जाता है.

 

 

तर्कसंगत का तर्क

वजह चाहे जो भी हो मगर योगिता रघुवंशी जी ने एक बात दुनिया के सामने अपने उदाहरण से पुख्ता कर दी है कि महिलाएं अगर चाहें और उन्हें परस्पर प्रोत्साहन मिले तो फाइटर प्लेन उड़ाने के साथ साथ वह ट्रक ड्राइवर का काम भी क्यों नहीं कर सकती? यह अंतर हमारे समाज की मानसिकता का प्रतिबिम्ब है. सवाल यह भी नहीं होना चहिये कि महिलाएं पुरूषों के बराबर सारे काम कर सकती हैं या नहीं? सवाल यह है कि क्या वो जो कुछ भी काम करती हैं क्या हम उनके कामों की क़द्र करते हैं? क्या हम उस काम के लिए उनके आभारी हैं, उनके काम की प्रशंसा करते हैं या नहीं? अगर महिलाओं को सम्मान मिलेगा और उनके प्रति अगर हमारी सोच बदलेगी तो यह कहने की ज़रूरत नहीं होगी कि महिलाएं अब पुरुषों के बराबर हैं या आगे निकल रहीं है.

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