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21 लाख महिलाओं को वोट देने से वंचित कर दिया गया है क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं

तर्कसंगत

Image Credits: Livemint

April 22, 2019

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शायद हमारी वर्तमान चुनाव प्रणाली का सबसे दुखद पहलू यह है कि भारत में लाखों महिलाओं को वोट देने के लिए पंजीकृत नहीं किया गया है, भले ही वह अठारह साल की उम्र से अधिक और योग्य हों. दुनिया भर में मतदाता दमन के रूप में महिला मतदाताओं का निराशाजनक रूप से वंचित रह जाना, हमारे चुनावी तंत्र के लिए एक गहरी चिंताजनक घटना है. प्रकाशित डेटा एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करता है: जनसंख्या का सबसे विश्वसनीय स्रोत 2011 जनगणना बताती है कि 2019 तक भारत में महिलाओं की कुल जनसंख्या (18 वर्ष और उससे अधिक) कुल पुरुषों की जनसंख्या का 97.2 प्रतिशत होगा. नतीजतन, केवल यह उम्मीद की जानी चाहिए कि कुल महिला मतदाताओं और कुल पुरुष मतदाताओं में समान प्रतिशत होना चाहिए या इसके आसपास के आंकड़े होने चाहिए. हालांकि, 2019 के चुनाव आयोग के आंकड़ों में कहा गया है कि महिला मतदाता, पुरुष मतदाताओं का केवल 92.7 प्रतिशत हैं. यह दर्शाता है कि महिला मतदाताओं की 4.5 प्रतिशत की कमी हुई है. ऐसा क्यों है? और क्या यह महत्वपूर्ण है? पिछली जनगणना और चुनाव आयोग के आंकड़ों से अब यह स्पष्ट है, कि महिलाओं का यह प्रतिनिधित्व चुनावों के साथ और दशकों के साथ कम होता जा रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में, महिलाओं को सबसे ज्यादा दुःख तब हुआ, जब 23.4 मिलियन महिलाओं को वोट देने के उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया था.

 

अभी के लिए, हम केवल 2019 के चुनाव की समस्या पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.

 

 

वास्तव में, 4.5 प्रतिशत देखने में एक छोटा प्रतिशत लग सकता है, लेकिन जब इसे महिलाओं की वास्तविक संख्या में परिवर्तित किया जाता है, तो चौंका देने वाला है. 4.5 प्रतिशत वंचित महिलाओं को संख्या में परिवर्तित करने पर यह 21 मिलियन हो जाता है, जिन्हें केवल वोट देने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जाता है, क्योंकि उनका नाम देश भर की मतदाता सूचियों में पंजीकृत नहीं है.

 

 

21 मिलियन वंचित महिलाओं का यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका एक संकेत यह है कि यह निम्न में से किसी एक राज्य में, उस राज्य की महिला को वोट देने की अनुमति नहीं देने के बराबर है, जिसमे: झारखंड, हरियाणा, तेलंगाना, केरल या छत्तीसगढ़ शामिल है या इससे भी बदतर अगर देखे तो 21 मिलियन वंचित महिलाएं, औसतन भारत में हर निर्वाचन क्षेत्र में 38,000 वंचित महिला मतदाताओं के बराबर हैं. बड़ी संख्या में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में – हर पाँच सीटों में से एक से अधिक – जो 38,000 से कम वोटों के अंतर से जीते या हारे हैं.

21 मिलियन वंचित महिला मतदाताओं का अनुमान, जनगणना सूची में प्रतिशत/अनुपात की तुलना, मतदाता सूची में पुरुषों के प्रतिशत/अनुपात पर आधारित है. वैकल्पिक रूप से, अगर हम अनुपात का उपयोग नहीं करते हैं, लेकिन मतदाता सूची में पूर्ण संख्या की तुलना में जनगणना के अनुसार, महिलाओं की पूर्ण संख्या की गणना करते हैं, तो वंचित महिलाओं की संख्या 28 मिलियन से अधिक है. मतदाता सूची से वंचित महिला मतदाताओं की बड़ी संख्या यह भी बताती है कि भारत में कुल मतदाता अधिकारिक(कर्मचारी) 895 मिलियन से अधिक होने चाहिए, जो शायद 915 मिलियन से भी अधिक होना चाहिये. इस भारी विफलता के लिए चुनाव आयोग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. इसके विपरीत, उनके कठिन प्रयासो से वह महिला मतदाताओं का नामांकन करने के लिए साल-दर-साल प्लान बनाते हैं, और जिसमे विशेष रूप से महिलाओं पर आधारित कार्यक्रमों की एक श्रृंखला होती है. यह सामाजिक और राजनीतिक कारकों के संयोजन का परिणाम है और चिंता की बात यह है कि यह समय के साथ बिगड़ रहा है.

 

 

कुछ राज्यों के क्षेत्रों में वंचित महिलाओं की संख्या में प्रमुख अंतर हैं, जिनमें अन्य लोगों की तुलना में वंचित महिलाओं की संख्या अधिक है.

2019 के लोकसभा चुनावों में, शीर्ष तीन राज्यों में महिलाओं की सबसे बड़ी संख्या होगी जो योग्य मतदाता होने के बावजूद पंजीकृत नहीं हैं, जिनमे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान शामिल हैं (तालिका 1.2.15 देखें). यह तीन राज्य 2019 में वंचित 21 मिलियन महिला मतदाताओं में से 10 मिलियन से अधिक के लिए जिम्मेदार होंगे. यह चौंकाने वाला है कि उत्तर प्रदेश में, औसतन 85,000 महिला मतदाता हर एक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान के अधिकार से वंचित होंगे. इसके अलावा, बड़े राज्यों में, जिनका महिलाओं के सबसे कम प्रतिनिधित्व के साथ सबसे अच्छा रिकॉर्ड है, वह दक्षिण भारत के: तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश से हैं. भारत के छोटे राज्यों में भी, जो दूसरे सबसे खराब हिंदी पट्टी से हैं: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश.

 

भारत के चुनाव आयोग से अपील: हमें इससे सबक लेना चाहिये, जो भारत के लिए एक शर्म की बात है और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे सुधारने के लिए तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है. भारत एक असाधारण स्थिति का सामना कर रहा है जो भारत की महिलाओं के लिए बहुत ही अनुचित है – 21 मिलियन महिलाएं जो वोट देने की हकदार हैं उन्हें ऐसा करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं. 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के मतदाता सूची को सुधारने के लिए पर्याप्त समय भी नहीं है. इसे देखते हुए, नियम अब यह होना चाहिए: कि कोई भी महिला जो निर्वाचन क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर आती है, जहां वह रहती है और उसकी अठारह वर्ष से अधिक उम्र है, उसे मतदान करने की अनुमति दी जानी चाहिये.

 

यह लेख प्रणय रॉय और दोरब आर सोपरिवाला की किताब “द वर्डिक्ट: डिकोडिंग इंडियाज इलेक्शन, विंटेज” का एक अंश है. यह किताब बीते चुनाओ के ट्रेंड्स से 2019 के चुनावों की संभावनाओं को प्रस्तुत करने के लिए है.

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