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24 बार चुनाव हार चुके हैं मगर जनतंत्र पर विश्वास ऐसा कि 73 वर्ष में भी चुनाव लड़ा है

तर्कसंगत

Image Credits: BBCI

April 24, 2019

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भारत में निर्दलीय उम्मीदवार बमुश्किल ही जीत पाते हैं क्योंकि उनके पास राजनीतिक पार्टियों की तुलना में पैसे और संसाधन बहुत कम होते हैं. भारत में तक़रीबन 2,293 पंजीकृत क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां हैं. जिनमें सात राष्ट्रीय और 59 क्षेत्रीय पार्टियां हैं.

ऐसे ही एक निर्दलीय उम्मीदवार विजयप्रकाश कोंडेकर, अब पश्चिमी शहर पुणे में शिवाजी नगर में एक परिचित चेहरा हैं. पिछले दो महीनों से 73 वर्षीय अपने चुनाव प्रचार के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. श्री कोंडेकर एक संसदीय सीट से चुनाव लड़ रहे हैं जहाँ 23 अप्रैल को तीसरे चरण के मतदान हुए. भारत का विशाल आम चुनाव 11 अप्रैल को शुरू हुआ और सात चरणों में हो रहा है जिसमें 23 मई को रिजल्ट आने वाले हैं. श्री कोंडेकर ने भारतीय राजनीतिक प्रणाली के हर स्तर पर 24 से अधिक विभिन्न चुनाव लड़े हैं और हारे हैं. वह इस साल के राष्ट्रीय चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने वाले सैकड़ों निर्दलीय उम्मीदवारों में से एक हैं. 2014 में, चुनाव लड़ने वाले 3,000 निर्दलीय उम्मीदवारों में से सिर्फ तीन जीते.

बीबीसी से बात करते हुए विजयप्रकाश कोंडेकर कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि वो एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं और ऐसा होने पर वो भारत के हर नागरिक को 17,000 रुपये देंगे. उनका मानना है कि अगर सरकार बाकी के कुछ खर्चों में कटौती कर देता तो ये वादा पूरा करना काफ़ी आसान होगा.

 

 

1980 के दशक के उत्तरार्ध तक, वह महाराष्ट्र में राज्य बिजली बोर्ड के लिए काम करते थे. अब, उन्हें अक्सर पुणे के चारों ओर घूमते देखा जा सकता है, एक स्टील की गाड़ी को पहियों पर धकेलते हुए, जिसमें साइनबोर्ड लगा होता है. पहले स्थानीय लोग कहते हैं, बोर्ड ने दान के लिए रिक्वेस्ट की हुई थी लेकिन बहुत कम पैसे दान में ये मांगते थे 1 डॉलर से भी कम.

बीबीसी को उन्होनें बताया कि उनकी आय का एकमात्र स्रोत उनके नामांकन दाखिल करते समय किए गए खुलासे के अनुसार 1,921 रुपये (28 डॉलर; £ 21) की मासिक पेंशन है. लेकिन यह स्वीकार करते हुए कि उनकी लड़ाई ज्यादातर प्रतीकात्मक है श्री कोंडेकर ने आशा छोड़ दी है.
आगे कोंडेकर ने कहा कि राजनीतिक दलों की लोहे की तलवार और मेरे पेपर कट-आउट के बीच एक प्रतियोगिता है. लेकिन मैं कोशिश करता रहना चाहता हूं. मेरी उम्र को देखते हुए, यह संभवतः मेरा आखिरी चुनाव होगा. लेकिन इस बार शायद चीजें अलग हो सकती हैं.

चुनाव नियमों के अनुसार ईवीएम में राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवारों को पहले लिस्ट किया जाता है, उसके बाद राज्य दलों के उम्मीदवार. सबसे नीचे निर्दलीय उम्मीदवार हैं.

वे कहते हैं, “मेरी अपील जनता के लिए है कि अंतिम उम्मीदवार के लिए वोट करें जिनका नाम नोटा से पहले लिखा होता है, उन्होंने अपना उपनाम बदलकर ज़ेनोशो कर दिया, ताकि उनका नाम उम्मीदवार सूची में अंतिम रूप से दिखाई दे.

कई लोगों को ये नज़ारा देखकर हंसी आती है. कुछ लोग उन्हें नज़रअंदाज़ करते हैं तो कुछ उनके साथ सेल्फ़ी लेना चाहते हैं. प्रकाश सेल्फ़ी के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है इससे सोशल मीडिया पर मुफ़्त में पब्लिसिटी मिल जाएगी. कुछ लोग प्रकाश का हुलिया देखकर उनका मज़ाक भी बनाते हैं: एक कमज़ोर और बुजुर्ग आदमी, जिसके सफ़ेद बाल बिखरे हुए हैं और दाढ़ी बढ़ी हुई है. प्रकाश अप्रैल की चिलचिलाती धूप में सिर्फ़ सूती शॉर्ट्स पहने अपने चुनावी अभियान में जुटे हुए हैं.

 

भारतीय चुनाव व्यवस्था

यद्यपि भारतीय चुनाव व्यवस्था में स्वतंत्र उम्मीदवारों के कई मिसालें अपने आप में हैं. 1957 के चुनाव में 42 सांसद निर्दलीय थे जो अपने आप में दुर्लभ है. 1952 में पहले चुनाव के बाद से कुल 44,962 निर्दलीय उम्मीदवार संसद की रेस में भाग चुके हैं, लेकिन केवल 222 जीते पाए हैं.

निर्दलीय शायद ही कभी जीतते हैं क्योंकि पार्टियों के पास अधिक पैसा और बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं. और सात राष्ट्रीय और 59 क्षेत्रीय दलों सहित 2,293 पंजीकृत राजनीतिक दलों के साथ, पार्टियों की कोई कमी नहीं है.

इस बारे में चुनावों पर नज़र रखने वाली संस्था असोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीप चोकर कहते हैं कि राजनीतिक दलों की भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर पकड़ बहुत मज़बूत है.

चोकर कहते हैं, “निर्दलीय उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के रास्ते में कई मुश्किलें, विरोधाभास और दुविधाएं हैं. मसलन, एक उम्मीदवार अपने चुनाव प्रचार के लिए कितने पैसे खर्च कर सकता है, इसकी एक सीमा है लेकिन उन्हें समर्थन दे रही है राजनीतिक पार्टियों के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है. राजनीतिक पार्टियों की तरह निर्दलीय उम्मीदवारों को आयकर में छूट भी नहीं मिलती.”

 

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