पर्यावरण

नमामि गंगे : सरिसवा नदी जैसी सहायक नदियों के जीर्णोद्धार के बगैर नमामि गंगे परियोजना सफल नहीं हो सकती

तर्कसंगत

April 30, 2019

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हमारे अस्तित्व के लिए पानी की महत्ता किसी से भी अनजान नहीं है. भारत जहाँ नदियों का हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है, वहां उसकी देख रेख और सफाई हमारी ज़रूरत से ज़्यादा हमारा कर्त्तव्य है. इसी चीज़ की महत्ता को समझते हुए केंद्र सरकार  ने ‘नमामि गंगे’ परियोजना की शुरुआत की है. जिसकी सफलता खुद सवालों के कटघरे में है. अभी के लिए उस ओर ध्यान न देते हुए हम अपना ध्यान इस बात पर डालें कि गंगा का यह भव्य रूप उसके कई सहायक नदियों के कारण भी है, तो गंगा के जीर्णोद्धार के साथ हमें उन सहायक नदियों पर भी उतना ध्यान और विज्ञापन करना होगा जिससे कि उनकी स्थिति सुधर सके. गंगा की कई सहायक नदियों में दूसरी नदियों का पानी आ कर मिलता है. वो जगह जहाँ गंगा नहीं पहुंच सकती यह छोटी नदियां ही उनके तट पर बसे शहरों की लाइफलाइन है.

हम बात कर रहे हैं ऐसी ही एक नदी जो नेपाल से बहती हुई बिहार के रक्सौल शहर से भारत में प्रवेश करती है और बूढी गंडक में जा कर मिलती है जो अंततोगत्वा गंगा में जा कर मिलती है.

 सरिस्वा (सिरसिया), बूढ़ी गंडक की एक सहायक नदी, नेपाल में घने रामबन जंगलों के पत्थलहिया पहाड़ी से निकलती है, इसका कोर्स नेपाल में बारा और पसरा जिलों और बिहार, रक्सौल और बिहार के रक्सौल से होकर गुज़रती है यह नेपाल में लगभग 15 किमी तक अपनी उत्पत्ति के स्थान से दक्षिण की ओर बहती है और फिर रक्सौल में भारत में प्रवेश करती है. यहाँ से, नदी भारत में लगभग 20 किमी बहती है और पूर्वी चंपारण जिले के सुगौली के पास बूढी गंडक में मिलती है.

लेकिन इन सबसे पहले बीरगंज (नेपाल) में स्थित 48 कारखानों द्वारा अनियंत्रित अनुपचारित कचरे  को इसमें डंप किया जा रहा है, जो इस नदी को दूषित करता है, पानी का रंग नहीं होता मगर इस नदी का रंग काला हो गया है, इसके अलावा, दुर्गंधयुक्त पानी  ने लोगों का जीवन नर्क बना दिया है.

 

  

गंभीर स्थिति 

 इस गंभीर मुद्दे पर पटना में यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) के एनवायरनमेंट ऑफिसर कुमार दीपक ने बताया कि नेपाल से निकलकर भारत में प्रवेश करनेवाली सरिसवा नदी के प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभाव और इस समस्या के समाधान की दिशा में संबंधित मंत्रालय एवं विभागों द्वारा अभी तक कोई ठोस कदम नहीं लिया गया.

 

 

इस विषय पर रक्सौल के डा. स्वयंभू शलभ जो कि इस अभियान को गति प्रदान करने के लिए प्रयासरत हैं. उन्होनें बताया कि यह गंभीर मामला पत्रों, फाइलों और विभागीय प्रक्रिया के जाल में फंसकर रह गया है.

जमीनी स्तर पर अभी तक कोई नतीजा सामने नहीं आया है. नदी मृतप्राय होकर नाले में तब्दील होती जा रही है. उन्होंने कहा कि सरकार की ‘नमामि गंगे’ योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक इस स्रोत को शुद्ध न किया जाए.

 

 

वर्ष 2011 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों द्वारा नदी के पानी के सैंपल को जांच के लिए कोलकाता लैब में भेजा गया था उस रिपोर्ट को सरकार के द्वारा सार्वजनिक किया जाना आवश्यक है. विदेश मंत्रालय को सौंपी गई उस जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई अभी तक लंबित है.

सिर्फ कागज़ी करवाई

तर्कसंगत से बात करते हुए डॉ. शलभ ने बताया कि 14 नवंबर 2017 को संयुक्त सचिव, केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली एवं मुख्य सचिव, बिहार सरकार को आवश्यक निर्देश जारी किया गया था. साथ ही माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने भी इस मामले में पर्यावरण एवं वन विभाग, बिहार को पत्र दिया था. जिसमें बताया गया था कि सरिसवा नदी का बढ़ता प्रदूषण बंगरी, सिकरहना आदि नदियों के रास्ते गंगा तक पहुंच कर केंद्र की ‘नमामि गंगे’ योजना को प्रभावित कर रहा है.

 

 

साथ ही इस याचिका में मामले से जुड़े तथ्यों को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय समेत विदेश मंत्रालय की सहभागिता के बावजूद अभी तक इस मामले में कोई परिणाम सामने नहीं आया.

 

 

नेपाल से निकलनेवाली इस नदी के प्रदूषण के मामले में प्रधान मंत्री कार्यालय में दर्ज परिवाद के आलोक में गत 7 जून 2017 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार) के निदेशक जे.एस.कम्योत्रा ने क्षेत्रीय निदेशालय, कोलकाता को इस मामले में समुचित कार्रवाई करने और अपनी कार्रवाई से 15 दिन के अंदर आवेदक के साथ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अवगत कराये जाने का निर्देश दिया था लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी किसी कार्रवाई की सूचना नहीं मिली जब कि इस मामले में पीएमओ द्वारा बताया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा इस मामले का निष्पादन कर दिया गया है. साथ ही यह भी कहा गया कि इस विषय को राष्ट्रीय कार्ययोजना में रखा गया है.
इस समस्या से जुड़े तथ्यों के साथ नदी की स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि विगत 1.4.2011 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के पत्रांक  A-1411/1/2011/221 के निर्देशानुसार वरिष्ठ पर्यावरण इंजीनियर श्री संदीप के नेतृत्व में जांच टीम ने डा. शलभ की मौजूदगी में गत 19 मई 2011 को रक्सौल/वीरगंज के सीमावर्ती क्षेत्र से नदी के पानी का संकलन कर जांच के लिये कोलकाता के लैब में भेजा.

 

 

 

जांच रिपोर्ट के साथ बोर्ड ने इस मामले को मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स के जरिये नेपाल सरकार से वार्ता किये जाने की सिफारिश की. मामले को इंडो नेपाल ज्वाइंट टेक्निकल स्टैंडिंग कमिटि में रखा गया. गत 16 दिसम्बर 2011 को वीरगंज (नेपाल) में भारत के तत्कालीन महावाणिज्यदूत श्री आशुतोष अग्रवाल एवं कन्सुल श्री पी.डी.देशपांडे के साथ डा. शलभ की मीटिंग में भी इस संवेदनशील मामले के शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया गया था.
नेपाल सरकार ने उद्योगों द्वारा एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट लगाने एवं नदी में जहरीले उत्सर्जन को रोकने के लिए एक निगरानी समिति का गठन कर बारा और पर्सा जिले के 48 चिह्नित उद्योगों को नोटिस जारी किया परंतु इस कार्रवाई का कोई असर नहीं दिखा. सितंबर 2010 से जारी इस प्रक्रिया में अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया बल्कि नदी की हालत बद से बदतर होती गई है.
उद्योगों द्वारा अपने जहरीले अवशिष्टों को नदी में डालना बंद नहीं किया गया.  बिना ट्रीटमेंट प्लांट के उद्योग बेरोकटोक चलते रहे. इस बीच वीरगंज महानगरपालिका द्वारा नदी किनारे डम्प किये गए हजारों ट्रक कूड़े कचरे के ढेर ने भी प्रदूषण के संकट को कई गुना बढ़ाया है.

 

उपाय

डॉ. शलभ ने कहा कि पीएचइडी के स्तर से मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा भी इस मामले में पहल की जानी चाहिए. उन्होंने भारत नेपाल सीमा पर भारत सरकार द्वारा एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) के साथ साथ सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाये जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.

उन्होंने कहा कि रक्सौल म्युनिसिपलिटी अपना डंपिंग साइट बनाए. नदी किनारे कूड़े कचरे का भंडारण करना या कूड़े कचरे को जलाना एक असंवेदनशील कृत्य है. यह पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक कानून के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आता है. उन्होंने 1992 में बने कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (सीबीडी) का भी जिक्र किया. नेपाल से निकलनेवाली इस नदी के प्रदूषण के संबंध में यूएनडीपी की काठमांडू शाखा को अवगत कराया गया है. उन्होंने नदी की वर्तमान स्थिति की जांच के लिए रक्सौल आने वाली केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम द्वारा देरी किये जाने को लेकर भी नाराजगी जाहिर की.

 

तर्कसंगत का तर्क

‘नमामि गंगे’ जैसी योजनाओं का महत्व और असर तब तक नहीं दिखेगा जब तक कि उसकी सहयक नदियों पर हम ध्यान न दें, ‘नमामि गंगे’ केवल गंगा का राजनीतिकरण है उससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं। ज़रूरत है कि हम देश की हर नदी पर उस तरह ध्यान या आदर दें जैसे हम गंगो को देते हैं. गंगा तभी गंगा है जब उसकी सहायक नदियां जीवित हैं.  रक्सौल की सरिसवा (सिरसिया) नदी अपने खत्म होने कगार पर है, जिसका असर बूढी गंडक पर भी दिखेगा और यह सबसे ज़्यादा प्रभावित करेगा इस शहर को जहाँ लोग इस नदी पर निर्भर हैं. तर्कसंगत केंद्र सरकार और नमामि गंगे से जुड़े लोगों से यह अपील करता है कि सरिसवा नदी को साफ़ सुथरा और बचाने के लिए केंद्र पड़ोसी देश नेपाल की हर संभव मदद करें और उन्हें इस मामले पर ठोस कदम लेने को मजबूर करें.  

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