पर्यावरण

यूपी: प्रदूषण और निर्माण की वजह से झीले, तालाब ख़त्म हो रहे है और 25- वर्षीय इंजीनियर उन्हें बचने का प्रयास कर रहे हैं

तर्कसंगत

April 25, 2019

SHARES

जल संसाधन का मुद्दा देश भर में एक प्रमुख मुद्दा बन गया है. नीती आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने इतिहास के सबसे खराब जल संकट से पीड़ित है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली और बैंगलोर 2020 तक भूजल से पूरी तरह से वंचित हो जायेंगे.

इन सभी रिपोर्टों और आंकड़ों से पता चलता है कि इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बहुत कुछ नहीं किया जा रहा है. हालाँकि, एक व्यक्ति ने इस बारे में अपनी तरफ से कुछ करने के लिए कार्यरत है.

ग्रेटर नोएडा के दधा गांव के रामवीर तंवर को झीलों की दुर्दशा ने हिला दिया. उन्होंने झीलों की सफाई और कायाकल्प प्रक्रिया शुरू की. श्री तंवर, जो एक एमएनसी में इंजीनियर के रूप में काम करते हैं, 2014 से झीलों और तालाबों को पुनर्जीवित कर रहे हैं.

 

विलुप्त झीलों को पुनर्जीवित करना

रामवीर ने तर्कसंगत को बताया, उत्तर प्रदेश में गौतम बुद्ध नगर जिले में दो शहर हैं – नोएडा और ग्रेटर नोएडा. नोएडा में 200 से अधिक झीलें थीं और अभी शहर में आधिकारिक तौर पर एक भी झील नहीं हैं. ग्रेटर नोएडा में स्थिति थोड़ी बेहतर है क्योंकि यहां की झीलें अभी पूरी तरह से विलुप्त नहीं हुई हैं, लेकिन वह बेहद खराब स्थिति में हैं.”

 

 

शहर में जल निकायों की यह खेदजनक स्थिति, जो एक समय में एक जनता के आकर्षण का और पानी के स्रोत के रूप में जानी जाती थी, अब वह एक डंपिंग ग्राउंड(कूड़ा कचरा फेकनी की जगह) में बदल चुकी है, इसके बारे में कुछ करने के लिए रामवीर ने आगे बढ़कर कुछ करने का सोचा.

पिछले साल डबरा गाँव में, हमने एक झील को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, ताकि उसका सारा कचरा निकल जाए. कई ग्रामीण भी मदद के लिए आगे आए. उनमें से कुछ ने हमारे साथ काम किया, कुछ ने हमें औजार और साधन भी दिए. हमने वन विभाग से भी संपर्क किया, जिन्होंने हमें झील के चारों ओर पौधे लगाने के लिए दिये. अभी, हमने जो पेड़ लगाए थे वह सभी फल-फूल रहे हैं”.

 

 

रामवीर ने यह भी देखा कि चूंकि बहुत सारी प्लास्टिक को सीधे इन झीलों में फेका जाता था, इसलिए भूमिगत जल की फिर से पूर्ती/ उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में बाधा आ रही थी. हमने तो एक सरल दोहरी फ़िल्टर करने वाली प्रणाली तैयार की. इसलिए झीलों में प्रवेश करने वाला पानी सबसे पहले लकड़ी के तख्तों और फिर घास के जाल से गुजरता हुआ आगे जाता था.

 

 

लकड़ी के तख्तों की जाली प्लास्टिक की बोतलों जैसी बड़ी वस्तुओं को रोकने में मदद करती है और उसके बाद जाली में आने वाले पानी छन कर निकल जाता है. इस साल ही, रामवीर तीन-चार और झीलों को पुनर्जीवित करने में सफल रहे हैं.

 

 

 

हम समझते हैं कि यह एक बार का काम नहीं है. इसलिए, हमने वहां मछुआरों से कहा है कि हम उनके लिए झीलों को साफ करेंगे, लेकिन इसे साफ़ बनाए रखने की जिम्मेदारी उनकी होगी.

 

जल चौपाल

रामवीर जो पर्यावरणविद् विक्रांत तोंगड़ को अपनी प्रेरणा मानते हैं, वह बी.टेक करने के बाद से ही पर्यावरण के प्रति जागरूक/उत्सुक हो गये थे. जब मैं छोटा था, मैं और मेरे दोस्त तालाबों और झीलों में खेलते थे. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, यह सभी जल निकाय गायब होती गयी. जो बच गए हैं, वह बेहद खराब स्थिति में हैं. भूजल की गुणवत्ता और स्तर भी काफी नीचे चले गया हैं.

जब वह कॉलेज में थे तब रामवीर ने ग्रामीणों की एक सभा जल चौपालशुरू की, जहाँ वह जल संरक्षण के महत्व के बारे में बताते थे. जागरूकता की कमी के कारण, गाँव के लोग लगातार पानी बर्बाद करते हैं. वह पानी की बर्बादी अज्ञानता की वजह कर रहे हैं. इसके लिए उन्हें दण्डित करना कोई समाधान नहीं है.

 

 

रामवीर उन्हें वास्तविक समय के उदाहरण देते हैं और उनसे वादा करते हैं. रामवीर कहते हैं, “वह खुद सामने आते हैं और बताते हैं कि पाँच से दस फीट की खुदाई से उन्हें पानी कैसे मिलेगा. अब वह 150 फीट तक खुदाई करने को मजबूर हैं.”

सिर्फ एक गाँव से जो शुरू हुआ था, वह अब लगभग 50 गाँवों को कवर करता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने हर जिले में भुजल सेना नामक समूह बना दिए हैं. मुझे अपने जिले के समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया है.

ऐसे समय में जब हम देश में एक बड़े जल संकट को देख रहे हैं, इस तरह की पहल यह साबित करती है कि हमारे पास अभी भी सुधार करने उम्मीद बची है.

तर्कसंगत रामवीर तंवर के काम की सराहना करता है और उम्मीद करता है कि इस पहल में और लोग भी शामिल हों.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...