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कॉरपोरेट इंडिया की जातिगत वरीयतायें : अध्ययन से पता चलता है कि विलय के लाभ के लिये कॉरपोरेट्स जाति पर विचार करते हैं.

तर्कसंगत

April 21, 2019

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जाति व्यवस्था लंबे समय से चुनावी व्यवस्था का ध्रुवीकरण करती रही है और शिक्षा, परिवार, राजनीति और समाज के मामलों में निर्णायक रही है. हालाँकि, हाल में हुये अध्ययनों से पता चलता है कि यह कॉर्पोरेट जगत को प्रभावित करता है और व्यावसायिक फैसलों में भी इसकी एक भूमिका रहती है.

IIM बेंगलुरु और पोमोना कॉलेज कैलिफोर्निया के फैकल्टी ने 2000-2007 में ‘Firms of a Feather Merge Together: Cultural Proximity and Firms Outcome’ नाम से एक अध्ययन किया जिसमें 1200 से अधिक M&A (Mergers and Acquisitions) के नमूने का अध्ययन किया और एक ही जाति के लिये चौंकाने वाले परिणाम सामने आये हैं. अध्ययन से पता चलता है कि समान जाति की पहचान साझा करने वाले व्यवसायों के निदेशक विलय और अधिग्रहण में एक साथ निवेश करते हैं.

 

अध्ययन के परिणाम

  1. लगभग 50% ब्राह्मण प्रभुत्व वाली कंपनियों ने ब्राह्मण लक्ष्य वाली कंपनियों के साथ सौदा किया है.
  2. वैश्य प्रमुख कंपनियों की वैश्यों के साथ मिलने में सबसे ज्यादा 55% हिस्सेदारी है और वही स्वरुप  क्षत्रिय और शूद्र प्रमुख कम्पनियाँ अपना रही हैं.
  3. एक ही जाति के सेवानिवृत्त निदेशक मुआवजे के बाद के सौदे में औसतन $ 400 की बढ़ोतरी का आनंद लेते हैं. विभिन्न जातियों के बनाये गये निदेशक इस लाभों की तुलना में दोगुना लाभ कमाते हैं.
  4. शेयर बाजार जाति-आधारित फर्म संघों को दंडित करते हैं. यहां तक ​​कि अधिग्रहणकर्ता और लक्ष्य फर्मों के बनाये पैसे काफी कम हैं.

 

जाति

“जाति” जोकि एक विशेष वर्ण या जाति व्यवस्था के भीतर का उपनाम है, लोगों के अंतिम नामों और विवाह के गठबंधनों में स्पष्ट होता है. हालांकि यह एक परिवार को शुरू करने में आराम की भावना प्रदान कर सकता है. पर क्या यह व्यावसायिक निर्णयों को भी प्रभावित करता है?

पूरी रिपोर्ट पढ़ने पर, यह स्पष्ट होता है कि ये मिलना या मिलाना एक सचेत विकल्प हैं संयोग नहीं. अग्रवाल ने अग्रवाल प्रमुख फर्मों का अधिग्रहण किया और महेश्वरियों ने मुख्य रूप से माहेश्वरी फर्मों का अधिग्रहण किया है.

 

फायदा क्या है?

भारतीय कंपनियों में, इस तरह के जाति के सौदों में लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शन, समय-से-पूरा होने का और प्रीमियम लेने का सौदा होता है.

सह-लेखक प्रो. मनस्विनी भल्ला और मनीषा गोयल ने फोर्ब्स इंडिया को बताया “हमारे परिणाम बताते हैं कि ये मिले झूले निर्णय लेने वाले प्रोफेशनल्स से, निवेश करने वाले निवेशकों पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिससे आर्थिक रूप से परिणामों में घाटा होता है.”

अध्ययन से पता चलता है कि इस तरह के सौदे केवल पक्षपात को जन्म देते हैं और ऊँची औदे वाले लोगों को पैसों का लाभ प्रदान करते हैं.

 

इसी तरह की और भी अध्ययन

नागा लक्ष्मी दामराजू और अनिल के. मखीजा ने पिछले साल अप्रैल 2018 में एक शोध पत्र प्रकाशित किया था जहां उन्होंने होमोफिली या सामाजिक निकटता की भूमिका का विश्लेषण किया था जिसमें व्यक्ति CEO की दौड़ में लिंग, जाति या संस्कृति को साझा करते हैं.

एक लेख “पेशेवर CEO की नियुक्तियों में, भारत में CEO की जाति / धर्म-आधारित भर्ती में सामाजिक निकटता की भूमिका” में इस तरह के व्यवहार में कॉरपोरेट्स को कम लोकप्रियता मिली है. इसका कारण विश्वास, बेहतर संचार और समन्वय की एक मजबूत भावना थी, क्योंकि CEO ने भी कंपनी बोर्ड के साथ समानतायें साझा की हैं.

शोध में यह भी पता चला कि जाति की प्राथमिकताये एक समान समूह-सोच को उजागर करती हैं जो कंपनियों में समानता, मौलिकता और उत्पादकता को कम करती है.

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