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नोटबंदी का चुनावी काले धन पर असर क्यों नहीं पड़ा?

तर्कसंगत

Image Credits: Indian Politics

May 2, 2019

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8 नवंबर 2016 की रात शायद ही कोई भारतीय भूला हो, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने औचक नोटबंदी की घोषणा कर पूरे भारत में सनसनी फ़ैला दी थी. काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक और एक सुनहरे भविष्य की उम्मीद में, समूचा भारतीय मध्यम वर्ग एटीएम की लाइन में ख़ुशी ख़ुशी लग गया.

प्रधानमंत्री ने 50 दिन मांगे थे, वे कुछ दिन छोड़ टीवी पर आते और नोट बंदी का उद्देश्य कब काले धन से डिजिटल पेमेंट और फ़िर इनकम टैक्स राशि बढ़ाने में तब्दील हो गया, इसका इल्म लाइनों में लगे और एक बड़ी कीमत चुकाने वाले मध्यम वर्ग को हुआ ही नहीं. उसके कानों में बस यही शब्द थे “50 दिनों बाद मेरी कोई कमी रह जाए, कोई गलती निकल जावे, मेरा कोई ग़लत इरादा निकल जाए आप जिस चौराहे मुझे खड़ा करेंगे, मैं उस चौराहे पर खड़ा होकर देश जो सज़ा करेगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूं.”

ख़ैर, नोट बंदी की सफलता – असफलता एक विवाद बन चुकी है. मध्यम वर्ग ठगा हुआ सब देख रहा है, ना तो आतंकियों को होने वाली फंडिंग रुकी और ना ही काला धन. न्यूज़क्लिक की एक खबर के अनुसार, अभी लोकसभा 2019 के 3 चरण बाकी हैं और चुनावी काले धन का कारोबार पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में पकड़े गए काले धन का आंकड़ा दूगने से पार कर चुका है.

2014 लोकसभा चुनाव में जहां कुल 1200 करोड़ रुपयों के कैश, शराब, ड्रग्स और कीमती धातुएं के रूप में बरामद की थी वो 25 अप्रैल 2019 तक 3166 करोड़ रुपयों के आस पास पहुंच चुकी है.

मज़ेदार बात यह है कि चुनाव के मुख्य हिंदी भाषी राज्यों में 3 चरण अभी भी बाक़ी हैं, जहां नोट के बदले वोट और शराब वितरण कुछ गरीब तबकों में आम बात है. वे चुनावों का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं क्योंकि इसी वक़्त उनकी कुछ बख़त होती है और वे कुछ महंगे शौक पूरे कर सकते हैं.

10 मार्च 2019 को चुनाव आयोग ने पूरे भारत में आचार संहिता लागू कर दी थी और इसे प्रभावी बनाने के लिए कई पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिए. अभी तक कुल 450 के आस पास उल्लंघन के मामले चुनाव आयोग में दर्ज़ कराए जा चुके हैं.  चुनाव आयोग की स्पेशल टास्क फ़ोर्स मतदाताओं को लुभाने के लिए दी जाने वाली रिश्वत को रोकने के लिए लगभग रोज़ छापेमारी कर रहे हैं.

बरामद हुए कुल 3166 करोड़ रुपयों में से 750 करोड़ रुपयों का कैश, 240 करोड़ रुपयों की शराब, 1183 करोड़ रुपयों के ड्रग्स और 944 करोड़ रुपयों की कीमती धातुएं हैं. तमिलनाडु में सर्वाधिक 935 करोड़ रुपए मूल्य के सामान की बरामदगी हुई और उसके बाद दूसरे नंबर पर 545 करोड़ रुपयों के साथ गुजरात है तो दिल्ली (395 करोड़), पंजाब (235 करोड़), आंध्रप्रदेश (213 करोड़), उत्तरप्रदेश (177 करोड़) और महाराष्ट्र (130 करोड़) अभी आगे का आंकड़ा छूने को तैयार बैठे हैं.

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा, गुजरात से 524 करोड़ रुपए मूल्य की ड्रग्स और नारकोटिक्स की बरामदगी का है, वहीं दिल्ली से भी 352 करोड़ रुपए मूल्य की ड्रग्स बरामद की जा चुकी है. तमिलनाडु में सर्वाधिक 708 करोड़ रुपए मूल्य की 3063 किग्रा महंगी धातुओं का बरामद होना भी कम आश्चर्यजनक नहीं है.

सरकार इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के माध्यम से चुनावी चंदे को अपारदर्शी बना ही चुकी है जो मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है. अब बड़े कॉरपोरेट घरानों एवं विदेशी प्रतिष्ठानों का भारतीय चुनावों में निवेश, गुमनामी के साथ बिना किसी सीमा के संभव है. वे अपने मनपसंद सरकार को धन के प्रयोग से चुन सकते हैं और क़ानून निर्माण की प्रक्रिया में अपने लिए विशेष प्रावधानों को सुनिश्चित कर सकते हैं.

ब्लूमबर्ग के अनुसार, वित्त वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक 10.3 बिलियन रुपयों की इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के माध्यम से फंडिंग हुई और कांग्रेस को 2 बिलियन रुपयों की. बाक़ी मुख्य राजनीतिक पार्टियां भी क्रमशः इस प्रक्रिया से लाभान्वित हुईं. सरकार इन फंडिंग के स्रोतों को सार्वजनिक करना, आम मतदाताओं के लिए ज़रूरी नहीं मानती. गुमनामी से मिले धन का, कहां कैसे उपयोग राजनीतिक पार्टियों द्वारा किया जा रहा है, ये अब किसी से छुपा नहीं है.

अब ऐसे में, इतनी बड़ी राशि का पकड़ा जाना, ना सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियों और उनके उम्मीदवारों के, मतदाताओं को लुभाने के बेशरम तरीकों को उजागर करता है बल्कि काले धन के एक बड़े प्रवाह की ओर इशारा करता है जिसे रोकना और जड़ से ख़तम कर देना भारतीय जनता पार्टी की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रमुख मुद्दा था.

तर्कसंगत का तर्क 

चुनावी क्रियाकलापों में पारदर्शिता, लोकतंत्र की पहली मांग है. राजनीतिक पार्टियों का मिल जुल कर बेशर्मी अपना लेना, वाकई दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. अपितु चुनाव आयोग ने धन, शराब, मूल्यवान वस्तुओं आदि के वितरण पर नज़र रखने के तमाम प्रयास किए हैं किन्तु एक जागरुक मतदाता और लोकतंत्र के एक सजग प्रहरी के ताैर पर, आपकी भागीदारी सदैव वांछनीय रहेगी.

लेखक : आयरा अविशि

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