पर्यावरण

प्लास्टिक के बोतल से झाड़ू बनाकर आमदनी भी बढ़ाई और पर्यावरण को भी बचाया

तर्कसंगत

Image Credits: E-pao

April 23, 2019

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मणिपुर सरकार ने साल 2019 में राज्य में प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी लगाने की घोषणा की थी. प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए यह फैसला लिया गया था. लेकिन प्लास्टिक बैन के साथ एक दिक्कत ये भी है कि पुराने प्लास्टिक को रिसाइकिल करना बेहद जरूरी हो जाता है. मणिपुर की राजधानी इंफाल से सटे इलाके चिंगखू अवांग के रहने वाले 58 वर्षीय उषम कृष्णा सिंह को इससे एक ऐसा रास्ता खोजने के लिए प्रेरित किया जिसमें वह प्लास्टिक की बोतलों के डिस्पोजल का पुन: उपयोग कर सके और प्लास्टिक प्रदूषण का मुकाबला कर सके.

प्लास्टिक की वस्तुओं के पुन: उपयोग के तरीकों पर शोध करने पर, श्री सिंह अपने सबसे बड़े बेटे, 30 वर्षीय उषम अशोक सिंह की मदद से, डिस्पोजेबल प्लास्टिक की पानी की बोतलों से निर्मित झाड़ू बनाने का विचार आया. ये प्लास्टिक के झाड़ू अच्छा काम करते हैं और बाजार में मिलने वाले बांस से बने पारंपरिक झाड़ू के समान हैं.

 

स्रोत : एएनआई

 

एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया, ‘मणिपुर में लोकतक झील यहां की जीवनदायिनी झील मानी जाती है. जिसमें अब सारा कचरा फेंका जाता है. इस कचरे से जलीय जीवों और वनस्पति को काफी नुकसान पहुंचता है. जिसका सीधा असर झील के पारिस्थिकी तंत्र पर पड़ता है.’

झील को बचाने के लिए ही ऊषम के दिमाग में प्लास्टिक की बोतलों से झाड़ू बनाने का आइडिया आया. उन्होनें अब तक 500 से अधिक प्लास्टिक के झाड़ुओं का निर्माण किया है.

 

तकनिकी जानकारी ने काम आसान किया

श्री सिंह मणिपुर सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग के तहत जल आपूर्ति विभाग में एक पंप ऑपरेटर के रूप में काम करते हैं. उनका बेटा अशोक एक इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयरिंग सेंटर चलाता है. मशीनों के बारे में तकनीकी ज्ञान का उपयोग करते हुए, उन्होंने तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद प्लास्टिक की पानी की बोतलों को झाड़ू में रिसाइकल करने के लिए सफलतापूर्वक एक उपकरण बनाया.

 

स्रोत : ईस्ट्मोजो

 

झाड़ू बनाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताते हुए, श्री सिंह ने कहा कि वह घोड़े की छुरी का उपयोग करता है जिसकी मदद से प्लास्टिक की बोतलों को बहुत पतले टुकड़ों में पिरोया जाता है, लगभग धागे के रूप में. तब प्लास्टिक थ्रेड को मोबाइल फोन की मरम्मत में अशोक द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हॉट एयर-गन लगाकर कठोर बना दिया जाता है. वह प्लास्टिक के धागों को पकड़ने के लिए बांस के डंडे का इस्तेमाल करते हैं. एक झाड़ू के निर्माण के लिए, एक लीटर क्षमता की 30 बोतलों की आवश्यकता होती है. एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआत में वे एक दिन में सिर्फ दो झाड़ू ही बना पाते थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मोटर की मदद से वे अब हर रोज 20 से 30 झाड़ू तैयार कर लेते हैं.

 

प्लास्टिक की बोतलों को रीसायकल कर ग्रामीणों के लिए आमदनी उत्पन्न कर रहे हैं

प्लास्टिक को रिसाइकिल करके पर्यावरण की रक्षा करने वाले उषम इस काम के साथ-साथ गांव वालों को रोजगार भी मुहैया करा रहे हैं. उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की स्थापना की है जिसका नाम ‘उषम बिहारी ऐंड मैपक प्लास्टिक रिसाइकिल इंडस्ट्री’ रखा है और इसे जल्द ही एक छोटे स्तर के उद्यम के रूप में पंजीकृत करने की योजना है. एसएचजी वर्तमान में 10 ग्रामीणों, दोनों पुरुषों और महिलाओं की आय में मदद कर रहा है. श्री सिंह ने कहा, ‘हालांकि रोजगार की स्थापना करना या पैसे कमाना मेरा मकसद नहीं था. मैं प्लास्टिक की बर्बादी रोकना चाहता था, लेकिन अब जब इससे गांव वालों को आय भी हो रही है तो इसलिए मुझे काफी खुशी हो रही है.’ अब वे इन प्लास्टिक की मदद से कप और अन्य सामान बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

 

स्रोत : ईस्ट्मोजो

 

उन्होंने आगे कहा कि उनके झाड़ू की मांग न केवल उनके अपने गाँव बल्कि आस-पास के कुछ गाँवों में भी बढ़ रही है. उन्होंने शहर के बाजारों में झाड़ू बेचना भी शुरू कर दिया है. श्री सिंह और उनकी टीम इस समय दो प्रकार के झाड़ू बना रही है- एक तो बेकार प्लास्टिक की पानी की बोतलों का उपयोग करके, जो कि 150 रुपये की कीमत पर बिक रही है और दूसरा शीतल पेय की प्लास्टिक की बोतलों के साथ 200 रूपये है.

पर्यावरण की एक ज्वलंत समस्या से निवारण पाने के लिए इनके इस अनूठे तरीके की तर्कसंगत तारीफ करता है और उम्मीद करता है कि यह आगे भी इस तरह के नए आविष्कारों के साथ इन मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करते रहेंगे.

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