पर्यावरण

आदिवासियों की मांग पुनर्वास ; “मेरे पति को नक्सलियों द्वारा मार दिए जाने के बाद मैं छत्तीसगढ़ चली गयी”

तर्कसंगत

April 23, 2019

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 जब 300 से अधिक आंतरिक रूप से विस्थापित आदिवासीयों ने रेडियम ग्रीन जैकेट्स को पहनकर नेशनल हाईवे 30 के रास्ते, छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर से 22 फरवरी को अपना 300 किलोमीटर का साइकिल मार्च शुरू किया, तब कई लोगों के लिए, यह उनके गांव के बाहर की उनकी पहली यात्रा थी; पहली बार उनमें से कुछ जगदलपुर या राज्य की राजधानी रायपुर जैसे बड़े शहरका दौरा कर रहे थे.

हालाँकि, सबका जोश अधिक था और वह सभी पूरे छत्तीसगढ़ में साइकिल पर यात्रा करने के लिए उत्साहित थे, लेकिन आंतरिक रूप से विस्थापित आदिवासी जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से बड़ी संख्या में आए थे – और छत्तीसगढ़ के आदिवासी के साथ मिलकर  “शांति साइकिल मार्च” में भाग ले रहे थे, इस यात्रा में उनका एक उद्देश्य था. सात दिवसीय यह यात्रा 28 फरवरी को रायपुर में समाप्त हुई.

 

शुरुवात

इस साइकिल मार्च को आयोजित करने का निर्णय पिछले साल अक्टूबर में आयोजित 10-दिवसीय शांति मार्च के अंत में लिया गया था. मार्च 2 अक्टूबर, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के दिन इसकी शुरूआत हुई थी – आंध्र प्रदेश के चट्टी से शुरू होकर 12 अक्टूबर को जगदलपुर में समाप्त हुई. 12-13 अक्टूबर को जगदलपुर में दो दिवसीय सम्मेलन बस्तर संवाद 1′ का आयोजन किया गया.

कॉन्क्लेव में, पांच राज्यों – महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के 200 से अधिक आदिवासी – जिन्होंने 191 किलोमीटर की पैदल यात्रा की, जिसमे विभिन्न पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, सामुदायिक बुजुर्ग और नेताओ ने विभिन्न मुद्दों, जिसमे आदिवासियों के वन अधिकार से लेकर ग्राम सभाओं को मजबूत करने की आवश्यकता, शिक्षा, चिकित्सा सुविधाओं, सड़कों और उचित आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी, आदिवासियों के गलत तरीके से जुड़े मुद्दों और आईडीपी के पुनर्वास के मुद्दे पर चर्चा की. सम्मेलन के अंत में यह निर्णय लिया गया कि जल्द से जल्द इन मुद्दों पर सरकार से अपील करने के लिए एक साइकिल यात्रा निकाली जाएगी.

 

अलगाव

22 वर्षीय, गंगा मादवी छत्तीसगढ़ के एक गाँव में रहती थी. वह उस समय केवल 8 वर्ष की थी जब जुडूम में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ने के कारण एक रात उन्हें उनके परिवार के साथ छत्तीसगढ़ से भागना पड़ा. गंगा के दो चाचा हिंसा में मारे गए थे – यही एकमात्र छत्तीसगढ़ के लिए गंगा की स्मृति रह गयी है. 2005 से वह आंध्र प्रदेश के चिंतूर से 25 किलोमीटर दूर एक गांव थेरापद्दू में रह रहे हैं. यहाँ जीवन बहुत कठिन है. हमारे नाम पर जमीन नहीं है. हम दैनिक वेतन श्रामिक के रूप में काम करते हैं. हमें जो पैसा मिलता है, वह भी पर्याप्त नहीं है. यहाँ हमारे लिए या हमारे जानवरों के लिए पर्याप्त पानी नहीं है. सबसे बुरा यह है, कि मुझे अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ी क्योंकि मेरे पास जाति प्रमाणपत्र नहीं है. हम आंध्र प्रदेश में आदिवासी नहीं माने जाते क्योंकि हम छत्तीसगढ़ से आए थे. यह सभी कारक हमारे जीवन को बेहद कठिन बनाते हैं. अगर छत्तीसगढ़ सरकार हमें नौकरी और रहने के लिए घर मुहैया कराती है, तो हम निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ वापस चले जाएंगे. यही कारण है जिस वजह से मैंने इस साइकिल यात्रा में भाग लिया”.

 

गंगा जैसी बहुत सी ऐसी ही कहानियां हैं.

42 वर्षीय सिरमम्मा मदक्कम अपने पति और तीन बच्चों के साथ छत्तीसगढ़ के सुन्नागुड़ा गाँव में रहती थीं. 2005 में, जब सलवा जुडूम में हिंसा शुरू हुई, तो उसके “माओवादी” पति को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उनके घर को जला दिये जाने के बाद उन्हें एक रात वहा से भागना पड़ा. फिर वह वहा से आंध्र प्रदेश के रिंगोला गांव चले गए. वह अभी बस घर का सारा सामान सही से लगा ही रहे थे, जब एक रात उनके पति की पुलिस के मुखबिर होने के आरोप में उनकी आंखों के सामने निर्मम हत्या कर दी गई. मेरे पास छत्तीसगढ़ में 12 एकड़ जमीन थी. मुझे वह सब छोड़कर जाना पड़ा. मैं बहुत चीजों से गुजर चुकी हूं. मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं. मैं चाहती हूं कि वह इस साइकिल मार्च में भाग लें, ताकि किसी दिन हम छत्तीसगढ़ वापस अपने घर जा सकें. मुझे उम्मीद है कि राज्य सरकार हमारे जैसे लोगों पर भी ध्यान रखेगी”, उसने यह सब कुछ तब बताया जब हम यात्रा शुरू होने से ठीक पहले उसके गांव में उससे मिले थे.

 

जवान और बूढ़े

राजमन सिंह नेतम छत्तीसगढ़ के कोंडागांव के रहने वाले हैं. रोजाना औसतन 45 किमी तक सभी को साइकिल चलाना पड़ता था. अधिकांश दिनों में नेतम ने मार्च का नेतृत्व किया. इसमें असामान्य यह है कि उनकी उम्र 61 साल है. “यह थका देने वाला है, लेकिन मैं बस्तर को शांतिपूर्ण बनाने के लिए ऐसा करना चाहता हूं जिसने इतने सालों से हिंसक संघर्ष देखा है. इसमें समय लगेगा, लेकिन हमें कहीं न कहीं से शुरुआत करनी चाहिए. यह साइकिल मार्च एक ऐसा ही कदम है. यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा करें”.

25 वर्षीय भरत कुमार तुर्रम आंध्र प्रदेश के चट्टी में रहते हैं और आईडीपी के लिए काम करते हैं. यह पहली बार है जब मैं छत्तीसगढ़ में यात्रा कर रहा हूँ. यह एक अच्छा अनुभव रहा है. मैंने आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के बारे में बहुत कुछ सीखा. मुझे उम्मीद है कि इन आईडीपी और आदिवासियों को वह मिल जाएगा जो वह सभी चाहते हैं और उनकी पीड़ा समाप्त हो जायेगी. इस तरह के साइकिल मार्च उनके साथ बातचीत करने का एक शानदार तरीका है”.

20 वर्षीय नंदिनी कुर्रम जो की एक शिक्षक बनना चाहती हैं; कहती हैं, “मैं और अधिक पढ़ना चाहती हूं, लेकिन उसके लिए मुझे जाति प्रमाण पत्र चाहिए. यही एकमात्र कारण है जिस वजह से मैंने इस यात्रा में भाग लिया ताकि सरकार इसके बारे में कुछ करे”. उनका परिवार काम की तलाश में 2005 में छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश चला गया.

 

एक नई शुरुआत?

28 मार्च को रायपुर में साइकिल मार्च का समापन हुआ. नया रायपुर के कुरु बंजारी गाँव में एक सम्मेलन बस्तर संवाद 3′ का आयोजन किया गया, जिसके दौरान समुदाय के बुजुर्ग और नेता, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यत्रियों को संबोधित किया. आदिवासियों और आईडीपी से सम्बंधित कई मुद्दों पर विस्तृत में चर्चा की गई. 1 मार्च को, यत्रियों ने आखिरी बार साइकिल चलाई और रायपुर शहर का दौरा किया. पारंपरिक आदिवासी पोशाक पहने और ढोल की धुन पर नाचते हुए एक नृत्य मंडली ने रायपुर में मार्च का नेतृत्व किया.

उसी शाम राज्य के आबकारी मंत्री कावासी लखमा आदिवासियों और आईडीपी से मिले और कहा: “जो लोग छत्तीसगढ़ वापस आना चाहते हैं, हम उनके पुनर्वास में मदद करेंगे और जो लोग आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रहना चाहते हैं, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उन्हें आदिवासियों के रूप में पहचान मिले और उन्हें इसके लिए एक जाति प्रमाण भी उपलब्ध कराया जायेगा”. यह सुनते ही सात दिनों तक नारे लगाने वाले यात्रियों ने अपनी ख़ुशी से झूम उठे.

इस क्षेत्र में काम कर रहे पूर्व पत्रकार-जनजातीय अधिकार कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं: यहाँ एक उम्मीद है. इन आदिवासियों और आईडीपी ने मांगों के साथ 300 किमी तक साइकिल चलाई. मुझे उम्मीद है कि नवगठित सरकार इस पर ध्यान देगी. यह सिर्फ कुछ विश्वास जीतने के तरीके हैं; सरकार को जल्द से जल्द कुछ मुद्दों को उठाना होगा – उदाहरण के लिए, जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई में तेजी लाई जानी चाहिए.

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