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क्या इलेक्टोरल बांड से राजनीतिकी पार्टियों को दिए जाने वाले चंदे पारदर्शी हुए हैं?

तर्कसंगत

Image Credits: Bharat Samman

April 29, 2019

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पिछले माह सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोल बॉन्ड को लेकर लगाई गई कई जनहित याचिकाओं की सुनवाई को आगे के लिए टाल दिया.

द हिंदू के अनुसार, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में  शपथ पत्र दाखिल करते हुए कहा कि इलेक्ट्रोल बॉन्ड  से राजनीतिक पार्टियों को होने वाली फंडिंग अपारदर्शी हो गई है और इसके गुमनाम चरित्र के कारण, राजनीतिक पार्टियों  की फंडिंग में पारदर्शिता न ला पाने के दूरगामी परिणाम होंगे.

डेक्कन हेराल्ड में छपी रिपोर्ट के अनुसार इसके बचाव में अरुण जेटली कहते हैं “आश्चर्य है कि इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के ऊपर हमला हो रहा है ना कि इलेक्ट्रोल ट्रस्ट के ऊपर, जो भूतपूर्व NDA सरकार द्वारा लाई गई और UPA ने उसे आगे बढ़ाया. दोनों का चरित्र और बेसिक सिद्धांत एक ही है.” वे इसे राजनीतिक चंदे में काले धन पर नज़र रखने और रोकने के लिए ज़रूरी बताते हैं.

इलेक्ट्रोल बॉन्ड स्कीम

विगत वर्ष वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा इस स्कीम को लॉन्च किया गया और इसे राजनीतिक फंडिंग को साफ़ करने की दिशा में महतवपूर्ण कदम बताया. निर्धारित बैंक या उनकी शाखाओं से अपनी KYC प्रक्रिया पूरी कर, कोई भी नागरिक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान कर इन बॉन्ड्स को ख़रीद सकता है. ये बॉन्ड्स हर माह के निर्धारित 10 दिवसों में, 1,000/- रुपए, 10,000/- रुपए, 1,00,000/- रुपए,  10,00,00/- रुपए और 1,00,00,000/- रुपए के टोकन में खरीदे जा सकते हैं.

राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को बताए गए अपने अपने निर्धारित बैंक अकाउंट्स में इन बॉन्ड्स को भुना सकती हैं.

पूर्व स्कीम

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के खण्ड 29सी, राजनीतिक पार्टियों को चुनावी चंदे को परिभाषित कर उसके हेतु दिशनिर्देशों को चिन्हित करता है. 2017 के पूर्व, अधिनियम राजनीतिक पार्टियों को 20,000/- रुपए के ऊपर मिलने वाले हर चुनावी चंदे को सार्वजनिक करने को बाध्य करता है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्य समस्या मिलने वाले बड़े चुनावी चंदे का फ़िर भी गुमनाम रहना था.

विवाद

अपितु सरकार ने यह कहा कि ये इलेक्ट्रॉनिक होने के कारण पारदर्शिता को बढ़ाता है, लेकिन चुनाव आयोग इस पर आपत्ति जताते हुए कहता है कि ये गुमनामी को नए आयाम प्रदान करने में सहायक है. जैसे कि अब राजनीतिक पार्टियों को इन इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स का स्त्रोत बताना आवश्यक नहीं. और अगर धन इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के माध्यम से ही एकत्र किया गया है तो उसे धन का स्त्रोत बताने की भी आवश्कता नहीं होगी. राजनीतिक पार्टियों को छूट देने का यह प्रावधान, लोक प्रतनिधित्व अधिनियम में बदलाव कर, वित्तीय अधिनियम 2017 द्वारा कर लिया गया.

चुनाव आयोग इस अधिनियम और इनकम टैक्स अधिनियम के अन्य बदले गए प्रावधानों पर भी गंभीर आपत्ति जताता है जैसे कि 20,000/- रुपयों से कम चुनावी चंदा देने वाले लोगों का नाम, पता और पैन नंबर बताना राजनीतिक पार्टियों के लिए अनिवार्य नहीं होगा. आयोग बताता है कि कई राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले कुल चंदे का मुख्य भाग ये छोटे छोटे बेनामी चंदे ही होते हैं, जो अब और ज्यादा प्रभावी रूप से गुमनाम रखे जा सकते हैं. लोक सभा द्वारा बिना किसी बहस के Foreign Contribution (Regulation) Act (F.C.R.A) विधेयक में संशोधन पारित किया है. यह एक्ट के तहत अब राजनितिक पार्टियों को साल 1976 से अब तक मिले विदेशी चंदे की जांच नहीं हो सकेगी. विगत सरकार द्वारा वित्त विधेयक (2016) में सुधार किया गया और राजनीतिक पार्टियों को विदेेशी धन जमा करने में भी छूट दे दी गई है.

इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स का उपयोग 

द हिंदू में छपी रिपोर्ट के अनुसार, सूचना के अधिकार नियम द्वारा हासिल की गई जानकारी के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक ने 2019 के मात्र दो महीनों में 1,719 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स जारी कर दिए हैं जिसका मुख्य भाग, लगभग 495.6 करोड़ रुपए (28.9%) के इलेक्ट्रोल बॉन्ड अकेले मुंबई से ही जारी हुए.

विश्लेषक इस व्यवस्था पर आवाज़ उठाते हुए कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि मिलने वाले गुमनाम चंदे का मुख्य भाग भारतीय जनता पार्टी को ही जा रहा है. आरटीआई के माध्यम से ली गई एक अन्य जानकारी के अनुसार, 2017-18 वित्तीय वर्ष में भारतीय स्टेट बैंक, जो उस वक़्त अकेले इलेक्ट्रोल बॉन्ड जारी करने के लिए निर्धारित किया गया था, ने लगभग 222 करोड़ रुपयों के इलेक्ट्रोल बॉन्ड जारी किए. भारतीय जनता पार्टी की 2017-18 की ऑडिट रिपोर्ट लगभग 210 करोड़ रुपयों का चुनावी चंदा इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के माध्यम से बताता है, जो भाजपा को उस वर्ष मिलने वाले चंदे का 94.6% था.

तर्कसंगत कथन

हालांकि अब कोई भी राजनीतिक पार्टी 2,000/- रुपए से अधिक मिलने वाले चंदे को नकद नहीं ले सकती, जो कि पहले 20,000/- रुपए था. लेकिन इन इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के माध्यम से ही इतने गोपनीयता के आवरण चढ़ा दिए गए हैं कि ये अपने घोषित उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेगा. कौन कब इन कैश कूपनों को खरीदेगा और किस राजनीतिक पार्टी को बेनामी ढंग से देगा, ये काले धन को सिर्फ़ छिपाने का या सत्तारूढ़ पार्टी को रिश्वत देने का एक अन्य जरिया साबित हो सकता है.

दुनियां के तमाम विकसित देश, राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए नित नए प्रयास कर रहे हैं तो वहीं ये कितना भयानक है कि दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां अपने कामकाज और अर्थतंत्र को अपारदर्शी बनाए रखने के कानून बिना किसी बहस के आसानी से संसद में पारित करा लेते हैं.

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