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हैदर मूसवी: “मजहब को भूख नहीं लगती लेकिन इंसान को भूख लगती है, मुझे बस उस इंसान का पेट भरना है”

तर्कसंगत

May 6, 2019

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मीर आलम मंडी, हैदराबाद के निवासी, 47 वर्षीय हैदर मूसवी पिछले तीन वर्षों से ग़रीब लोगों को भोजन उपलब्ध करा रहे हैं.

इसकी शुरुआत 2015 में हुई जब उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ जरूरतमंदों को भोजन बांटने का सोचा. तर्कसंगत से बात करते हुए मूसवी ने कहा,हमने ‘फूड फॉर हंगरनामक एक पेज शुरू करने का फैसला किया और रात में भोजन वितरित करना शुरू कर दिया. उन दिनों, कम धन होने के कारण, हम लोगों को महीने में केवल छह से आठ बार ही खाना खिला पाते थे. जल्द ही हमारे काम को बहुत सराहना मिली और साथ ही दान भी मिला, और हमने इस सामाजिक कार्य को अपना कर्तव्य बना लिया और हर दिन भोजन परोसना शुरू कर दिया”.

 

 

तेज मौसम से लेकर धन की कमी तक, रास्ते में कई बाधाएँ आती हैं, लेकिन मूसवी अपने प्रयासों में जहाँ तक हो सकता है वहां तक मदद करते हैं.

मार्च 2015 से, मूसवी औसतन हर दिन 100 लोगों को खाना खिला रहे है. हैदर कहते हैं अब लगभग 4 साल हो चुके हैं, और हमने भोजन वितरण में एक दिन भी नहीं छोड़ा है. यह मेरा भगवान/ऊपरवाला/अल्लाह है जो मुझे दूसरों की सेवा करने में मदद कर रहा है.”

अपनी शुरुआती नमाज़ के लिए सुबह 4:30 बजे उठने वाले मूसवी का कहना है कि मानवता किसी भी धर्म से बड़ी है. वह दोपहर 12 बजे तक अपने प्लेस्कूल की देख-रेख करते है, और फिर दोपहर में वह किराने का सामान खरीदने जाते है. वह अपनी पत्नी को सारा सामान दे देते है, जो दो अन्य रसोइयों की मदद से लगभग 100 लोगों के लिए भोजन तैयार करती है. शाम की नमाज के बाद, मूसवी अपने बैग को भोजन, पेपर प्लेट और पानी के पाउच से भर देते है और भोजन देने के लिए अपनी देर शाम की दिनचर्या शुरू कर देते है.

 

 

छह बच्चों के पिता मूसवी ने कहा,शुरू में लोगों को ढूंढना बड़ा मुश्किल था, हम नहीं जानते थे कि उन्हें कैसे खोजना है. धीरे-धीरे लोगों ने हमारे काम को पहचानना शुरू कर दिया, और अब लगभग 7 बजे, लोग अपने भोजन की प्रतीक्षा में दबीरपुरा ब्रिज पर इकट्ठा हो जाते हैं. वह सभी रात 8 बजे कतार में खड़े हो जाते हैं और हम इन लोगों को भोजन वितरित करना शुरू करते हैं”.

यह पूछे जाने पर कि क्या मेनू में नॉन-वेज शामिल है, तो वह कहते है, “नहीं, हम केवल शाकाहारी भोजन परोसते हैं क्योंकि हम धर्म के आधार पर भोजन नहीं देते हैं, इन लोगों में से कई हमारे हिंदू भाई हैं और यदि हम नॉन-वेज शामिल करेंगे भोजन में तो वह शायद खाने से परहेज करेंगे. कभी-कभी हम अंडे अपने साथ ले जाते हैं और हम उनसे पूछकर उन्हें दे देते हैं”. मूसवी ने कहा कि प्रत्येक खाने के पैकेट की कीमत लगभग 40 रुपये है, और वह नियमित रूप से मेनू को बदलने की कोशिश करते है.

मूसवी का कहना है कि कभी-कभी उनके समुदाय के लोगों ने धर्म के आधार पर उनके प्रयासों की आलोचना करते थे. वह कहते है कि वह इन सभी टिप्पणियों को नजरअंदाज करते है क्योंकि उसकी सेवा किसी धर्म के लिए नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए है.

 

 

उन्होंने कहा, ” मजहब को भूख नहीं लगती लेकिन इंसान को भूख लगती है, मुझे बस उस इंसान का पेट भरना है”.

मूसवी ने तर्कसंगत को बताया कि वह केवल उस समय ज्यादा शर्मिंदा महसूस करते है, जब ज्यादा लोगों को खाना खाना होता है और भोजन कम पड़ जाता है. वह दुखी होकर कहते हैं, “वह रात के लिए भोजन पाने की उम्मीद में आते हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हें बिना भोजन दिये जाना पड़ता है”.

अब तक, वह हर महीने लगभग एक लाख बीस हज़ार रुपये इकट्ठा करने का प्रबंधन करते है, जिसके उपयोग से वह हर महीने लगभग 3000 लोगों को खाना खिलाते है. वह कहते है कि जब धन की कमी होती है तो वह अपनी जेब से धन प्रदान करने का प्रयास करते है.

 

खाना बांटने के बाद मूसवी लोगों से फीडबैक/जानकारी लेते है. 47 वर्षीय मूसवी ने कहा, “कई बार ऐसा हुआ है जब कढ़ी में नमक कम था या चावल ज्यादा पका हुआ था, तो मैं उनकी बात को सुनता हूं ताकि वह न सिर्फ अपना पेट भर सकें बल्कि भोजन का आनंद भी उठा सकें”.

मूसवी एक रेफ्रिजरेटर के साथ एक मोहल्ला फूड बैंक शुरू करना चाहते है, जहां वह खाना स्टोर कर सकते है. उन्होंने कहा, मैं मोहल्ले के लोगों से बैंक के लिए योगदान करने के लिए भी कहूंगा. मैं एक मासिक क्लिनिक भी स्थापित करना चाहता हूं जहां यह लोग कुछ बुनियादी चिकित्सा उपचार प्राप्त कर सकें”.

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