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कभी सड़क के बच्चों की मदद के लिए अपने गोल्ड ज्वेलरी को गिरवी रख दिया था और आज वे इनका गर्व बढ़ा रहे हैं

तर्कसंगत

May 2, 2019

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नागरथनम्मा बेंगलुरु के साउथ ब्लॉक-2, में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के रूप में काम करती हैं. अपने काम के साथ, वह सड़क के 25 बच्चों के लिए एक NGO  भी चलाती हैं.

हम सभी ने सड़कों पर बच्चों को देखा है. खासकर जब हम ट्रैफिक सिग्नल पर रुकते हैं बच्चे पैसे या खाने के लिए भीख माँगते हैं, गुब्बारे बेचते हैं. कई बार हम इन बच्चों को यह सोचकर मना कर देते हैं कि उन्हें भीख नहीं माँगनी चाहिए. कभी-कभी हम कुछ पैसे या शायद बिस्कुट का एक पैकेट दे देते हैं. पर शायद ही हम कभी सवाल करते हैं कि ये बच्चे कहाँ से आते हैं? वे कहाँ रहते हैं? क्या वे जो पैसा कमाते हैं वह उनकी आजीविका को बनाए रखने के लिए पर्याप्त होता है? क्यों उनके माता-पिता उन्हें भीख माँगने देते हैं? क्या ये बच्चे कभी स्कूल गए हैं? कुछ लोग न केवल इन सवालों को सोचते हैं बल्कि उनके जीवन को बदलने के लिए कदम भी उठाते हैं. नागरथनम्मा एक ऐसी ही महिला हैं.

वह सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए एक सभ्य जीवन की पेशकाश करना चाहती थी. इस विचार के बीज फरवरी 2012 में बोए गए थे जब श्रीमती नागरत्नम्मा ने अपने ब्लॉक (बैंगलोर साउथ ब्लॉक -2) में स्कूली बच्चों के लिए एक सर्वे किया था जिसमें उन्होंने पाया कि कई परिवार गरीब परिस्थितियों के कारण सड़कों पर रह रहे थे.

श्रीमती नागरथनम्मा और अन्य समान विचारधारा वाले व्यक्तियों ने इन बच्चों को मूल बातें सिखाने के लिए हाथ मिलाया जो भविष्य की मुख्यधारा की शिक्षा के लिए एक आधार होंगें. इसे ‘टेंट शेड’ (ब्रिज कोर्स स्कूल) कहा जाता था. बच्चों ने अंग्रेजी वर्णमाला, कन्नड़ गीत और तुकबंदी सीखी. भविष्य में कक्षा में प्रवेश करने के लिए जरुरी अनुशासन भी जाना. यह एक मुश्किल काम था क्योंकि यह पहली बार था जब बच्चों का सामना सड़कों से अलग किसी माहौल में हुआ हो. बच्चे इस बात से अनजान थे कि लोग उन्हें प्यार और सम्मान भी दे सकते हैं. वे बेहद तेज थे और सीखने के इच्छुक थे जिसने हमें विश्वास दिलाया कि उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में भेजा जा सकता है. लेकिन यह एक चुनौती थी क्योंकि उन्हें उन स्थानों से स्कूलों में जाना पड़ता था जहां वे रहते थे पर ये घर अक्सर बदल जाते थे.

नागरथनम्मा ने तर्कसंगत को बताया “माता-पिता कई बार छात्रों को स्कूल नहीं भेजते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि बच्चे स्कूल जाने के लिए समय बर्बाद करने के बजाय भीख माँग कर और गुब्बारे बेचकर कुछ पैसे कमा सकते हैं.”

अगला कदम इन बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों में प्रवेश दिलाने का था. हालाँकि, चुनौती यह थी कि उन्हें नियमित रूप से समय पर काम करने की ज़रूरत थी. अगर वे सड़कों पर रहते तो अपने स्कूल के काम को पूरा करना, साफ-सुथरी आदतों को बनाए रखना उनके लिए असंभव होता. इसलिए कुछ शुभचिंतकों और जिम्मेदार व्यक्तियों की मदद से, नागरथनम्मा ने रहने और खाने के लिए सरयू धर्मार्थ ट्रस्ट शुरू किया. बच्चों को राइट टू एजुकेशन एक्ट(RTE-Act) के जरिए आसपास के बड़े स्कूलों में प्रवेश दिलाया जिसके तहत प्रत्येक निजी स्कूल को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के 25% छात्रों को स्वीकार करना पड़ा. जिसका खर्च सरकार के द्वारा उठाया गया. ट्रस्ट द्वारा यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया.

 

 

बाधायें

सरयू चैरिटेबल ट्रस्ट टीम के सदस्यों को हर कदम पर बाधाओं का सामना करना पड़ा. भले ही बच्चों को पढ़ाई में मज़ा आता था लेकिन माता-पिता उन्हें वापस सड़कों पर ले जाना चाहते थे. जिसका कारण यह था कि बच्चों ने गुब्बारे और खिलौने बेचकर पैसा कमाया था. उनके बिना, उनकी माँ अकेली थी. उनके पिता बच्चों को शराब के लिए ज्यादा पैसे वापस लाने के लिए मजबूर करते थे. इसलिए ट्रस्ट के सदस्यों के रोकने के बाद भी, कुछ बच्चों को उनके घर वाले वापस ले गये.

बेशक, पैसों की तंगी एक बड़ी समस्या थी पर इसे दूर करने के लिए नागरथनम्मा ने अपने गहने गिरवी रख दिए और इससे मिलने वाले पैसे से NGO चला रही हैं.

 

सफलता की कहानियां

यहां सबसे बड़ी सफलता यह थी कि बच्चों को और अधिक गरिमापूर्ण जीवन के लिए सिखाया किया जा रहा था. उनका मानना ​​था कि वे कहाँ पैदा हुए थे और भविष्य में कहाँ रहना चाहते हैं इसका कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने शिक्षा के मूल्य को महसूस किया है और अब वे सड़कों पर नहीं रहना चाहते हैं.

  • वर्तमान में, 25 छात्रों को RTE के तहत बड़े एवं निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाया गया है.
  • वे कड़ी मेहनत करके शिक्षा में अच्छा कर रहे हैं. उनमें से ज्यादातर का स्कोर 90 प्रतिशत से अधिक है.
  • वे सभी सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों और खेलों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं.

प्रमुख सफलता माता-पिता की मानसिकता में बदलाव है. वे अब अपने बच्चों को शिक्षित करने और सरयू टीम के सदस्यों के प्रयासों को महत्व देते हैं. माता-पिता भी ट्रस्ट की मदद से अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए उनके आसपास के अन्य सदस्यों को मना रहे हैं.

ट्रस्ट कमजोर बच्चों की पहचान करने, उन्हें पौष्टिक भोजन देने, स्वच्छता सुविधाओं और उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने की दिशा में काम कर रहा है जिससे वे गरीबी के चक्र को तोड़ सकते हैं और बेहतर जीवन के लिए लक्ष्य बना सकते हैं.

तर्कसंगत  श्रीमती नागरत्नम्मा की, इन सड़क के बच्चों के जीवन के उत्थान के लिए उनके प्रयास और समर्पण की सराहना करता है.

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